रविवार, 8 जून 2025

नाटक : प्रेम की प्रतीक्षा - भारमल गर्ग

(दृश्य: पुष्पपुर नगर का एक मनोहर उद्यान। वसन्त ऋतु। चम्पक, बकुल, मल्लिका आदि पुष्प खिले हैं। भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। मधुर एक वटवृक्ष के नीचे खड़ा है, किन्तु उसका मन उदास एवं चिन्ताकुल है। उसकी दृष्टि सदैव मार्ग की ओर लगी रहती है। वह अत्यन्त व्यग्र प्रतीत होता है।)

मधुर: (स्वगत, गहन निश्वास लेते हुए) हा! कष्टसागर! यह हृदय क्यों इतना विह्वल है? प्रातःकाल से अरुणोदय का सुन्दर तमालवर्ण दर्शन हुआ, पक्षियों का मधुर कलरव कानों में पड़ा, मन्द-मन्द समीर सुगन्धित पुष्पों का स्पर्श लेकर चल रही है... परन्तु... (कण्ठ रुंध आता है) परन्तु मेरे नयनों के आनन्द, मेरे जीवन के प्राण, मेरी मालिनी का दर्शन आज नहीं हुआ! कहाँ गई वह?

(वह पुनः दूर तक देखता है, कुछ पथिक आते-जाते दिखाई देते हैं, पर मालिनी नहीं।)

मधुर: (व्याकुल होकर) सत्य कहा उस महात्मा ने – "विरहाग्नि सर्वाग्निभ्योऽपि दारुणा"। कैसा विचित्र वेदना है यह! उसके अभाव में ये सुन्दर पुष्प भी कंटक-समान प्रतीत होते हैं। यह मधुर पवन भी विषधर की फुँफकार सदृश लगती है। हे प्रभो! क्या कोई अपराध हुआ है मेरा? क्यों वंचित कर रहे हो मुझे उसके दर्शन से? (अपने हृदय पर हाथ रखकर) हृदय! धैर्य धारण कर। कदाचित किसी गृहकार्य में व्यस्त होगी। प्रतीक्षा करो, अवश्य आएगी।

(कुछ क्षण रुककर, फिर अधीर हो जाता है।)

मधुर: नहीं! यह विलम्ब असह्य है! प्रतिदिन वह प्रातःकाल ही इसी वटतले आकर पुष्प चुनती थी। आज तो सूर्य मध्याकाश में विराजमान होने को है! कुछ अनिष्ट तो नहीं? हा! यह चिन्ता मेरे मर्म को क्षत-विक्षत कर रही है। मुझे जाना चाहिए... उसके गृह की ओर... किन्तु बिना निमन्त्रण के? उचित नहीं। (दुविधा में पड़ जाता है) क्या करूँ? किधर जाऊँ? मेरे प्राण तो उसी के पास भागे जा रहे हैं!

(वह उद्यान में अत्यन्त बेचैनी से इधर-उधर टहनने लगता है, पुष्पों को देखता है पर उनमें मालिनी का चेहरा ढूँढ़ता है। एक चम्पक का फूल तोड़कर सूंघता है और फिर विरक्त भाव से गिरा देता है।)

मधुर: (एक बकुल के वृक्ष के नीचे खड़े होकर) हे वृक्षराज! तुम तो साक्षी हो उसके सौन्दर्य की। क्या जानते हो कहाँ है वह आज? तुम्हारी शाखाएँ तो खिली हैं, पर मेरा जीवन मुरझा गया है उसके अदर्शन से। बताओ, क्या वह कुपित है? क्या मैंने कोई अज्ञात अपराध किया है? (वृक्ष की ओर देखता रहता है, मानो उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो) सुनते नहीं? सभी मूक हैं! सभी निष्ठुर!

