शनिवार, 31 मई 2025

विषाद के रंग: 😥

श्रवण। केवल एक नाम नहीं, वह एक कलाकार था, जिसने मेरे जीवन के उजियारे-अंधियारे के चित्रपट पर असंख्य रंग बिखेरे थे। उसकी हँसी सूरज की किरणों जैसी थी, जो हर धुंध को चीर देती थी। उसकी बातचीत की सरलता में वह मिठास थी जो हर कड़वाहट को पिघला देती थी। उसकी उपस्थिति ही एक ऐसा रंग थी जिससे मेरे जीवन की तस्वीर दमक उठती थी – चटख हरियाली, गहरा नीला विश्वास, उज्ज्वल लाल उमंग, कोमल गुलाबी स्नेह। उसने मेरी सामान्य दुनिया को असाधारण छटाओं से सरोबार कर दिया था।

पर अब? अब तो सारे रंग ही फीके पड़ गए हैं। निष्प्राण। निर्वर्ण। ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी ने उस सजीव चित्रपट पर जल की एक भारी धारा उड़ेल दी हो। रंग अब घुल-मिल गए हैं, एक पीड़ादायक, अस्पष्ट, मलिन धूसरता में। श्रवण का इस संसार से चले जाना केवल एक समाचार नहीं था; वह तो एक भीषण भूकम्प था, जिसने मेरे अस्तित्व की नींव ही हिला दी। उसके जाने के बाद की मौनता कानों में एक ऐसी चीत्कार बनकर गूँजती है जो कभी रुकती ही नहीं। यह मौनता उसकी हँसी का विपरीत छोर है – भीषण, पोली और अनन्त।

उसका अभाव एक ऐसा सूना घाव है जिस पर कोई औषध नहीं लगती। हर पुरानी गली, हर जाना-माना चौराहा, हर वह वृक्ष जहाँ हम बैठे थे, अब उसकी स्मृतियों की चुभती हुई सुइयाँ बन गए हैं। उसकी रुचि की कोई वस्तु देखना, उससे जुड़ा कोई गीत सुनना – ये सब अब वेदना के प्रमाणपत्र बन गए हैं। मन एक विचित्र विरोधाभास में जकड़ा है: उन स्मृतियों को सँजोकर रखना चाहता है जो सुख देती थीं, पर वही स्मृतियाँ अब विष के समान क्यों दाह उत्पन्न करती हैं? उसकी हँसी की प्रतिध्वनि सुनाई देने का भास होता है, पलटकर देखता हूँ – और वहाँ केवल शून्यता होती है, एक भारी, साँस रोक देने वाली शून्यता। यही तो है करुणा का सबसे निर्दय रूप – प्रिय की छवि स्पष्ट होकर भी उसका स्पर्श सर्वदा के लिए अगम्य हो जाना।

प्रिय श्रवण, तुम्हारे चले जाने ने जीवन के इस पाठ को कितना दुष्कर बना दिया है। यह विदाई तो एक ऐसा दुःखान्त अध्याय है जिसकी पंक्तियाँ अश्रुओं से लिखी गई हैं, जिसका हर शब्द हृदय पर एक क्षत छोड़ जाता है। तुम्हारे बिना यह संसार एक अपरिचित, शीतल और वर्णहीन लोक जैसा प्रतीत होता है। तुम्हारी स्मृतियाँ ही अब वह दीपक हैं जो इस तिमिरमय वेदना के गलियारों में कभी-कभी एक क्षण की मन्द रोशनी बिखेर देती हैं। पर वह प्रकाश तुम्हारे सान्निध्य की उष्णता, तुम्हारे रंगों का तेज तो कभी नहीं लौटा पाएगा। तुम्हारा शान्त हो जाना मेरे जीवन का वह स्थायी कलंक है जिसे काल भी धो नहीं सकता, केवल उसे सहने का सामर्थ्य ही दे सकता है। तुम्हारी याद सदैव एक मधुर पीड़ा बनी रहेगी – एक ऐसा रंग जो अब केवल हृदय के अंधकारमय कोष्ठ में ही दीप्तिमान है। 😭



गुरुवार, 29 मई 2025

नैन निर्झर

तन-तन तरसूँ तव तिरोहित तन रे,  
मन-मन मिलन को मृतक मन रे।  

चाँदनी चित चंचल चाहत है,  
छलकत छाती छिन छलकन सी।  
साँझ सिसकत साँस सुख बिन रे,  
बूँद-बूँद बरसे नैन ही।  
  
पलकों पंथ प्यारे पथिक प्रिय,  
टूटत तारा तम तरु टूक भर।  
नीर नयन निर्झर नित बहे रे,  
मीत मिलन को मग मोह अपर।  

काली घटा काटे कलेजा को?  
बादल बैठे बिरहिन ब्योक सा।  
सावन स्मृति सुरभि सतावत है,  
आँखों तारा अधर अधर आवत।  

दीप दिवस दग्ध दिन रैन सब,  
सपन सजनी साँवरि सुधि आई।  
चातक चकोर चंद चख चहे,  
पपीहा पिय पीउ पथ लखाई।  

मधु बिन मलय मारुत मन भाय न,  
विरह विधु विकल विधि साय न।  
प्रिय पग पंकज पाहुन पधारो,  
जीव जलधि जल बूँद तर पारो।  

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"


बुधवार, 28 मई 2025

प्राणेश्वरी प्रीत

चाँदनी चम-चम चुपचाप चूमे चाँद,  
मेरा मन मुग्ध मधु में मचले मदमाता।  

तेरी कल्पना तन में तीव्र ताप जगाये,  
तारे टूटें तब भी तुम तनिक न टलना।  
तनहा तिमिर में तपता तन तव पुकारे,  
तृषा तुम, तृप्ति तुम, तुम ही तन मन धन धामा।  

