भारत के सांस्कृतिक आकाश में जिन महान विभूतियों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नवजीवन दिया, उनमें भारतेंदु हरिश्चंद्र (9 सितंबर 1850 - 6 जनवरी 1885) का नाम सर्वोपरि है। वे मात्र एक साहित्यकार नहीं, अपितु एक युग के प्रणेता, समाज सुधारक, राष्ट्रभक्त और हिंदी के स्वाभिमान के प्रखर पक्षधर थे। उनके अल्पकालिक जीवन (मात्र 34 वर्ष) में समाहित उनका अथक सृजन और समाजोन्मुखी चिंतन आधुनिक हिंदी साहित्य की नींव का प्रस्तर सिद्ध हुआ। उन्हें 'भारतेंदु' की उपाधि से विभूषित करना उनके राष्ट्रनिर्माण के अदम्य संकल्प और योगदान को सार्थक श्रद्धांजलि थी।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि: भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी (वाराणसी) के एक समृद्ध वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता, बाबू गोपालचंद्र, 'गिरधरदास' उपनाम से कविता रचते थे। माता पार्वती देवी धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। इस साहित्यिक और धार्मिक वातावरण ने बालक हरिश्चंद्र के मन को प्रारंभ से ही सींचा।
प्रारंभिक शिक्षा एवं प्रतिभा का विकास: पारंपरिक घराने में उर्दू-फारसी की शिक्षा प्रारंभ हुई। किंतु उनकी असाधारण प्रतिभा और अदम्य जिज्ञासा ने शीघ्र ही उन्हें हिंदी, संस्कृत, बंगला, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं के अध्ययन की ओर प्रेरित किया। मात्र पाँच वर्ष की अवस्था में उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई। कहा जाता है कि नौ वर्ष की आयु में मृच्छकटिकम् नाटक देखकर उन्होंने अपना पहला नाटक 'विद्यासुंदर' लिख डाला। पंद्रह वर्ष की अल्पायु में पिता का देहांत हो गया, जिससे परिवार पर आर्थिक संकट छा गया, किंतु इसने उनकी साहित्य साधना को और अधिक गहन बना दिया।
साहित्यिक योगदान: विधाओं का नवनिर्माण एवं भाषा का शिल्प
भारतेंदु जी ने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में सृजन किया और उन्हें नया रूप दिया। उनकी रचनाएँ न केवल साहित्यिक बल्कि सामाजिक-राष्ट्रीय चेतना का प्रखर दस्तावेज़ हैं।
नाटक: समाज का दर्पण और जागृति का माध्यम:
ऐतिहासिक नाटक: 'सत्य हरिश्चंद्र' (1875), 'चंद्रावली' (1876), 'भारत दुर्दशा' (1880) जैसे नाटकों में उन्होंने ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों के माध्यम से वर्तमान की समस्याओं – विदेशी शासन, देश की दुर्दशा, सामाजिक कुरीतियों, नैतिक मूल्यों – पर करारा प्रहार किया। 'भारत दुर्दशा' तो अंग्रेजी शासन और देश की गुलामी पर एक तीखा व्यंग्य है।
सामाजिक नाटक: 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' (1873) जैसे नाटकों में उन्होंने पाखंड, अंधविश्वास और सामाजिक विषमताओं को बेनकाब किया। 'अंधेर नगरी' (1881) एक शास्त्रीय व्यंग्य है जो मूर्खतापूर्ण शासन व्यवस्था और जनता की अंधानुकरण प्रवृत्ति पर कटाक्ष करता है। यह नाटक आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
प्रहसन: 'भारत जननी', 'पाखंड विडंबन' जैसे प्रहसनों में उन्होंने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक बुराइयों को उजागर किया।
योगदान: उन्होंने नाटक को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर जनजागरण और सामाजिक सुधार का शक्तिशाली हथियार बनाया। उनके नाटकों में संवाद योजना, चरित्र-चित्रण और नाटकीयता उच्च कोटि की है।
कविता: भाव और विचार का सुंदर समन्वय:
राष्ट्रभक्ति: 'भारत भारती' (1884) उनकी अमर काव्य कृति है, जो भारत के गौरवशाली अतीत, वर्तमान दुर्दशा और भविष्य की आशा का मार्मिक वर्णन करती है। "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल..." की पंक्तियाँ हिंदी के प्रति उनके अटूट प्रेम और राष्ट्रीय पुनर्जागरण में मातृभाषा की केंद्रीय भूमिका को दर्शाती हैं।