(अचानक पक्षियों के झुण्ड का शोर सुनाई देता है। मधुर चौंककर देखता है, आशा से भर जाता है।)

मधुर: क्या? कोई आ रहा है? (दौड़कर उद्यान के प्रवेश द्वार पर जाता है, पर केवल पक्षी ही दिखाई देते हैं) केवल पक्षी... केवल पक्षी! हा निराशा! तू कितनी कठोर है!

(वह थककर एक पाषाण शिला पर बैठ जाता है, सिर हाथों में छुपा लेता है। कुछ क्षणों तक मौन रहता है।)

मधुर: (उठकर, दृढ़ निश्चय से) नहीं, यूँ बैठे रहना व्यर्थ है। मुझे अपने मित्रों के पास जाना चाहिए। सुहृद, सखा, मित्र – वे जानते होंगे। वे मेरे हितैषी हैं, अवश्य कुछ जानकारी रखते होंगे। मेरी इस व्याकुलता को वे समझेंगे। चलूँ, उन्हीं के समीप।

(मधुर उद्यान से बाहर निकलता है, उसकी चाल में बेचैनी और आशा का मिश्रण है। दृश्यान्त।)

(दृश्य: मधुर के गृह का एक सुसज्जित कक्ष। सुहृद, सखा और मित्र बैठे हुए शास्त्रार्थ कर रहे हैं। मधुर तेजी से प्रवेश करता है, उसका चेहरा पीला और व्याकुल है।)

सुहृद: (मधुर को देखकर उठ खड़ा होता है) अहो! मधुर! आगमन सुखद हो। पर तुम्हारा वदन...? क्यों इतने विषण्ण प्रतीत हो रहे हो? मानो चन्दन का तिलक धो दिया गया हो।

सखा: (हँसते हुए) अरे भाई मधुर! कहीं किसी कलह-कंदुक के खेल में हार तो नहीं गए? या फिर कोई श्लोक भूल गए जिसका दण्ड मिला?

मित्र: (गम्भीरतापूर्वक) सखा, व्यंग्य का समय नहीं है। देखो न, मधुर के नेत्रों में एक अज्ञात पीड़ा का भाव है। बैठो प्रिय मधुर, कहो क्या कारण है इस विषाद का?

मधुर: (गहरी सांस लेकर, कंपित स्वर में) हे मित्रवर! मेरी व्यथा सुनो। आज प्रातः से मेरा चित्त अत्यन्त अशान्त है। मैं उद्यान में मालिनी की प्रतीक्षा में खड़ा रहा... प्रहर के प्रहर बीत गए... परन्तु... परन्तु वह आई ही नहीं!

सुहृद: (आश्चर्यचकित) मालिनी नहीं आई? प्रतिदिन तो वह पुष्पचयन हेतु उद्यान में अवश्य आती है। यह तो अचिन्त्य बात है।

सखा: (मुस्कुराते हुए) हो सकता है आज निद्रा अधिक मीठी लग गई हो? या फिर कोई विशेष गृहकृत्य हो? अति चिन्ता मत करो, मधुर। स्त्रियों के मन तो चंचल चपलाओं के समान होते हैं।

मधुर: (उत्तेजित होकर) नहीं सखा! यह सामान्य बात नहीं है! मैं उसके स्वभाव को भलीभांति जानता हूँ। ऐसी निश्चित प्रतिज्ञा का उल्लंघन वह कभी नहीं करती। (अपनी छाती पर हाथ रखकर) यह हृदय कुछ अनिष्ट की घोषणा कर रहा है! मुझे भय हो रहा है! कहीं उसे कोई रोग तो नहीं? या... या कोई विपत्ति तो नहीं आई?

