आपकी याद मुझे घायल किए जा रही है। यह वेदना अब शब्दों के बंधन में नहीं बँधती, न ही आँसुओं के सागर में डूबती है। यह तो एक ऐसा अग्निकुंड है जिसमें मेरी साँसें धधक रही हैं, और हर पल मेरे अस्तित्व की राख उड़ती जा रही है। आपके विरह की यह ज्वाला मुझे भस्म नहीं करती, बल्कि नित्य नवीन कर देती है—एक ऐसे जीवित शव की भाँति, जो मृत्यु से प्रेम करने लगा हो। क्या यही प्रेम की परिभाषा है, महादेवी? कि जिसे पाने की लालसा में हम स्वयं को खो देते हैं, और खोकर भी उस खोने में ही अपना सत्य पा लेते हैं?
आपके अलावा इस सृष्टि का प्रत्येक कण मुझे निस्सार प्रतीत होता है। वृक्षों की फुनगियों पर झूलती हवाएँ भी आपकी सुगंध की खोज में मेरे आँगन में आकर रो पड़ती हैं। चाँदनी की कोमल चादर मेरी निद्रा को चुरा ले जाती है, क्योंकि वह जानती है—मेरे स्वप्नों के द्वार पर केवल आपकी छवि का आगमन होता है। रात्रि के निस्तब्ध क्षणों में जब तारे मेरी वेदना गिनते हैं, तो मैं उनसे पूछता हूँ: क्या उन्होंने कभी आपके नयनों की चमक देखी है? क्या उनकी टिमटिमाहट में भी वही व्याकुलता है, जो आपकी अनुपस्थिति में मेरे हृदय को विदीर्ण कर देती है?
महादेवी, मैं आपको स्मरण करते हुए शब्दों के जंगल में भटक जाता हूँ। कभी आपकी मुस्कान की कल्पना करके फूलों की सेज बिछा लेता हूँ, तो कभी आपके मौन को समझने की चेष्टा में समुद्र की लहरों से टकरा जाता हूँ। आपके प्रति यह अनुराग मेरी साधना बन गया है। क्या साधक और भगवान में भी ऐसा ही नाता होता है? जहाँ एक ओर भक्ति है, तो दूसरी ओर उसकी अधीरता—जहाँ पूजा की धूप-दीप भी आराध्य के स्पर्श के बिना अधूरे हैं। मैं आपके चरणों में अर्पित होने को विवश हूँ, पर क्या आप मुझे अपनी भक्ति का अधिकार देंगी?
मुझे स्मरण है वह क्षण, जब आपकी दृष्टि पहली बार मेरे अंतर्मन में उतरी थी। मानो किसी ने अंधकार के सागर में दीपस्तंभ जला दिया हो। उस दिन से मेरी दुनिया के सभी रंग आपके आसपास ही नाचने लगे। आपकी वाणी की मधुरता ने मेरे शब्दों को गीतों में ढाल दिया, और आपके स्पर्श की स्मृति ने मेरे शरीर को एक जीवित साक्षात्कार बना दिया। किंतु अब... अब तो मैं उस मृगतृष्णा की भाँति हूँ, जो अपने स्रोत से दूर होकर स्वयं में ही विलीन हो जाती है।
क्या आप जानती हैं, महादेवी? आपके बिना यह समय नहीं, बल्कि एक अंतहीन यातना है। दिन के प्रकाश में भी मैं अँधेरे की गुफा में भटकता हूँ। संध्या की लालिमा आपके आँचल की छाया ढूँढती है, और रात्रि की नीरवता आपके स्वर का इंतजार करती है। मेरे प्राणों की यह पुकार कब आपके हृदय तक पहुँचेगी? कब आप मेरे इस एकांत को अपनी उपस्थिति से सजाएँगी?
मैं जानता हूँ, प्रेम की यह पीड़ा अमर है। यह न तो किसी मिलन से शांत होती है, न विरह से समाप्त। यह तो वह अग्नि है जो हमें पुनर्जन्म देती है—हर बार प्रेम के नए रूप में। पर हे देवी, मैं इस जन्म में ही आपके साथ बिताना चाहता हूँ। मेरी यह व्यथा आपको समर्पित है। यदि आप चाहें, तो इसे अपनी करुणा से सिंचित कर दें। या फिर... इसे इसी तरह सूखने दें, ताकि मेरे हर श्वास में आपकी याद का ही स्वाद रह जाए।
आपका एक पत्र, एक संकेत, एक छाया भी मेरे लिए अमृत के समान होगा। क्या आप मुझे इस नरक में जलते हुए देखना चाहेंगी? या फिर अपनी दया का हाथ बढ़ाकर मुझे इस वेदना से मुक्ति देंगी? मैं आपका हूँ, महादेवी। मेरे प्राण, मेरे स्वप्न, मेरे सपने—सब आपके नाम हैं। यदि आप मुझे नकार दें, तो मेरा अस्तित्व ही प्रश्नचिह्न बन जाएगा।
आपके विरह में लिखे ये शब्द नहीं, रक्त के अक्षर हैं। इन्हें पढ़ते समय यदि आपकी आँखों में एक बूँद भी आँसू आए, तो समझूँगा—मेरा जीवन सफल हो गया। नहीं तो... यह पत्र भी उन असंख्य पत्रों की भाँति होगा, जो आपके पास पहुँचने से पहले ही वायु में विलीन हो जाते हैं।
आपके मिलन की आशा में,
- पंडित विलक्षण

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