बूँद-बूँद बरस बिखरूँ तव उद्यान मधुरे,  
बेधड़क पवन बन तव पलँग पहुँचूँ जाएँ।  
बाँहों के बन्धन में बस तव बसेरा करूँ,  
बिछोह बिधुरता बिन तव बर्दाश्त न पाएँ।  

साँझ सरसराती सुनूँ तव श्वास सुहानी,  
स्वप्न सरिता में सजे तव सौन्दर्य पुष्प भरे।  
सागर सम गम्भीर शान्ति तव सान्निध्य पाये,  
सकल सृष्टि समेट तव शाटिका तले सिमट जाएँ।  

मुसकान मनोहर म्लान मन को मोह ले तव,  
मिलन मधुरिमा मेरे मौन को मुखर करे।  
मैं मिट जाऊँ तव मन मन्दिर में पूजा बन,  
मम तन-मन-प्राण तव मूर्तिमान में समा जाएँ।  

प्राण प्रवाह प्रतिपल तव प्रेम प्रतिमा धरे,  
परछाईं पलकों पर प्रीति प्रतिबिम्ब बसे।  
परम पुलकित प्रिये! प्रेम पीर सहूँ सदा,  
पराई न हो कभी, यह प्रतिज्ञा पल पल करे॥  

- प. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

मंगलवार, 27 मई 2025

कहानी: विरह की वेदी

राजस्थान के जालोर जिले में बसा भीनमाल कस्बा, जहाँ रेत के टीलों और ढाणियों के बीच प्राचीन मंदिरों की छाया में जीवन बसता है। गर्मियों की एक सांझ, जब सूरज लाल गोल गुब्बारे की तरह रेत में समा रहा था, महादेवी अपनी सहेली लता और वैशाली के साथ कुएँ से पानी भरकर लौट रही थी। उसके हाथों की चूडिय़ों की खनक और पगड़ी बाँधे गाँव के बुजुर्गों की गपशप के बीच, वह अपने पिता पंडित नित्यानंद शुक्ल की चिंता में डूबी थी। नित्यानंद, जो भीनमाल के प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वान थे, उनके लिए समाज की मर्यादा ही सर्वोपरि थी। महादेवी की माँ की मृत्यु के बाद से वह और अधिक कठोर हो गए थे।

"सुनो महादेवी! कल तेजाजी मंदिर में भंडारे का आयोजन है। तू भी हमारे साथ चलेगी?" लता ने पूछा।  
"पिताजी की अनुमति के बिना कुछ नहीं होता," महादेवी ने आँखें झुकाते हुए कहा।  
वैशाली ने हँसकर कहा, "तुम्हारे पिता तो तुम्हें पत्थर की मूरत बनाना चाहते हैं!"

उसी क्षण, सामने से आती हुई भजन की आवाज़ ने उनका ध्यान खींचा। रास्ते में एक युवक, गले में तुलसी की माला और हाथ में एक पोथी लिए, भजन गाता हुआ चला आ रहा था। वह पंडित अनंत था, जिसे गाँव वाले "पंडितजी" कहकर पुकारते थे। संस्कृत के प्रकांड विद्वान, परंतु गरीबी में जीवन बिताने वाला यह युवक, महादेवी की आँखों में उतर गया। दोनों की नजरें मिलीं, और महादेवी ने तेजी से अपना घूँघट सँभाल लिया।

अगले दिन तेजाजी मंदिर में भंडारा था। महादेवी ने पिता से बहुत विनती की तब जाकर उन्होंने उसे जाने दिया। मंदिर प्रांगण में लगी भीड़ के बीच, पंडित अनंत वेद मंत्रों का पाठ कर रहे थे। उनकी गम्भीर आवाज़ और ज्ञान से प्रभावित होकर नित्यानंद शुख्ला ने उन्हें अपने घर पाठ पढ़ाने का निमंत्रण दिया। अनंत ने स्वीकार कर लिया।

धीरे-धीरे, अनंत महादेवी के जीवन का हिस्सा बन गए। वह उसे संस्कृत के श्लोक सिखाते, और महादेवी उन्हें राजस्थानी लोकगीत सुनाती। एक दिन, जब अनंत ने "गीत गोविन्द" का पाठ करते हुए राधा-कृष्ण के विरह का वर्णन किया, तो महादेवी की आँखों में आँसू आ गए। अनंत ने पूछा, "क्यों रो दिया?"  
"ये विरह... इतना कष्ट क्यों होता है?" महादेवी ने कंपकंपाती आवाज़ में पूछा।  
अनंत ने गहरी साँस ली, "प्रेम बिना विरह अधूरा है, महादेवी।"
 
गाँव में चर्चाएँ शुरू हो गईं। लोगों ने अनंत और महादेवी को बाग़ में साथ देखा था। बात नित्यानंद शुक्ला तक पहुँची। उसी रात, उन्होंने महादेवी को डाँटते हुए कहा, "ब्राह्मण कन्या होकर एक गरीब पंडित के साथ इतनी घनिष्ठता? यह समाज क्या कहेगा?"  