मित्र: (विचारशील भाव से) मधुर, विवेक धारण करो। अकारण भय मनुष्य को दुर्बल बनाता है। तुम्हारा प्रेम सुविदित है, किन्तु उसी प्रेम के वशीभूत होकर तुम अतिरंजना कर रहे हो। संभव है, वह किसी पारिवारिक उत्सव में व्यस्त हो।

मधुर: (अधीर होकर) मित्र! तुम सब मेरी पीड़ा को नहीं समझ रहे! यह केवल एक दिन की अनुपस्थिति नहीं है। यह मेरे जीवन के प्रकाश का अकस्मात् लोप है! मैं सब कुछ भूल गया हूँ – अध्ययन, भोजन, विश्राम! मेरी दृष्टि केवल उसी के दर्शन के लिए लालायित है। (मित्रों के चरणों की ओर देखता है) प्रिय मित्रों! मैं विनती करता हूँ, तुम सहायता करो। जाओ, उसके गृह की सूचना लाओ। जानो कि कुशल तो है वह? मेरी इस आतुरता को शान्त करो। मैं तो अब धैर्य खो बैठा हूँ।

सुहृद: (गम्भीर होकर) ठीक है मधुर। तुम्हारी यह दशा देखी नहीं जाती। तुम्हारी व्याकुलता सत्य ही अतिशय है। हम अभी चलते हैं। तुम यहीं विश्राम करो। हम तुम्हारे लिए समाचार लाते हैं।

सखा: हाँ भाई! तू तो मानो रोगग्रस्त प्रतीत होता है। चिन्ता मत कर। हम जाकर तेरी प्रेयसी का पता लगाते हैं। यदि वह कुपित है तो उसे मनाते हैं, यदि रुग्ण है तो वैद्य बुलाते हैं!

मित्र: धैर्य बनाए रखो, मधुर। अति उतावलापन कल्याणकारी नहीं होता। हम शीघ्र लौटते हैं।

(सुहृद, सखा और मित्र निकल जाते हैं। मधुर अकेला रह जाता है। वह खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगता है, उसके हाथ काँप रहे हैं।)

मधुर: (स्वगत) हे प्रभु! उनके चरण कमल शीघ्रता से चलें। वे जो समाचार लाएँ, वह मंगलमय हो। यदि वह कुपित है तो मैं सहस्र प्रणाम करूंगा, यदि रुग्ण है तो मैं वैद्य बनूंगा, यदि... (कण्ठ रुंध जाता है) नहीं, उससे भी बुरा कुछ नहीं हो सकता। हे देवगण! उसकी रक्षा करो।

(वह पुनः बैठ जाता है, पर चैन नहीं। उठता है, पानी पीने जाता है पर गिलास हाथ से छूट जाता है। वह घड़ी-घड़ी द्वार की ओर देखता है। समय काटने के लिए पुस्तक उठाता है पर शब्द अर्थहीन लगते हैं।)

मधुर: (पुस्तक फेंककर) नहीं! यह सब व्यर्थ है। जब तक उसकी सुधि नहीं मिलती, मेरा मन कहीं नहीं लगेगा। हे काल! तू कितना निष्ठुर है! तेरी गति आज मन्द क्यों हो गई है?

(काफी समय बीत जाता है। सूर्य ढलने लगता है। मधुर की व्याकुलता चरम पर पहुँच जाती है। अंततः मित्रों के पदचाप सुनाई देते हैं। मधुर दौड़कर द्वार की ओर जाता है। सुहृद, सखा और मित्र प्रवेश करते हैं। मधुर उनके चेहरे पढ़ने का प्रयास करता है।)

मधुर: (सांस रोके) क्या... क्या समाचार है? कुशल तो है? कहाँ थी वह? बोलो शीघ्र! मेरे प्राण तो कंठ में आ गए हैं!

(सभी मित्र एक दूसरे की ओर देखते हैं। सुहृद आगे बढ़ता है।)

सुहृद: (मधुर का हाथ थामकर) मधुर, प्रथम तो धैर्य धारण करो। तुम्हारी प्रियतमा पूर्णतः कुशल है। कोई अनिष्ट नहीं हुआ है।

मधुर: (राहत की सांस लेता है, फिर उत्सुकता से) तो फिर? वह आज क्यों नहीं आई? कहाँ थी?

