चाँदनी चम-चम चुपचाप चूमे चाँद,
मेरा मन मुग्ध मधु में मचले मदमाता।
तेरी कल्पना तन में तीव्र ताप जगाये,
तारे टूटें तब भी तुम तनिक न टलना।
तनहा तिमिर में तपता तन तव पुकारे,
तृषा तुम, तृप्ति तुम, तुम ही तन मन धन धामा।
बूँद-बूँद बरस बिखरूँ तव उद्यान मधुरे,
बेधड़क पवन बन तव पलँग पहुँचूँ जाएँ।
बाँहों के बन्धन में बस तव बसेरा करूँ,
बिछोह बिधुरता बिन तव बर्दाश्त न पाएँ।
साँझ सरसराती सुनूँ तव श्वास सुहानी,
स्वप्न सरिता में सजे तव सौन्दर्य पुष्प भरे।
सागर सम गम्भीर शान्ति तव सान्निध्य पाये,
सकल सृष्टि समेट तव शाटिका तले सिमट जाएँ।
मुसकान मनोहर म्लान मन को मोह ले तव,
मिलन मधुरिमा मेरे मौन को मुखर करे।
मैं मिट जाऊँ तव मन मन्दिर में पूजा बन,
मम तन-मन-प्राण तव मूर्तिमान में समा जाएँ।
प्राण प्रवाह प्रतिपल तव प्रेम प्रतिमा धरे,
परछाईं पलकों पर प्रीति प्रतिबिम्ब बसे।
परम पुलकित प्रिये! प्रेम पीर सहूँ सदा,
पराई न हो कभी, यह प्रतिज्ञा पल पल करे॥
- प. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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