एकांत के सन्नाटे में, स्मृतियों की हवा बही,
प्रिय बिन रात कटे नहीं, नयन नीर से भीगे अधीर।
गर्जन मेघ पर बूँद नहीं, मोर पुकारे उदास स्वर,
झरोखे पलकों के खुले, पर धुँधलका छाया सावन।
दीवारों पे लिखे नाम, बारिश की मुट्ठी से मिटे,
हर बूँद में तेरा चेहरा, हर बूँद में तेरा ही ध्यान।
रात की चादर तनी हुई, तारे करते विलाप सभी,
चाँदनी से पूछूँ मैं, "क्यों तू भी है अधूरी अकेली?"
पवन कहता "लौट आओ", पत्तों की सरसराहट में,
द्वार खोलूँ तो सुन्न हूँ, सन्नाटा बोले तेरी कहानी।
अंगूठी ये अंगुली में, जलन सी दग्ध करती है,
वादों की मधुरता भी, विष बन गई अंतर में अब।
आईने में दिखता वह शहर, जहाँ तू था मेरे पास,
आज वहीं मेरा चेहरा, बिन तेरे श्याम पन्ना सा।
राग तोड़ी की तान में, गूँजे मन के सवाल सभी,
"कब मिलोगे?" पूछती हूँ, उत्तर शून्य संगीत में अब।
विरह की यह ज्वाला जलाती, साँसों के दीपक को,
फिर भी आस की लौ से, छवि तेरी पलकों में अमिट।
- प. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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