सखा: (हँसते हुए) भाई! तू तो ऐसा व्याकुल हो रहा था मानो प्रलय आ गई हो! सुन, तेरी मालिनी तो...

मित्र: (सखा को रोककर, गम्भीरतापूर्वक) मधुर, वह नगर में ही नहीं थी।

मधुर: (चौंककर) नहीं थी? कहाँ गई? कब गई? क्यों गई? (फिर से बेचैन)

सुहृद: शान्त हो जाओ। हमने उसके गृह की परिचारिका सुशीला से बात की। उसने बताया कि...

मधुर: (काँपते हुए) क्या बताया? शीघ्र कहो!

सुहृद: मालिनी... तीन दिन पूर्व ही अपनी माता के साथ अपने ननिहाल चली गई है।

(मधुर स्तब्ध रह जाता है। उसका मुख क्रमशः विस्मय, फिर झेंप, फिर अपार लज्जा और अंत में गहन निराशा से भर जाता है। वह पीछे हटकर एक आसन पर गिर पड़ता है।)

मधुर: (मन्द स्वर में, मानो स्वयं से ही) ननिहाल? वह... वह तो ननिहाल गई हुई है? तीन दिन पूर्व? मेरी समस्त व्याकुलता... मेरा सम्पूर्ण दिवस... केवल इसलिए कि वह ननिहाल गई हुई है?

सखा: (जोर से हँसते हुए) हाँ भाई मधुर! तूने तो ऐसा तमाशा खड़ा किया मानो साक्षात कामदेव ही तेरे हृदय में बाण चला रहे हों! ननिहाल गई है, वह भी तीन दिन पहले! और तू आज जागा! (हँसता रहता है)

मित्र: (सखा को फटकारते हुए) सखा! यह उपहास का विषय नहीं है। मधुर का प्रेम सच्चा है, इसीलिए वह व्याकुल हुआ। यह उसकी निष्ठा का प्रमाण है। किन्तु मधुर, तुम्हें थोड़ा विवेक भी रखना चाहिए था। अकारण इतना भयभीत होना उचित नहीं।

सुहृद: सत्य कहा मित्र ने। मधुर, तुम्हारी भावनाएँ प्रशंसनीय हैं, किन्तु विचारशून्य भावुकता अहितकर होती है। अब तुम जान गए हो – वह सकुशल है, केवल ननिहाल गई हुई है। उसके लौटने की प्रतीक्षा करो। समय बीतेगा।

मधुर: (लज्जा और निराशा से सिर झुकाए) हे मित्रवर... मैं... मैं न जाने कैसी अविवेकपूर्ण मूर्च्छा में पड़ गया। तुम्हारे समक्ष मैं अत्यन्त लज्जित हूँ। मेरी इस अतिशय चिन्ता ने मुझे हास्यास्पद बना दिया। परन्तु... (कण्ठ भर आता है) परन्तु अब यह जानकर कि वह नगर में ही नहीं है, यह विरह और भी दारुण प्रतीत हो रहा है। ननिहाल... वह तो कोसों दूर है! कब लौटेगी? कैसे जानूँ?

सखा: (हँसी रोककर) अरे भाई! तू फिर वही! अब तो तुझे कुछ दिनों का विरह सहना ही पड़ेगा। धैर्य रख। उसकी स्मृति में कुछ सुन्दर पद्य रच ले। समय व्यतीत हो जाएगा।

मित्र: सखा का कथन सत्य है, यद्यपि उसका ढंग उचित नहीं। मधुर, अब तुम्हें प्रतीक्षा ही करनी होगी। विरह भी प्रेम का एक अनिवार्य अंग है। इस काल में स्वयं को सुदृढ़ करो, कुछ सार्थक कार्य में लगाओ।