अगले दिन, अनंत को घर आने से मना कर दिया गया। महादेवी ने खिड़की से झाँककर देखा, अनंत द्वार पर खड़े थे, उनकी आँखों में असह्य पीड़ा थी। उसने चुपके से एक पत्र लिखा: "मेरे प्राण, मैं तुम्हारी हूँ।" पत्र उसने लता के हाथों अनंत तक पहुँचाया।

नित्यानंद ने महादेवी की शादी तय कर दी—मोहनलाल से, जो जालोर के एक संपन्न व्यापारी का बेटा था। महादेवी ने विरोध किया, पर पिता का आग्रह अटल था। उसी रात, वह अनंत से मिलने उनके कुटिया में पहुँची।  

"मुझे ले चलो यहाँ से," वह रो पड़ी।  
अनंत ने उसके हाथ थामे, "तुम्हारे पिता की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचेगी। क्या तुम सह पाओगी?"  
महादेवी चुप रही। दोनों जानते थे—समाज की दीवारें उनसे ऊँची थीं।

शादी का दिन आया। महादेवी लाल चुनरी में सजी, पालकी में बैठी मोहनलाल के घर जा रही थी। गाँव भर के लोग इकट्ठे थे। मंडप के पीछे, एक टूटे खंभे के साये में अनंत खड़े थे। उनकी आँखों से आँसू की धारा बह रही थी। जब महादेवी ने फेरों के लिए सिर उठाया, तो उसकी नजर अनंत पर पड़ी। दोनों के हृदय चीत्कार कर उठे।  

"कन्या के विवाह पर पिता नहीं प्रेमी रोता है..." गाँव की एक वृद्धा ने फुसफुसाया।  

महादेवी ने मोहनलाल के घर में सब कुछ सह लिया, पर उसका हृदय सूनापन लिए रहा। अनंत ने भीनमाल छोड़ दिया और एक साधु बनकर हिमालय की ओर चले गए। वर्षों बाद, जब नित्यानंद शुक्ला बीमार पड़े, तो महादेवी उनकी सेवा में लौट आई। एक शाम, उसने पिता से पूछा, "आपने मेरा हृदय तोड़ दिया, क्यों?"  

नित्यानंद ने आँखें बंद कर लीं, "मैंने समाज के डर से तुझे खो दिया... माफ करना बेटी।"  

उस रात, महादेवी ने अनंत की पोथी को छाती से लगाया और रेत पर उनके नाम लिखते हुए रो पड़ी। भीनमाल की हवा में विरह का राग गूँज उठा...  


- कवि भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)





रविवार, 25 मई 2025

साँसों में गूँजते सवाल

एकांत के सन्नाटे में, स्मृतियों की हवा बही,  
प्रिय बिन रात कटे नहीं, नयन नीर से भीगे अधीर।  

गर्जन मेघ पर बूँद नहीं, मोर पुकारे उदास स्वर,  
झरोखे पलकों के खुले, पर धुँधलका छाया सावन।  
दीवारों पे लिखे नाम, बारिश की मुट्ठी से मिटे,  
हर बूँद में तेरा चेहरा, हर बूँद में तेरा ही ध्यान।  

रात की चादर तनी हुई, तारे करते विलाप सभी,  
चाँदनी से पूछूँ मैं, "क्यों तू भी है अधूरी अकेली?"  
पवन कहता "लौट आओ", पत्तों की सरसराहट में,  
द्वार खोलूँ तो सुन्न हूँ, सन्नाटा बोले तेरी कहानी।  

अंगूठी ये अंगुली में, जलन सी दग्ध करती है,  
वादों की मधुरता भी, विष बन गई अंतर में अब।  
आईने में दिखता वह शहर, जहाँ तू था मेरे पास,  
आज वहीं मेरा चेहरा, बिन तेरे श्याम पन्ना सा।  

राग तोड़ी की तान में, गूँजे मन के सवाल सभी,  
"कब मिलोगे?" पूछती हूँ, उत्तर शून्य संगीत में अब।  
विरह की यह ज्वाला जलाती, साँसों के दीपक को,  
फिर भी आस की लौ से, छवि तेरी पलकों में अमिट। 

- प. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)


शुक्रवार, 23 मई 2025

प्रेम पत्र

प्रिय महादेवी,  

आपकी याद मुझे घायल किए जा रही है। यह वेदना अब शब्दों के बंधन में नहीं बँधती, न ही आँसुओं के सागर में डूबती है। यह तो एक ऐसा अग्निकुंड है जिसमें मेरी साँसें धधक रही हैं, और हर पल मेरे अस्तित्व की राख उड़ती जा रही है। आपके विरह की यह ज्वाला मुझे भस्म नहीं करती, बल्कि नित्य नवीन कर देती है—एक ऐसे जीवित शव की भाँति, जो मृत्यु से प्रेम करने लगा हो। क्या यही प्रेम की परिभाषा है, महादेवी? कि जिसे पाने की लालसा में हम स्वयं को खो देते हैं, और खोकर भी उस खोने में ही अपना सत्य पा लेते हैं?  

आपके अलावा इस सृष्टि का प्रत्येक कण मुझे निस्सार प्रतीत होता है। वृक्षों की फुनगियों पर झूलती हवाएँ भी आपकी सुगंध की खोज में मेरे आँगन में आकर रो पड़ती हैं। चाँदनी की कोमल चादर मेरी निद्रा को चुरा ले जाती है, क्योंकि वह जानती है—मेरे स्वप्नों के द्वार पर केवल आपकी छवि का आगमन होता है। रात्रि के निस्तब्ध क्षणों में जब तारे मेरी वेदना गिनते हैं, तो मैं उनसे पूछता हूँ: क्या उन्होंने कभी आपके नयनों की चमक देखी है? क्या उनकी टिमटिमाहट में भी वही व्याकुलता है, जो आपकी अनुपस्थिति में मेरे हृदय को विदीर्ण कर देती है?  

