बारह वर्ष... एक लंबा समय, जिसमें प्रेम के बीज ने अंकुरित होकर वट वृक्ष का रूप ले लिया, पर उसकी जड़ें आज भी मौन की मिट्टी में दबी हैं। पंडित और महादेवी के बीच यह प्रेम किसी सनातन नदी की धारा के समान है — निर्विराम, गंभीर, और अपने मार्ग से कभी विचलित न होने वाली। दोनों इस सत्य को जानते हैं, मानते हैं, पर स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाते। उनकी आँखें वार्तालाप करती हैं, पर ओठ मौन रहते हैं। हृदय की भाषा शब्दों से परे है, पर वियोग की पीड़ा शब्दों में सनी हुई।
इस प्रेम में कोई पेचीदगी नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। यह उस दीपक की ज्योति के समान है, जो मंदिर के एकांत कोने में जलता रहता है — निःस्वार्थ, अविरल। महादेवी के प्रति पंडित का अनुराग भक्ति के समर्पण सदृश है। वे उसके चरणों में पुष्प अर्पित करने की कामना रखते हैं, पर दूरी के कारण केवल मन के मंदिर में समर्पित कर पाते हैं। महादेवी की मुस्कान उनके लिए प्रसाद है, और उसका अभाव एक तपस्या।
प्रत्येक मिलन पर दृष्टि झुक जाती है, क्योंकि नेत्रों में छिपे सागर को बहने से रोकना दुष्कर होता है। वे भयभीत हैं कि शब्द उनके भावों का उपहास बना देंगे। इसलिए, मौन ही उनका सच्चा साथी बन गया है। वियोग की यह वेदना उन्हें दग्ध करती है, पर उसी अग्नि में उनका प्रेम शुद्ध भी होता है। यह पीड़ा उन्हें सिखाती है कि प्रेम केवल सुख की गाथा नहीं, बल्कि संघर्ष और साधना का नाम भी है।
यह गाथा अधूरी है, पर इसी में इसकी सार्थकता निहित है। क्योंकि प्रेम की मूल चेतना "प्राप्ति" में नहीं, "अनुभूति" में सन्निहित होती है। पंडित और महादेवी का यह सफर संभवतः कभी गंतव्य तक न पहुँचे, पर उनकी निष्कपट भावनाएँ उन्हें एक-दूसरे से बाँधे रखेंगी। यही प्रेम की विडंबना और सौंदर्य है — जो स्पर्श करके भी अछूता रह जाता है, टूटकर भी अमर हो जाता है।
- भारमल गर्ग "विलक्षण" 🌸

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