मधुर: (उठकर, थोड़ा संयत होकर) तुम सबका हृदय से धन्यवाद, हे मित्रगण! तुमने मेरी व्यर्थ की भ्रान्ति दूर की। क्षमा करो मेरी इस अविवेकपूर्ण दशा के लिए। हाँ... अब मुझे ज्ञात हुआ कि वह ननिहाल में है। पर यह जानकारी भी मेरे हृदय को शान्त नहीं कर पा रही, बल्कि एक नई प्रकार की उदासी से भर रही है। कितने दिन? यह प्रश्न अब मेरे मस्तिष्क में घूम रहा है। (खिड़की की ओर देखकर) सूर्य अस्ताचल को जा रहा है... एक और दिन बीत गया... उसके बिना।

सुहृद: चलो, अब तुम्हें विश्राम करना चाहिए। कल नवीन उत्साह से प्रतीक्षा करना। समय सब घाव भर देता है, यहाँ तक कि विरह के भी।

(मित्र मधुर को सान्त्वना देते हुए विदा होते हैं। मधुर अकेला खड़ा रहता है, सूर्यास्त के लाल प्रकाश में उसका चेहरा विरही भाव से भरा है।)

मधुर: (स्वगत) हे दिनमणि! तू तो अस्त हो गया, कल पुनः उदय होगा। हे चन्द्रमा! तू आज रात आकाश में चमकेगा। परन्तु मेरी प्रिया का आगमन... वह कब होगा? ननिहाल... वह दूर देश। हे प्रिये! तुम्हारे विरह में ये रात्रियाँ कितनी दीर्घ प्रतीत होंगी! क्या तुम भी मुझे स्मरण कर रही होगी? क्या तुम्हारे हृदय में भी यही प्रश्न उठ रहा होगा – कब लौटूँगी? कब मिलूँगी उससे?

(वह खिड़की के पास खड़ा होकर उस दिशा में देखता है जिधर मालिनी का ननिहाल है। दृश्यान्त।)
                                 
(दृश्य: मधुर का कक्ष। कुछ दिन बीत चुके हैं। कक्ष में थोड़ी अव्यवस्था दिखती है। कुछ पन्ने बिखरे पड़े हैं जिन पर अधूरे श्लोक लिखे हैं। मधुर खिड़की के पास खड़ा है, उसका रूप सूखा हुआ, नेत्र अधमुंदे, भाव विरह से ग्रस्त हैं।)

मधुर: (स्वगत, मन्द स्वर में)
"निशि निशि जागति, दिवस दिवस सोचति,
मन ही मन मिलन की रचति कल्पना।
कबहुँ सुनि पदचाप, उर उमगि उठत चित,
परछाईं देखि दुखित होत मन मा।
हे नभ! तू बतला दे, वह कैसी है?
हे वायु! तू सुना दे, वह क्या कहती है?
हे पिक! तू गा दे, मेरा प्रेम-सन्देशा,
पर हाय! सब मूक, सब निरस, सब नीरसा।"

(वह एक पन्ना उठाता है, कुछ लिखने का प्रयास करता है, फिर कलम फेंक देता है।)

मधुर: नहीं! शब्द व्यर्थ हैं....

(दृश्य: मधुर का कक्ष। पंद्रह दिन व्यतीत हो चुके हैं। कक्ष की दशा मधुर की मनोदशा का दर्पण है—पुस्तकें अस्त-व्यस्त, मुरझाए पुष्पों के गुच्छे, अधूरे श्लोकों से भरे पन्ने फर्श पर बिखरे। संध्या का सुनहरा प्रकाश खिड़की से प्रवेश करता है, पर मधुर की आँखों में केवल अँधेरा है। वह एक टूटे आसन पर बैठा है, सिर हाथों में टिकाए, देह शिथिल। उसका वस्त्र मलिन, केश अस्तव्यस्त।)

मधुर: (स्वगत, मंद-मंद कराहते हुए)  
"है कोई जानता इस ज्वाला को जो हृदय को भस्म कर रही?  
हे प्राणप्रिया! तुम्हारे बिना ये क्षण युगों-सा क्यों बित रही?  
सूर्य उगता, सूर्य अस्त होता, चंद्र तारे नभ में खिलते हैं,  
पर मेरे जीवन की रात तो अंतहीन अंधियारी बन बैठी है!"  

