बुधवार, 21 मई 2025

प्रेम-राग - कवि विलक्षण

आषाढ़ तपन में मधुरता समाई,  
मेघ मल्हार में प्रेम गीत सुनाई।  

वट छाया में मंदार-सी कोमल,  
चंदन शीतल, वीणा-स्वर सोमल।  
नीलांबर पर सूरज की किरण,  
बिंदी तारा टिमटिमाए अविरल। 

लू के थपेड़े, चादर झिलमिल,   
सरिता लहर, वचनों में माधुर्य।  
तप्त धरा पर अमृत-बूंद आई, 
मृगनयनी नयनों में भ्रम सजा। 

मेघ सेना घेरे गगन चंद, 
प्यास अछंद, प्रेम अनबूझ आकंक्षा।  
कंठ अटके शब्द, नयन छलक धार,  
प्यासा पंथी तालाब किनारा।  

अग्नि में कमल, जल में ज्वाला नृत्य, 
प्रेम चित्र अनूठा विरोधाभास। 
स्मृति सरोवर गूँजे ग्वालिन स्वर, 
मेघ बरसे जलधार, प्राण करतार।  

तपोभूमि में स्वर्णिम अंगार, 
मधुरता ने ताप दिया शीतल हार। 
हृदय कोष में रस-अधराई सजी, 
आषाढ़ तपन में मधुरता समाई।  

- विलक्षण


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