महादेवी, मैं आपको स्मरण करते हुए शब्दों के जंगल में भटक जाता हूँ। कभी आपकी मुस्कान की कल्पना करके फूलों की सेज बिछा लेता हूँ, तो कभी आपके मौन को समझने की चेष्टा में समुद्र की लहरों से टकरा जाता हूँ। आपके प्रति यह अनुराग मेरी साधना बन गया है। क्या साधक और भगवान में भी ऐसा ही नाता होता है? जहाँ एक ओर भक्ति है, तो दूसरी ओर उसकी अधीरता—जहाँ पूजा की धूप-दीप भी आराध्य के स्पर्श के बिना अधूरे हैं। मैं आपके चरणों में अर्पित होने को विवश हूँ, पर क्या आप मुझे अपनी भक्ति का अधिकार देंगी?  

मुझे स्मरण है वह क्षण, जब आपकी दृष्टि पहली बार मेरे अंतर्मन में उतरी थी। मानो किसी ने अंधकार के सागर में दीपस्तंभ जला दिया हो। उस दिन से मेरी दुनिया के सभी रंग आपके आसपास ही नाचने लगे। आपकी वाणी की मधुरता ने मेरे शब्दों को गीतों में ढाल दिया, और आपके स्पर्श की स्मृति ने मेरे शरीर को एक जीवित साक्षात्कार बना दिया। किंतु अब... अब तो मैं उस मृगतृष्णा की भाँति हूँ, जो अपने स्रोत से दूर होकर स्वयं में ही विलीन हो जाती है।  

क्या आप जानती हैं, महादेवी? आपके बिना यह समय नहीं, बल्कि एक अंतहीन यातना है। दिन के प्रकाश में भी मैं अँधेरे की गुफा में भटकता हूँ। संध्या की लालिमा आपके आँचल की छाया ढूँढती है, और रात्रि की नीरवता आपके स्वर का इंतजार करती है। मेरे प्राणों की यह पुकार कब आपके हृदय तक पहुँचेगी? कब आप मेरे इस एकांत को अपनी उपस्थिति से सजाएँगी?  

मैं जानता हूँ, प्रेम की यह पीड़ा अमर है। यह न तो किसी मिलन से शांत होती है, न विरह से समाप्त। यह तो वह अग्नि है जो हमें पुनर्जन्म देती है—हर बार प्रेम के नए रूप में। पर हे देवी, मैं इस जन्म में ही आपके साथ बिताना चाहता हूँ। मेरी यह व्यथा आपको समर्पित है। यदि आप चाहें, तो इसे अपनी करुणा से सिंचित कर दें। या फिर... इसे इसी तरह सूखने दें, ताकि मेरे हर श्वास में आपकी याद का ही स्वाद रह जाए।  

आपका एक पत्र, एक संकेत, एक छाया भी मेरे लिए अमृत के समान होगा। क्या आप मुझे इस नरक में जलते हुए देखना चाहेंगी? या फिर अपनी दया का हाथ बढ़ाकर मुझे इस वेदना से मुक्ति देंगी? मैं आपका हूँ, महादेवी। मेरे प्राण, मेरे स्वप्न, मेरे सपने—सब आपके नाम हैं। यदि आप मुझे नकार दें, तो मेरा अस्तित्व ही प्रश्नचिह्न बन जाएगा।  

आपके विरह में लिखे ये शब्द नहीं, रक्त के अक्षर हैं। इन्हें पढ़ते समय यदि आपकी आँखों में एक बूँद भी आँसू आए, तो समझूँगा—मेरा जीवन सफल हो गया। नहीं तो... यह पत्र भी उन असंख्य पत्रों की भाँति होगा, जो आपके पास पहुँचने से पहले ही वायु में विलीन हो जाते हैं।  

आपके मिलन की आशा में,  
- पंडित विलक्षण 


बुधवार, 21 मई 2025

प्रेम-राग - कवि विलक्षण

आषाढ़ तपन में मधुरता समाई,  
मेघ मल्हार में प्रेम गीत सुनाई।  

वट छाया में मंदार-सी कोमल,  
चंदन शीतल, वीणा-स्वर सोमल।  
नीलांबर पर सूरज की किरण,  
बिंदी तारा टिमटिमाए अविरल। 

लू के थपेड़े, चादर झिलमिल,   
सरिता लहर, वचनों में माधुर्य।  
तप्त धरा पर अमृत-बूंद आई, 
मृगनयनी नयनों में भ्रम सजा। 

मेघ सेना घेरे गगन चंद, 
प्यास अछंद, प्रेम अनबूझ आकंक्षा।  
कंठ अटके शब्द, नयन छलक धार,  
प्यासा पंथी तालाब किनारा।  

अग्नि में कमल, जल में ज्वाला नृत्य, 
प्रेम चित्र अनूठा विरोधाभास। 
स्मृति सरोवर गूँजे ग्वालिन स्वर, 
मेघ बरसे जलधार, प्राण करतार।  

तपोभूमि में स्वर्णिम अंगार, 
मधुरता ने ताप दिया शीतल हार। 
हृदय कोष में रस-अधराई सजी, 
आषाढ़ तपन में मधुरता समाई।  