(वह उठकर खिड़की के पास जाता है। दूर, आकाश में पक्षियों का एक जोड़ा उड़ता दिखता है। मधुर की आँखों में आँसू भर आते हैं।)

मधुर: (करुण स्वर में)  
"हे सखे पक्षी! तुम्हारी युगल यात्रा देखकर यह विरही हृदय चीत्कार कर उठता है। क्या तुमने दूर देश में उसकी छवि देखी? उसके अधरों पर वही मंद मंद मुस्कान तो है? हे गगनयात्री! यदि तुम उसके नगर से होकर गुजरो, मेरा यह संदेश सुनाओ—'मधुर तुम्हारी प्रतीक्षा में प्राण देने को तैयार बैठा है।'"  

(अचानक द्वार खुलता है। सुहृद, सखा और मित्र प्रवेश करते हैं। सुहृद हाथ में एक पुष्पहार लिए है, सखा मुस्कुरा रहा है, मित्र गंभीर।)

सखा: (झट से आगे बढ़कर)  
"अरे भाई मधुर! तू तो सचमुच सूखकर काँटा हो गया! क्या विरह की अग्नि में तपकर सोना बनने का संकल्प ले लिया?"  

मधुर: (निराश भाव से मुड़कर)  
"सखा, तुम्हारा हास्य आज मेरे वक्षस्थल में बाण समान चुभता है। जो पीड़ा तुम्हें हँसी लगती है, वह मेरे प्राण हर लेने को उद्यत है।"  

सुहृद: (सखा को रोकते हुए, स्नेहपूर्वक)  
"वत्स! हम तुम्हारी इस दशा से व्यथित हैं। इसीलिए तो तुम्हारे लिए कुछ सांत्वना लेकर आए हैं। देखो, तुम्हारी प्रियतमा के प्रिय चम्पक के पुष्पों का हार। इसे ग्रहण करो।"  

(मधुर हार लेता है, पर उसे सूँघते ही आँसू टपक पड़ते हैं।)

मधुर: (कंपित स्वर में)  
"यह सुगंध... यह सुगंध तो उसी के होठों की सुवास है! हाय, यह पुष्प भी उसकी स्मृति को अग्नि समान प्रज्वलित कर रहा है! (हार को हृदय से लगाते हुए) हे मालिनी! तुम कब लौटोगी? कब इस विरहिन की वेदना शांत करोगी?"  

मित्र: (धीरे से आगे बढ़कर)  
"मधुर, विवेक का सहारा लो। सुहृद ने यह हार तुम्हारे मन को बल देने के लिए भेजा है। विरह कोई नई बात नहीं। ऋषि-मुनियों ने भी इसे जीवन का अंग माना है।"  

मधुर: (आवेश से भरकर)  
"मित्र! तुम्हारा विवेक मेरे हृदय के तूफान को कैसे शांत करेगा? क्या तुम जानते हो, आज रात्रि में मैंने क्या देखा? स्वप्न में वह मेरे समक्ष खड़ी थी—आँखों में आँसू, हाथ फैलाए! 'मधुर, मुझे बचाओ!' कहती हुई! और फिर अचानक एक भयानक अंधकार उसे निगल गया! (काँपता हुआ) यह स्वप्न क्या कोई संकेत है? हे भगवान! उसे कुछ हो तो नहीं गया?"  

सुहृद: (सांत्वना देते हुए)  
"मधुर, स्वप्न मन की व्याकुलता की कल्पना मात्र होते हैं। हमने कल ही उसके घर की सेविका सुशीला से संदेश भेजा था। उसने लौटकर बताया कि मालिनी सकुशल है और अगले पूर्णिमा को लौटने की इच्छुक है।"  

सखा: (चुटकी लेते हुए)  
"पूर्णिमा तो अब केवल पाँच दिन दूर है! तू इतने दिन सह गया, अब तो धैर्य धर ले! या फिर... (मुस्कुराकर) क्यों न हम सब मिलकर उसके ननिहाल चले? सुशीला ने गुप्त मार्ग भी बताया है!"  

