गुरुवार, 8 मई 2025

गंगा-तट का अमर विरह -विलक्षण



गंगा की अगाध धारा पर सांझ की लालसा छा गई। घंटियों की मंद्रित ध्वनि और भक्तों के जप-तप से आकाश गुंजायमान हो उठा। पंडित विश्वंभरनाथ, जिनकी तपस्या से गंगा-तट की बालू भी तप्त हो उठती थी, स्नानोपरांत समाधि में लीन थे। तभी उनकी दृष्टि महादेवी अमृतांशी पर ठहर गई, जो कमल-दल सी कोमलता लिए जल से प्रकट हुईं। उनके आभूषणों की आभा से गंगा की लहरें चमक उठीं। यह पल था जब दो आत्माओं का स्पर्श बिना किसी शब्द के ही अनंत युगों के विरह का सूत्रपात कर गया।  

महादेवी की सखी मनस्विनी, जिसका हृदय विरह की ज्वाला से धधक रहा था, ने पंडित की ओर संकेत किया। तभी नित्यानंद शुक्ल, चटख रंगों से सजे मुखौटे लिए मुस्कुराते हुए आ धमके। "अहो! यह तो मन्मथ की प्रेम-लीला है!" उनकी हास्य-विनोद भरी वाणी से भक्तजन ठहाकों में भर उठे। इतने में ही राम मनोहर पांड्या, शस्त्रों से सुसज्जित योद्धा, खड्ग पर पुष्प अर्पित करते हुए गर्जे, "धर्म की रक्षार्थ प्राणों का मोह त्यागने वाला ही सत्य का साथी बनता है!" उनके स्वर में वह प्रखरता थी जो शत्रुओं के हृदय में कंपन भर देती।  

महादेवी की अनुजा तारा जिज्ञासावश एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर की ओर दौड़ पड़ी। अचानक उसे एक शिला से रक्त बहता दिखाई दिया। पीछे से एक कर्कश स्वर गूँजा—"यहाँ प्रेतात्माओं का साम्राज्य है!" वह चीखती हुई भागी, मानो उसके पैरों के नीचे धरती खिसक रही हो। दूर खड़ी मनस्विनी ने अपने विछोहित प्रियतम की स्मृति में गंगा से करुण स्वर में प्रार्थना की—"हे मैया! मेरे विरह के आँसुओं को भी अपनी अथाह धारा में समा लो।" उसकी वेदना में वह गहराई थी जो सदियों के सूनेपन को चीर देती।  
  
आकाश में वज्र टूटा। नित्यानंद ने सावधान किया—"यह तो काल के प्रकोप का आगाज है!" धरती चीख उठी और एक विकराल राक्षस प्रकट हुआ। राम मनोहर ने खड्ग उठाया—"अधर्म की जड़ काट डालो!" उनके प्रत्येक प्रहार में वह उग्रता थी जो युद्धभूमि को रक्त से सिंचित कर देती। पंडित ने मंत्रों का उच्चारण किया और गंगा उमड़ पड़ी। जल की एक विशाल तरंग ने राक्षस को निगल लिया। सभी स्तब्ध रह गए—यह दैवीय चमत्कार था या प्रकृति का प्रतिफल?  

महादेवी ने पंडित का कर-स्पर्श किया, किंतु तभी एक विकृतमुखी तपस्विनी चीख उठी—"प्रेम करोगे तो गंगा का तट सूख जाएगा!" उसने घोर मंत्र पढ़ा, जिससे वृक्षों के पत्र मुरझा गए। वायु में विषैली गंध फैल गई। पंडित ने गहन निश्वास लेते हुए महादेवी से कहा—"इस जन्म में नहीं, पर अगले सभी जन्मों में तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।" उनके शब्दों में वह शांति थी जो समुद्र की गहराइयों में सोए मोती की तरह मौन रहती है।  

गंगा ने दोनों को अपनी लहरों में एक क्षण के लिए समेटा। तारा ने मनस्विनी के अश्रु पोंछे, राम मनोहर ने खड्ग को विराम दिया, और नित्यानंद का हास्य अश्रुधारा बन गया। पंडित और महादेवी ने विष्णु के मंदिर में शपथ ली—"प्रत्येक युग में तुम मेरे होगे," "प्रत्येक जन्म में तुम्हारी छाया ढूँढूँगी।" गंगा की अविरल धारा उनके वियोग की साक्षी बनी, और यह कथा उसी प्रकार अमर हो गई जैसे नदी का नाद।  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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