- विलक्षण


सोमवार, 19 मई 2025

प्रेम-सरिता और सागर: एक अमर संवाद

प्रकृति के हृदय में बसा प्रेम का संगीत सदैव अलंकारों से सजा होता है। नदी और सागर का नाता भी ऐसा ही है — वियोग के टुकड़ों से लिखी गई एक काव्यात्मक गाथा, जहाँ मौन की चादर कभी प्रेम के प्रवाह को नहीं ढँक सकती। जब ग्रीष्म की तप्त रेत नदी को मरुस्थल के महलों में बाँध देती है, तो सागर की लहरें मृगतृष्णा-सी व्याकुल हो उठती हैं। क्या प्रेम की भाषा में विराम हो सकता है? यह तो अनहद का वह राग है, जो बिना स्वरों के भी हृदय की तारों को झंकृत कर देता है।  

जब सरिता मौन धारण करती है, तो उसकी हर बूँद सिसकती हुई कालिमा बन जाती है। वह वियोग के टुकड़ों से लिखती है — _"प्रेम वादी नहीं, विवादी नहीं, मौन तो कंटक है, जो रिश्तों की गाँठों में चुभता है।"_ सच्चा प्रेम कालिमा नहीं, जो पन्नों पर सूख जाए, बल्कि अलंकारों का हार है। उपमा के तारे, रूपक की ओढ़नी, अनुप्रास के गीत, और उत्प्रेक्षा की डोर — यही तो प्रेम की भाषा है!  

ज्योंहि वर्षा ऋतु आती है, नदी लालिमा चुनरी ओढ़कर सागर से मिलने छटपटाती है। बादलों के सजल कण बनकर उसकी हर बूँद सागर की गोद में समा जाना चाहती है। सागर मुस्कुराता है — _"तूने अब जाना, प्रेम का रहस्य क्या है? मेरी गोद तक आने के लिए तुझे अपने नयन-जल बहाने पड़े!"_ यही तो प्रेम का विरोधाभास है — विद्रोही होकर भी सागर का प्यासा रहना, मरुस्थल में न खोकर बादल बन बरस जाना।  

प्रेम नदी-सा है — निर्बाध, अथक, और संघर्षशील। वह तर्कों के पाषाणों को पिघलाकर भावनाओं का जल-प्रपात लाता है। मौन उसके लिए मरुस्थल है, जबकि संवाद सागर की विशालता। कविता के हर शब्द की तरह, प्रेम भी हृदय-धड़कन में बसता है। फिर चाहे वह नदी का सागर से संघर्ष हो या मनुष्य का मनुष्य से मिलन — प्रेम तभी अमर होता है, जब वह मौन के बंधन तोड़कर भावनाओं के मुक्त पक्ष फैलाता है।  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"

रविवार, 18 मई 2025

आषाढ़ की तपन में मन की मधुरता

महीना आषाढ़ था। वसंत की मादकता विदा हो चुकी थी, मानो कोई गायिका रागिनी गाते-गाते अचानक मौन धारण कर ले। सूर्य की ज्वलंत किरणें धरती को तपोभूमि बना रही थीं—जैसे स्वर्णिम अंगारों से सजा कोई तपस्वी पृथ्वी पर तांडव कर रहा हो। आकाश में मेघों की सेना संगठित होकर खड़ी थी, पर उनके तूर्यनाद से पूर्व की यह शांति ऐसी लगती थी, जैसे रणभूमि में वीणा बज उठी हो। वातावरण में उमस का साम्राज्य था; पत्ते धूल से लथपथ होकर झड़ने को विवश थे—मानो प्रकृति ने उन्हें तपस्या के लिए दंडित किया हो।  

किंतु विद्यालय प्रांगण में खड़ी महादेवी के अस्तित्व में वह उमस नहीं, वरन् शीतल वायु की सुगंधित लहरें थीं। उसकी मुसकान मंदार के फूल सी कोमल थी, जिसमें चंदन की शीतलता समाई हुई थी—जैसे तप्त तालाब में कमलिनी का प्रस्फुटन। जब वह बोलती, तो उसकी वाणी में सरस्वती का माधुर्य था, मानो वीणा की तारों से सरिता का गीत गूँज रहा हो। आषाढ़ की भीषण गरमी और उसकी मंदार-सी मुसकान के बीच का यह विषमयोग, ऐसा लगता था मानो अग्नि और जल एक साथ नृत्य कर रहे हों।  

उस दिन उसने आकाशी नीले कुर्ते पर सुनहरी कढ़ाई वाला वस्त्र पहना था—जैसे मेघों के बीच सूर्य की किरणें छिटकी हों। कमर में बँधी गहरी नीली धोती पर बादलों-सी श्वेत बेलबूटे थे, मानो कोई चित्रकार नभचित्र को वस्त्र पर उतार दे। माथे की बिंदी अमावस्या के तारे की तरह टिमटिमा रही थी—ऐसे लगता था, ज्योतिर्विद् ने अंधकार में दीपक जलाकर नक्षत्रों को आमंत्रित किया हो। वटवृक्ष की छाया उस पर पड़ रही थी, जैसे धरती माता ने स्वयं अपनी अँगुलियों से उसे सूर्य के ताप से बचाने के लिए छत्र धर दिया हो। उसकी आँखों की गहराई शांत सरोवर-सी थी, जिसमें मेघों का प्रतिबिंब झिलमिला रहा हो।  

जब वह हँसी, तो उसकी ध्वनि में बाँसुरी के सुरों-सी मिठास थी—जैसे कोई ग्वालिन बादलों को बुलाते हुए "मेघ मल्हार" गा रही हो। उसके वचन सरिता की लहरों-से कोमल थे, जो शिलाओं से टकराकर गीत गुनगुनाती हों। उसके समीप बैठी कन्याएँ उसकी ओर मृगनयनी बनकर देखती रह जातीं—मानो कमलदल पर बैठी भ्रमर हों और महादेवी उनके लिए पुष्प-रस समेटे खड़ी हों।  