मधुर: (आशा से चमकते हुए)  
"सत्य कहते हो सखा? क्या वास्तव में ऐसा संभव है? (फिर माथा पकड़कर) पर नहीं... यह उचित न होगा। उसके कुल की मर्यादा... मेरा अधीर प्रेम... (निराश) हाय, मैं कितना दुर्बल हूँ!"  

(इतने में, एक कोमल आवाज़ द्वार पर सुनाई देती है। परिचारिका सुशीला प्रवेश करती है।)

सुशीला: (विनम्रता से नमस्कार करके)  
"श्रीमान मधुर! मेरी स्वामिनी मालिनी ने आपके लिए यह पत्र भेजा है। उन्होंने कहा कि इसे आपके हाथों ही दूँ।"  

(मधुर पत्र को लपककर लेता है। उसके हाथ काँप रहे हैं। वह पत्र खोलता है, आँखों से लगाता है।)

मधुर: (पत्र पढ़ते हुए, रोमांचित स्वर में)  
"हे प्राणनाथ! यह विरह कितना निष्ठुर है! प्रतिक्षण तुम्हारी स्मृति मेरे साथ है। पिता ने ननिहाल में मेरा विवाह तय कर दिया है। एक राजकुमार से! यहाँ सब मुझे समझाते हैं, पर मेरा हृदय तो तुम्हारे नाम की अमराइत में ही रमा है। पूर्णिमा की रात्रि में उद्यान के वटवृक्ष के नीचे मिलो। यदि तुम्हारा प्रेम सच्चा है, तो हम सदा के लिए साथ भागेंगे। — तुम्हारी मालिनी"  

(मधुर पत्र को हृदय से लगाता है, फिर आकाश की ओर देखकर हाथ जोड़ता है।)

मधुर: (आँसुओं से भरा हुआ)  
"हे प्रभु! धन्यवाद! यह पत्र मेरे मृत प्राणों में नवजीवन फूँक गया! हाँ, मैं तैयार हूँ—चाहे प्राणों का मूल्य चुकाना पड़े!"  

सुहृद: (चिंतित स्वर में)  
"मधुर! यह अत्यंत दुःसाहस है। राजकुल की क्रोधाग्नि भयानक होती है। विवेक से काम लो।"  

**मित्र:** (गंभीरतापूर्वक)  
"सुहृद का कथन सत्य है। प्रेम महान है, पर अनियंत्रित आवेग विनाश लाता है। क्या तुम सचमुच भागने का निश्चय करते हो?"  

मधुर: (दृढ़ निश्चय से)  
"हे मित्रों! अब मैं विवेक के पार जा चुका हूँ। यह केवल प्रेम नहीं, मेरे अस्तित्व का प्रश्न है। मालिनी के बिना जीवन निरर्थक है। मैं पूर्णिमा की रात्रि को उस वटवृक्ष के नीचे अवश्य रहूँगा।"  

सखा: (उत्साह से थपथपाते हुए)  
"बस! यही तो चाहिए था तुझमें! डर किस बात का? यदि तू सच्चे मन से उससे प्रेम करता है, तो मैं तेरे साथ हूँ! हम सब तेरे साथ हैं! जो होगा, देखा जाएगा!"  