प्रेम और भक्ति: 'प्रेम माधुरी', 'प्रेम तरंग', 'फूलों का गुच्छा', 'होली' जैसी रचनाओं में श्रृंगार और भक्ति भावना की सुंदर अभिव्यक्ति है। उनकी कविताएँ ब्रजभाषा की माधुर्यपूर्ण शैली से ओतप्रोत हैं।
सामाजिक चेतना: 'अंधे बधिर कूपमंडूक', 'कवि वचन सुधा' जैसी कविताओं में उन्होंने समाज में व्याप्त अज्ञानता, रूढ़ियों और विदेशी मोह पर प्रहार किया।
योगदान: उन्होंने कविता को मनोरंजन की परिधि से निकालकर राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक उत्थान का वाहक बनाया। ब्रजभाषा को उन्होंने नया जीवन और लोकप्रियता दी।
निबंध एवं आलोचना: विचारों की स्पष्टता और तर्कशक्ति:
'सुलोचना', 'परिहास वंचक', 'मदालसा' आदि निबंध संग्रहों में उन्होंने स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह, सामाजिक समानता, राष्ट्रप्रेम जैसे गंभीर विषयों पर प्रखर विचार रखे। उनके निबंध सरल, सुबोध, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली हैं। उन्होंने आलोचना को भी स्थापित किया। 'कविवचन सुधा' और 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके आलोचनात्मक लेख साहित्य के मानदंड स्थापित करने वाले थे।
पत्रकारिता: जनमत निर्माण का प्रबल माध्यम:
भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी पत्रकारिता के जन्मदाता माने जाते हैं। उन्होंने 'कविवचन सुधा' (1867, मासिक), 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' (1873, साप्ताहिक) और 'बालाबोधिनी' (स्त्रियों के लिए, 1874) जैसे प्रभावशाली पत्र-पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन किया। इन पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने न केवल साहित्य को प्रोत्साहन दिया, बल्कि समसामयिक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर जनमत जागृत किया। वे देशप्रेम, स्वदेशी, समाज सुधार और हिंदी प्रचार के प्रबल प्रवक्ता बने। उनकी पत्रकारिता निडर, स्पष्टवादी और जनहितैषी थी।
भाषा शैली: खड़ी बोली का मार्ग प्रशस्त करना:
भारतेंदु जी ने अपनी अधिकांश रचनाएँ ब्रजभाषा में लिखीं, जो उस समय काव्य की प्रमुख भाषा थी। उनकी ब्रजभाषा सरल, प्रवाहमयी और अत्यंत माधुर्यपूर्ण है। किंतु, उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान खड़ी बोली हिंदी को गद्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना था। उन्होंने अपने निबंधों, नाटकों (गद्य भाग), विशेषकर पत्रकारिता में खड़ी बोली का प्रयोग किया और उसे परिष्कृत किया। उन्होंने भाषा को जनसामान्य तक पहुँचाने पर बल दिया। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ उर्दू, फारसी और लोकभाषा के शब्दों का भी स्वाभाविक प्रयोग मिलता है। यही कारण है कि उनकी भाषा में एक विशिष्ट मिश्रित शैली ('भारतेंदु युगीन शैली') दिखाई देती है, जो साहित्यिक होते हुए भी सहज ग्राह्य है। उन्होंने ही हिंदी गद्य की वह नींव डाली जिस पर आगे चलकर प्रेमचंद जैसे महान साहित्यकारों ने भव्य भवन खड़ा किया।
सामाजिक चिंतन एवं योगदान: कुरीतियों के विरुद्ध अलख जगाना:
भारतेंदु हरिश्चंद्र केवल साहित्यकार नहीं, समाज सुधारक की भूमिका में भी अग्रणी थे। उनका समूचा साहित्य सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध एक जीवंत प्रतिरोध है।
स्त्री शिक्षा एवं उत्थान: उन्होंने स्त्री शिक्षा को विशेष महत्व दिया। 'बालाबोधिनी' पत्रिका इसी उद्देश्य से प्रकाशित की गई। उन्होंने विधवा विवाह और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं का घोर विरोध किया। 'सुलोचना' निबंध स्त्री शिक्षा पर उनके प्रगतिशील विचारों का प्रमाण है।
सामाजिक समरसता: उन्होंने जाति-पांत के भेदभाव और छुआछूत की निंदा की। उनका साहित्य मानवीय समानता और भाईचारे का संदेश देता है।
धार्मिक पाखंड विरोध: उन्होंने धर्म के नाम पर फैलाए गए पाखंड, कर्मकांड और अंधविश्वासों पर निरंतर प्रहार किया। 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' नाटक इसका ज्वलंत उदाहरण है।