तभी पंडित प्रांगण में आया। आषाढ़ की लू ने उसके मस्तक पर पसीने की धाराएँ बहा दी थीं, पर महादेवी को देखते ही वह स्तब्ध रह गया। उसके गालों पर छाई लालिमा मौसम की गरमी नहीं, बल्कि अंतरंग में उठते भावों का द्योतक थी। वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द कंठ में अटक गए—जैसे प्यासा पथिक तालाब के किनारे पहुँचकर भी जल न पी सके। उसका मौन ही उसकी भाषा बन गया। उसे लगा, मानो उसके हृदय में अचानक कोई कुम्भकार मिट्टी में अमूल्य मोती जड़ रहा हो।  

यह घटना केवल भावुकता नहीं, वरन् प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का सहज संगम थी। महादेवी की शीतलता ने आषाढ़ के ताप को सहनीय बना दिया था—ठीक वैसे ही जैसे सूखी धरती मेघों की प्रतीक्षा में आशा समेटे रहती है। उसका अस्तित्व एक सुखद विरोधाभास था: दहकते अंगारों पर खिला कमल, या तपते मरुथल में बहता झरना। उसकी मुसकान, वाणी और सरल सौंदर्य ने मिलकर एक ऐसी मधुर स्मृति रच दी, जो हृदय के कोमल कोने में सदैव पलती रहेगी।

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण" 
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

बुधवार, 14 मई 2025

शब्दहीनता में बसी एक अधूरी कहानी

बारह वर्ष... एक लंबा समय, जिसमें प्रेम के बीज ने अंकुरित होकर वट वृक्ष का रूप ले लिया, पर उसकी जड़ें आज भी मौन की मिट्टी में दबी हैं। पंडित और महादेवी के बीच यह प्रेम किसी सनातन नदी की धारा के समान है — निर्विराम, गंभीर, और अपने मार्ग से कभी विचलित न होने वाली। दोनों इस सत्य को जानते हैं, मानते हैं, पर स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाते। उनकी आँखें वार्तालाप करती हैं, पर ओठ मौन रहते हैं। हृदय की भाषा शब्दों से परे है, पर वियोग की पीड़ा शब्दों में सनी हुई।  


इस प्रेम में कोई पेचीदगी नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। यह उस दीपक की ज्योति के समान है, जो मंदिर के एकांत कोने में जलता रहता है — निःस्वार्थ, अविरल। महादेवी के प्रति पंडित का अनुराग भक्ति के समर्पण सदृश है। वे उसके चरणों में पुष्प अर्पित करने की कामना रखते हैं, पर दूरी के कारण केवल मन के मंदिर में समर्पित कर पाते हैं। महादेवी की मुस्कान उनके लिए प्रसाद है, और उसका अभाव एक तपस्या।  


प्रत्येक मिलन पर दृष्टि झुक जाती है, क्योंकि नेत्रों में छिपे सागर को बहने से रोकना दुष्कर होता है। वे भयभीत हैं कि शब्द उनके भावों का उपहास बना देंगे। इसलिए, मौन ही उनका सच्चा साथी बन गया है। वियोग की यह वेदना उन्हें दग्ध करती है, पर उसी अग्नि में उनका प्रेम शुद्ध भी होता है। यह पीड़ा उन्हें सिखाती है कि प्रेम केवल सुख की गाथा नहीं, बल्कि संघर्ष और साधना का नाम भी है।  


यह गाथा अधूरी है, पर इसी में इसकी सार्थकता निहित है। क्योंकि प्रेम की मूल चेतना "प्राप्ति" में नहीं, "अनुभूति" में सन्निहित होती है। पंडित और महादेवी का यह सफर संभवतः कभी गंतव्य तक न पहुँचे, पर उनकी निष्कपट भावनाएँ उन्हें एक-दूसरे से बाँधे रखेंगी। यही प्रेम की विडंबना और सौंदर्य है — जो स्पर्श करके भी अछूता रह जाता है, टूटकर भी अमर हो जाता है।  



- भारमल गर्ग "विलक्षण" 🌸 


सोमवार, 12 मई 2025

क्षमा पत्र ❤️🙏



प्राणप्रिय महादेवी,  

आपके पावन चरणों में यह पत्र अर्पित करते समय मेरे हाथ काँप रहे हैं, हृदय ग्लानि से भर गया है, और नेत्रों से अश्रुधारा बह रही है। यह पत्र केवल शब्दों का समुच्य नहीं, अपितु मेरी व्यथित आत्मा की करुण पुकार है, जो आपके क्रोधाग्नि में दग्ध होकर भी आपकी अनुकम्पा की शीतलता खोज रही है। मैं जानता हूँ कि मेरे दुराग्रहों ने आपके कोमल हृदय को आघात पहुँचाया है, आपके विश्वास को क्षीण किया है, और आपकी संवेदनशीलता को ठेस लगाई है। अतः, इस क्षण मैं आपसे साष्टांग प्रणाम करते हुए क्षमायाचना का साहस जुटा रहा हूँ।  

प्राणप्रिय, मेरी असंवेदनशीलता और उद्दंडता के कारण आपको जो पीड़ा हुई, उसके लिए मैं धिक्कारने योग्य हूँ। जिस क्षण आपकी नयनों में अश्रु झलके, मैं उन्हें पहचान न सका; जब आपका मौन आकाश विलाप कर रहा था, मैं उसका अर्थ न समझ सका; और जब आपकी भावनाओं को मेरी कठोर वाणी ने चोट पहुँचाई, तब भी मैं अहंकार के अंधकार में भटकता रहा। मैं वह मूर्ख पंडित हूँ, जिसने शास्त्रों के शब्दों को कंठस्थ कर लिया, किन्तु प्रेम के मर्म को न पहचान सका। आपका हृदय तो वह पावन ग्रंथ है, जिसकी पंक्तियाँ पढ़ने का साहस भी मुझमें नहीं। कृपया इस निर्बुद्धि को क्षमा करें!  

