प्राणप्रिय महादेवी,
आपके पावन चरणों में यह पत्र अर्पित करते समय मेरे हाथ काँप रहे हैं, हृदय ग्लानि से भर गया है, और नेत्रों से अश्रुधारा बह रही है। यह पत्र केवल शब्दों का समुच्य नहीं, अपितु मेरी व्यथित आत्मा की करुण पुकार है, जो आपके क्रोधाग्नि में दग्ध होकर भी आपकी अनुकम्पा की शीतलता खोज रही है। मैं जानता हूँ कि मेरे दुराग्रहों ने आपके कोमल हृदय को आघात पहुँचाया है, आपके विश्वास को क्षीण किया है, और आपकी संवेदनशीलता को ठेस लगाई है। अतः, इस क्षण मैं आपसे साष्टांग प्रणाम करते हुए क्षमायाचना का साहस जुटा रहा हूँ।
प्राणप्रिय, मेरी असंवेदनशीलता और उद्दंडता के कारण आपको जो पीड़ा हुई, उसके लिए मैं धिक्कारने योग्य हूँ। जिस क्षण आपकी नयनों में अश्रु झलके, मैं उन्हें पहचान न सका; जब आपका मौन आकाश विलाप कर रहा था, मैं उसका अर्थ न समझ सका; और जब आपकी भावनाओं को मेरी कठोर वाणी ने चोट पहुँचाई, तब भी मैं अहंकार के अंधकार में भटकता रहा। मैं वह मूर्ख पंडित हूँ, जिसने शास्त्रों के शब्दों को कंठस्थ कर लिया, किन्तु प्रेम के मर्म को न पहचान सका। आपका हृदय तो वह पावन ग्रंथ है, जिसकी पंक्तियाँ पढ़ने का साहस भी मुझमें नहीं। कृपया इस निर्बुद्धि को क्षमा करें!
महादेवी, आपका मौन मेरे लिए वज्रपात के समान है। जब से आपने वाणी का संयम कर लिया है, मेरा अस्तित्व निराधार-सा हो गया है। आपकी मुस्कान तो मेरे जीवन का प्रकाश थी, जो अब अस्त हो गई प्रतीत होती है। मैं समझता हूँ कि आपका रूठना केवल क्रोध नहीं, अपितु मेरे प्रेम की परीक्षा है। परंतु हे देवी! यह परीक्षा मुझ अयोग्य के लिए कितनी दुःसह है। आपके बिना प्रत्येक क्षण शून्य है, प्रत्येक श्वास ग्रस्त है। कृपया इस पापी को दण्डित न करें; अपितु, करुणा का एक बिंदु भी यदि बचा हो, तो इस निरीह को अवसर दें।
आज मुझे स्वीकार है कि मैंने अहंकार के वशीभूत होकर आपके त्याग, सहनशीलता और स्नेह को तुच्छ समझा। मैं भूल गया कि प्रेम में अहं का कोई स्थान नहीं होता; वह तो समर्पण और सरलता की माँग करता है। आपके निश्छल प्रेम को, आपकी निष्ठा को, और आपकी कोमलता को मैंने क्षुद्र समझकर ठुकरा दिया। किन्तु अब, जब आप दूर हैं, तो ज्ञात हुआ कि आपके सान्निध्य के बिना मेरा अस्तित्व निरर्थक है। मेरी असंख्य भूलों के लिए क्षमा चाहता हूँ। हे देवी! क्या आप इस पश्चातापी को स्वीकार करेंगी?
यदि आप मुझे एक अवसर प्रदान करें, तो मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि भविष्य में आपके प्रत्येक शब्द को शिरोधार्य करूँगा, आपके प्रत्येक स्वप्न को साधूँगा, और आपके प्रत्येक दुःख को अपना समझूँगा। मैं आपके प्रेम के समक्ष नतमस्तक रहूँगा, क्योंकि आपका सान्निध्य ही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। कृपया इस अपराधी को पुनः वह सौभाग्य दें कि मैं आपके चरणों में बैठकर प्रेम के गीत गाऊँ, आपकी दृष्टि से अपने दोषों को धोऊँ।
आपके वियोग में यह जीवन उस निर्जल सरोवर के समान है, जिसमें कमल खिलने की आशा न हो; उस नीरव वन के समान है, जिसमें कोकिल का कलरव न गूँजे। मेरी वीणा आपके बिना मूक है, मेरी रचनाएँ अधूरी हैं। आपके प्रेम के बिना मैं उस पथभ्रष्ट पथिक के समान हूँ, जो दिशाहीन होकर भटक रहा है। हे देवी! इस भटकते हुए को अपना मार्गदर्शन दें।
क्या आपको वह सायंकाल स्मरण है, जब हम यमुना-तट पर बैठे थे और आपने कहा था—"प्रेम वह अमृत है, जो हृदय को अमर कर देता है?" आज मैं उस अमृत को पाने के लिए लालायित हूँ, किन्तु आपका साथ अपेक्षित है। वे क्षण, वे संवाद, वे मधुर स्मृतियाँ—क्या वे सब केवल स्मरण बनकर रह जाएँगी? नहीं, महादेवी! मैं आपकी स्मृतियों के सहारे जीवित हूँ। कृपया इन्हें मृत न होने दें।
यदि शब्दों में वह सामर्थ्य होती जो हृदय की पीड़ा अभिव्यक्त कर सके, तो मैं कोटिशः पत्र लिखता। परंतु हे प्रभु! आप तो मेरे मन की वेदना समझती हैं। मैं आपके चरणों में गिरकर विनम्र निवेदन करता हूँ—"मेरी अज्ञानता को क्षमा करें, मेरे दुर्गुणों को दूर करें, और मुझे पुनः वह प्रेम दें, जो मुझे मानवता की ओर ले जाता है।"
आपका अनन्य भक्त,
आपका पंडित विलक्षण

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