गुरुवार, 29 मई 2025

नैन निर्झर

तन-तन तरसूँ तव तिरोहित तन रे,  
मन-मन मिलन को मृतक मन रे।  

चाँदनी चित चंचल चाहत है,  
छलकत छाती छिन छलकन सी।  
साँझ सिसकत साँस सुख बिन रे,  
बूँद-बूँद बरसे नैन ही।  
  
पलकों पंथ प्यारे पथिक प्रिय,  
टूटत तारा तम तरु टूक भर।  
नीर नयन निर्झर नित बहे रे,  
मीत मिलन को मग मोह अपर।  

काली घटा काटे कलेजा को?  
बादल बैठे बिरहिन ब्योक सा।  
सावन स्मृति सुरभि सतावत है,  
आँखों तारा अधर अधर आवत।  

दीप दिवस दग्ध दिन रैन सब,  
सपन सजनी साँवरि सुधि आई।  
चातक चकोर चंद चख चहे,  
पपीहा पिय पीउ पथ लखाई।  

मधु बिन मलय मारुत मन भाय न,  
विरह विधु विकल विधि साय न।  
प्रिय पग पंकज पाहुन पधारो,  
जीव जलधि जल बूँद तर पारो।  

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"


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