महादेवी, आपका मौन मेरे लिए वज्रपात के समान है। जब से आपने वाणी का संयम कर लिया है, मेरा अस्तित्व निराधार-सा हो गया है। आपकी मुस्कान तो मेरे जीवन का प्रकाश थी, जो अब अस्त हो गई प्रतीत होती है। मैं समझता हूँ कि आपका रूठना केवल क्रोध नहीं, अपितु मेरे प्रेम की परीक्षा है। परंतु हे देवी! यह परीक्षा मुझ अयोग्य के लिए कितनी दुःसह है। आपके बिना प्रत्येक क्षण शून्य है, प्रत्येक श्वास ग्रस्त है। कृपया इस पापी को दण्डित न करें; अपितु, करुणा का एक बिंदु भी यदि बचा हो, तो इस निरीह को अवसर दें।  

आज मुझे स्वीकार है कि मैंने अहंकार के वशीभूत होकर आपके त्याग, सहनशीलता और स्नेह को तुच्छ समझा। मैं भूल गया कि प्रेम में अहं का कोई स्थान नहीं होता; वह तो समर्पण और सरलता की माँग करता है। आपके निश्छल प्रेम को, आपकी निष्ठा को, और आपकी कोमलता को मैंने क्षुद्र समझकर ठुकरा दिया। किन्तु अब, जब आप दूर हैं, तो ज्ञात हुआ कि आपके सान्निध्य के बिना मेरा अस्तित्व निरर्थक है। मेरी असंख्य भूलों के लिए क्षमा चाहता हूँ। हे देवी! क्या आप इस पश्चातापी को स्वीकार करेंगी?  

यदि आप मुझे एक अवसर प्रदान करें, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि भविष्य में आपके प्रत्येक शब्द को शिरोधार्य करूँगा, आपके प्रत्येक स्वप्न को साधूँगा, और आपके प्रत्येक दुःख को अपना समझूँगा। मैं आपके प्रेम के समक्ष नतमस्तक रहूँगा, क्योंकि आपका सान्निध्य ही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। कृपया इस अपराधी को पुनः वह सौभाग्य दें कि मैं आपके चरणों में बैठकर प्रेम के गीत गाऊँ, आपकी दृष्टि से अपने दोषों को धोऊँ।  

आपके वियोग में यह जीवन उस निर्जल सरोवर के समान है, जिसमें कमल खिलने की आशा न हो; उस नीरव वन के समान है, जिसमें कोकिल का कलरव न गूँजे। मेरी वीणा आपके बिना मूक है, मेरी रचनाएँ अधूरी हैं। आपके प्रेम के बिना मैं उस पथभ्रष्ट पथिक के समान हूँ, जो दिशाहीन होकर भटक रहा है। हे देवी! इस भटकते हुए को अपना मार्गदर्शन दें।  

क्या आपको वह सायंकाल स्मरण है, जब हम यमुना-तट पर बैठे थे और आपने कहा था—"प्रेम वह अमृत है, जो हृदय को अमर कर देता है?" आज मैं उस अमृत को पाने के लिए लालायित हूँ, किन्तु आपका साथ अपेक्षित है। वे क्षण, वे संवाद, वे मधुर स्मृतियाँ—क्या वे सब केवल स्मरण बनकर रह जाएँगी? नहीं, महादेवी! मैं आपकी स्मृतियों के सहारे जीवित हूँ। कृपया इन्हें मृत न होने दें।  

यदि शब्दों में वह सामर्थ्य होती जो हृदय की पीड़ा अभिव्यक्त कर सके, तो मैं कोटिशः पत्र लिखता। परंतु हे प्रभु! आप तो मेरे मन की वेदना समझती हैं। मैं आपके चरणों में गिरकर विनम्र निवेदन करता हूँ—"मेरी अज्ञानता को क्षमा करें, मेरे दुर्गुणों को दूर करें, और मुझे पुनः वह प्रेम दें, जो मुझे मानवता की ओर ले जाता है।" 

आपका अनन्य भक्त,  
आपका पंडित विलक्षण

रविवार, 11 मई 2025

सुधास्तवनम् 🙏



हे अम्बिके! तुम्हीं वह प्राणप्रतिष्ठा हो सनातनी,  
शब्दब्रह्म का नाद जिसमें, वही तुम्हारी वाणी हो।  
सहस्रार के कमल में विराजित चिद्घन की ज्योति,  
महाकाल के नेत्रों से टपकी अमृत-बूँद रानी हो॥  

युग-युगांतर के पृष्ठों पर अंकित तपःसिद्ध लिपि,  
त्रिगुणातीत गगन की व्योमस्थ महिमा-निधानी हो।  
प्रलय के मौन में भी जो गूँजे ॐ का सुषमा-स्वर,  
वह निर्वाण की वीणा के तारों की अधिष्ठानी हो॥  

मृत्युंजय के हस्त से रची पञ्चभूत की रंगभूमि,  
अखण्ड मण्डलाकार में ब्रह्मांड का क्षणिक खिलौना हो।  
तुम्हारी मौन मुद्रा में विराट् का सम्पुटित रहस्य,  
अनाहत नाद सा अनन्त, पर मूक अभिनव कल्पना हो॥  