स्वदेशी प्रेम: उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन देने का आह्वान किया। उनका जीवन स्वयं स्वदेशी भावना से ओतप्रोत था।
राष्ट्रीय चेतना: देशभक्ति की अलख जगाना:
भारतेंदु युग भारतीय राष्ट्रीय चेतना के उदय का काल था। भारतेंदु जी इसके सबसे प्रमुख साहित्यिक प्रवक्ता थे।
अतीत का गौरवगान एवं वर्तमान की पीड़ा: उन्होंने भारत के प्राचीन गौरव, वैभव और ज्ञान-विज्ञान को याद दिलाकर देशवासियों में आत्मगौरव जगाया। साथ ही, अंग्रेजी शासन के अत्याचार, देश की आर्थिक लूट और राजनीतिक गुलामी पर करुण किंतु तीखा प्रहार किया। 'भारत दुर्दशा' नाटक और 'भारत भारती' काव्य इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
मातृभाषा का महिमामंडन: उनका यह दृढ़ विश्वास था कि राष्ट्र की उन्नति उसकी मातृभाषा की उन्नति के बिना असंभव है। "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल..." का उद्घोष करके उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का अभियान चलाया। उन्होंने हिंदी को राजकाज और शिक्षा की भाषा बनाने की वकालत की।
राष्ट्रीय एकता का आह्वान: उनके साहित्य में सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का स्पष्ट स्वर मिलता है। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।
विरासत एवं महत्त्व: हिंदी साहित्य के स्तंभ:
भारतेंदु हरिश्चंद्र का महत्त्व उनके साहित्यिक अवदान से कहीं अधिक व्यापक है:
हिंदी नवजागरण के पिता: उन्होंने हिंदी साहित्य को मध्यकालीन रूढ़ियों से मुक्त कराकर आधुनिक युगबोध से जोड़ा। उनके समय को 'भारतेंदु युग' (1857-1900) के नाम से जाना जाता है, जो हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण काल था।
भाषा का शिल्पी: उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को गद्य की सशक्त भाषा बनाने का पथ प्रशस्त किया। उनके द्वारा विकसित गद्य शैली आगे चलकर हिंदी गद्य का आधार बनी।
सामाजिक-राष्ट्रीय चेतना का स्रोत: उनका साहित्य समाज सुधार और राष्ट्रीय जागरण का प्रेरणास्रोत बना। उन्होंने साहित्य को समाज से जोड़कर उसे जीवंत और प्रासंगिक बनाया।
पत्रकारिता के प्रणेता: उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी और उसे जनजागरण का प्रभावी माध्यम बनाया।
विधाओं का पुनरुद्धारक: उन्होंने नाटक, कविता, निबंध, आलोचना सभी विधाओं को नया जीवन और दिशा दी। विशेषकर नाटक को लोकप्रिय और प्रभावशाली बनाने में उनका योगदान अतुलनीय है।
अग्रदूत: उन्होंने प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद जैसे अनेक महान साहित्यकारों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन एक दीपस्तंभ की भांति है, जिसने हिंदी साहित्य के अंधकारमय आकाश को प्रकाशित किया। उनकी साहित्य साधना, समाज सुधार की अदम्य लगन और राष्ट्रप्रेम की अग्नि ने भारतीय मानस को नई दिशा दी। मात्र 34 वर्षों की अल्पायु में उन्होंने जो विराट साहित्यिक और सामाजिक कार्य किया, वह चकित कर देने वाला है। वे सच्चे अर्थों में 'भारत के इंदु' (चंद्रमा) थे, जिनकी ज्ञान और प्रेरणा की किरणों ने हिंदी जगत को आलोकित किया। आज भी जब हम हिंदी की गरिमा, राष्ट्रभाषा के प्रश्न, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की बात करते हैं, तो भारतेंदु हरिश्चंद्र का चिंतन और संघर्ष हमारे लिए प्रकाशस्तंभ बना हुआ है। उनका नारा "हिंदी हिंदू हिंदुस्तान" उस युग में भाषाई और सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान का प्रतीक था, जो आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना का अंग है। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र जी का व्यक्तित्व और कृतित्व हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।
- भारमल गर्ग "विलक्षण"

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