रविवार, 18 मई 2025

आषाढ़ की तपन में मन की मधुरता

महीना आषाढ़ था। वसंत की मादकता विदा हो चुकी थी, मानो कोई गायिका रागिनी गाते-गाते अचानक मौन धारण कर ले। सूर्य की ज्वलंत किरणें धरती को तपोभूमि बना रही थीं—जैसे स्वर्णिम अंगारों से सजा कोई तपस्वी पृथ्वी पर तांडव कर रहा हो। आकाश में मेघों की सेना संगठित होकर खड़ी थी, पर उनके तूर्यनाद से पूर्व की यह शांति ऐसी लगती थी, जैसे रणभूमि में वीणा बज उठी हो। वातावरण में उमस का साम्राज्य था; पत्ते धूल से लथपथ होकर झड़ने को विवश थे—मानो प्रकृति ने उन्हें तपस्या के लिए दंडित किया हो।  

किंतु विद्यालय प्रांगण में खड़ी महादेवी के अस्तित्व में वह उमस नहीं, वरन् शीतल वायु की सुगंधित लहरें थीं। उसकी मुसकान मंदार के फूल सी कोमल थी, जिसमें चंदन की शीतलता समाई हुई थी—जैसे तप्त तालाब में कमलिनी का प्रस्फुटन। जब वह बोलती, तो उसकी वाणी में सरस्वती का माधुर्य था, मानो वीणा की तारों से सरिता का गीत गूँज रहा हो। आषाढ़ की भीषण गरमी और उसकी मंदार-सी मुसकान के बीच का यह विषमयोग, ऐसा लगता था मानो अग्नि और जल एक साथ नृत्य कर रहे हों।  

उस दिन उसने आकाशी नीले कुर्ते पर सुनहरी कढ़ाई वाला वस्त्र पहना था—जैसे मेघों के बीच सूर्य की किरणें छिटकी हों। कमर में बँधी गहरी नीली धोती पर बादलों-सी श्वेत बेलबूटे थे, मानो कोई चित्रकार नभचित्र को वस्त्र पर उतार दे। माथे की बिंदी अमावस्या के तारे की तरह टिमटिमा रही थी—ऐसे लगता था, ज्योतिर्विद् ने अंधकार में दीपक जलाकर नक्षत्रों को आमंत्रित किया हो। वटवृक्ष की छाया उस पर पड़ रही थी, जैसे धरती माता ने स्वयं अपनी अँगुलियों से उसे सूर्य के ताप से बचाने के लिए छत्र धर दिया हो। उसकी आँखों की गहराई शांत सरोवर-सी थी, जिसमें मेघों का प्रतिबिंब झिलमिला रहा हो।  

जब वह हँसी, तो उसकी ध्वनि में बाँसुरी के सुरों-सी मिठास थी—जैसे कोई ग्वालिन बादलों को बुलाते हुए "मेघ मल्हार" गा रही हो। उसके वचन सरिता की लहरों-से कोमल थे, जो शिलाओं से टकराकर गीत गुनगुनाती हों। उसके समीप बैठी कन्याएँ उसकी ओर मृगनयनी बनकर देखती रह जातीं—मानो कमलदल पर बैठी भ्रमर हों और महादेवी उनके लिए पुष्प-रस समेटे खड़ी हों।  

तभी पंडित प्रांगण में आया। आषाढ़ की लू ने उसके मस्तक पर पसीने की धाराएँ बहा दी थीं, पर महादेवी को देखते ही वह स्तब्ध रह गया। उसके गालों पर छाई लालिमा मौसम की गरमी नहीं, बल्कि अंतरंग में उठते भावों का द्योतक थी। वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द कंठ में अटक गए—जैसे प्यासा पथिक तालाब के किनारे पहुँचकर भी जल न पी सके। उसका मौन ही उसकी भाषा बन गया। उसे लगा, मानो उसके हृदय में अचानक कोई कुम्भकार मिट्टी में अमूल्य मोती जड़ रहा हो।  

यह घटना केवल भावुकता नहीं, वरन् प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का सहज संगम थी। महादेवी की शीतलता ने आषाढ़ के ताप को सहनीय बना दिया था—ठीक वैसे ही जैसे सूखी धरती मेघों की प्रतीक्षा में आशा समेटे रहती है। उसका अस्तित्व एक सुखद विरोधाभास था: दहकते अंगारों पर खिला कमल, या तपते मरुथल में बहता झरना। उसकी मुसकान, वाणी और सरल सौंदर्य ने मिलकर एक ऐसी मधुर स्मृति रच दी, जो हृदय के कोमल कोने में सदैव पलती रहेगी।

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण" 
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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