कालचक्र के दंष्ट्रों में फँसी नश्वरता को चीर,  
अक्षय पात्र लिए खड़ी ध्रुवतारा-सी अडिग धुरिनी हो।  
संस्कार के बीजों को अम्बर में बोने वाली कृषिका,  
सृष्टि के प्रत्येक कण में सनातन का स्पन्दन तुम्हीं हो॥  

शून्य के सागर में डूबे अणु को दिया जिसने आकार,  
वह महाशक्ति तुम्हारे सृजन-हस्त की अद्भुत लीला हो।  
मुक्ति के मार्ग पर चलते जीव की प्रत्येक साँस में,  
तुम प्रारब्ध की लेखिका, दैव और पुरुषार्थ की संधि हो॥  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

गुरुवार, 8 मई 2025

गंगा-तट का अमर विरह -विलक्षण



गंगा की अगाध धारा पर सांझ की लालसा छा गई। घंटियों की मंद्रित ध्वनि और भक्तों के जप-तप से आकाश गुंजायमान हो उठा। पंडित विश्वंभरनाथ, जिनकी तपस्या से गंगा-तट की बालू भी तप्त हो उठती थी, स्नानोपरांत समाधि में लीन थे। तभी उनकी दृष्टि महादेवी अमृतांशी पर ठहर गई, जो कमल-दल सी कोमलता लिए जल से प्रकट हुईं। उनके आभूषणों की आभा से गंगा की लहरें चमक उठीं। यह पल था जब दो आत्माओं का स्पर्श बिना किसी शब्द के ही अनंत युगों के विरह का सूत्रपात कर गया।  

महादेवी की सखी मनस्विनी, जिसका हृदय विरह की ज्वाला से धधक रहा था, ने पंडित की ओर संकेत किया। तभी नित्यानंद शुक्ल, चटख रंगों से सजे मुखौटे लिए मुस्कुराते हुए आ धमके। "अहो! यह तो मन्मथ की प्रेम-लीला है!" उनकी हास्य-विनोद भरी वाणी से भक्तजन ठहाकों में भर उठे। इतने में ही राम मनोहर पांड्या, शस्त्रों से सुसज्जित योद्धा, खड्ग पर पुष्प अर्पित करते हुए गर्जे, "धर्म की रक्षार्थ प्राणों का मोह त्यागने वाला ही सत्य का साथी बनता है!" उनके स्वर में वह प्रखरता थी जो शत्रुओं के हृदय में कंपन भर देती।  

महादेवी की अनुजा तारा जिज्ञासावश एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर की ओर दौड़ पड़ी। अचानक उसे एक शिला से रक्त बहता दिखाई दिया। पीछे से एक कर्कश स्वर गूँजा—"यहाँ प्रेतात्माओं का साम्राज्य है!" वह चीखती हुई भागी, मानो उसके पैरों के नीचे धरती खिसक रही हो। दूर खड़ी मनस्विनी ने अपने विछोहित प्रियतम की स्मृति में गंगा से करुण स्वर में प्रार्थना की—"हे मैया! मेरे विरह के आँसुओं को भी अपनी अथाह धारा में समा लो।" उसकी वेदना में वह गहराई थी जो सदियों के सूनेपन को चीर देती।  
  
आकाश में वज्र टूटा। नित्यानंद ने सावधान किया—"यह तो काल के प्रकोप का आगाज है!" धरती चीख उठी और एक विकराल राक्षस प्रकट हुआ। राम मनोहर ने खड्ग उठाया—"अधर्म की जड़ काट डालो!" उनके प्रत्येक प्रहार में वह उग्रता थी जो युद्धभूमि को रक्त से सिंचित कर देती। पंडित ने मंत्रों का उच्चारण किया और गंगा उमड़ पड़ी। जल की एक विशाल तरंग ने राक्षस को निगल लिया। सभी स्तब्ध रह गए—यह दैवीय चमत्कार था या प्रकृति का प्रतिफल?  

महादेवी ने पंडित का कर-स्पर्श किया, किंतु तभी एक विकृतमुखी तपस्विनी चीख उठी—"प्रेम करोगे तो गंगा का तट सूख जाएगा!" उसने घोर मंत्र पढ़ा, जिससे वृक्षों के पत्र मुरझा गए। वायु में विषैली गंध फैल गई। पंडित ने गहन निश्वास लेते हुए महादेवी से कहा—"इस जन्म में नहीं, पर अगले सभी जन्मों में तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।" उनके शब्दों में वह शांति थी जो समुद्र की गहराइयों में सोए मोती की तरह मौन रहती है।  

गंगा ने दोनों को अपनी लहरों में एक क्षण के लिए समेटा। तारा ने मनस्विनी के अश्रु पोंछे, राम मनोहर ने खड्ग को विराम दिया, और नित्यानंद का हास्य अश्रुधारा बन गया। पंडित और महादेवी ने विष्णु के मंदिर में शपथ ली—"प्रत्येक युग में तुम मेरे होगे," "प्रत्येक जन्म में तुम्हारी छाया ढूँढूँगी।" गंगा की अविरल धारा उनके वियोग की साक्षी बनी, और यह कथा उसी प्रकार अमर हो गई जैसे नदी का नाद।  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

शोध-प्रबन्ध : कामसूत्र के पृष्ठों में अंकित यौवन-सृजन -पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

(एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से) मैं नहीं, कोई वात्स्यायन बैठा है इस लेखनी के पार, शास्त्र के श्लोकों में टटोल रहा, रति-रहस्य का सार। यह यौवन न...