सुहृद: (गहरी साँस लेकर)  
"तथास्तु। यदि यही तुम्हारा अटल निश्चय है, तो हम तुम्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे। पर योजना सूक्ष्मता से बनानी होगी।"  

(सब मिलकर योजना बनाने लगते हैं। मधुर की आँखों में पहली बार विरह के बाद आशा की चिंगारी दिखती है।)

मधुर: (स्वगत, खिड़की से चंद्रोदय की ओर देखते हुए)  
"हे चंद्रदेव! तुम्हारी पूर्णिमा ही मेरे जीवन का पूर्णत्व लाएगी। हे वटवृक्ष! तुम फिर साक्षी बनोगे—इस बार मेरे प्रेम की विजय के! मालिनी, प्रतीक्षा करो... अब केवल पाँच रात्रियाँ शेष हैं!"  

(चतुर्थ अंक: पूर्णिमा की रजनी)  
(दृश्य: उसी उद्यान का वटवृक्ष। पूर्णिमा का चंद्रमा आकाश में ऐसे चमक रहा है मानो स्वयं कामदेव का धनुष हो। वातावरण में मधुर की चिंता और उत्सुकता घुली है। वह वृक्ष के पीछे छिपा है, सखा और मित्र पास की झाड़ियों में छिपे हैं। सुहृद दूर से निगरानी कर रहा है।)

मधुर: (स्वगत, प्रतीक्षा से काँपते हुए)  
"है प्राण! शांत हो जाओ... क्षण भर में वह आएगी। हे चंद्रमा! तुम्हारी शीतल किरणें मेरे उतावले हृदय को शीतलता दो। हे समीर! यदि तुम उसके अंगों का स्पर्श कर रहे हो, तो मेरा प्रेम-सन्देश उसे सुनाओ।"  

(तभी हल्की पदचाप सुनाई देती है। मालिनी घूँघट डाले, एक सखी के साथ आती है। मधुर का हृदय धड़कने लगता है।)

मालिनी: (सखी से डरी हुई आवाज़ में)  
"सुमना! यहीं ठहरो। यदि कुछ भी संदेहजनक लगे, तो पूर्व निर्धारित संकेत करना।"  

सुमना: (चिंतित स्वर में)  
"स्वामिनी! यह जोखिम बहुत बड़ा है। यदि पिताजी को पता चला तो..."  

मालिनी: (दृढ़तापूर्वक)  
"मुझे ज्ञात है। पर प्रेम से बड़ा कोई धर्म नहीं। अब तुम छिप जाओ।"  

(सुमना छिप जाती है। मालिनी वटवृक्ष के पास आती है। मधुर आगे बढ़ता है। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं—मधुर की आँखों में आँसू, मालिनी के हाथ काँप रहे हैं।)

मधुर: (भावुक होकर)  
"मालिनी! इतने दिनों के विरह के बाद... क्या यह सत्य है? क्या तुम सचमुच मेरे सामने खड़ी हो?"  

मालिनी: (घूँघट हटाते हुए, उसका चेहरा चंद्रमा की रोशनी में चमक उठता है)  
"हाँ, मधुर! यह सत्य है। पर समय अल्प है। पिता ने विवाह का निश्चय कर लिया है। कल प्रातः राजकुमार यहाँ आ रहे हैं। यदि तुम्हारी प्रतिज्ञा अटल है, तो अभी भाग चलें।"  

मधुर: (उसका हाथ थामकर)  
"हे प्रिये! तुम्हारे लिए मैं यह शरीर, यह जीवन, सब कुछ अर्पित करने को तैयार हूँ। चलो, मेरे मित्र हमें रथ तक ले चलेंगे।"  

(तभी अचानक मशालों की रोशनी चारों ओर फैल जाती है। मालिनी के पिता और राजकुमार के सैनिक घेरा डाल देते हैं। सुहृद, सखा और मित्र बाहर आ जाते हैं।)

पिता: (क्रोध से तमतमाते हुए)  
"धिक्कार है तुझे, मालिनी! तूने कुल की मर्यादा को कलंकित किया! और हे दुस्साहसी युवक! तेरे प्राणों का मूल्य आज चुकाया जाएगा!"  

राजकुमार: (तलवार खींचकर)  
"सैनिको! इस अपहरणकर्ता को बंदी बनाओ!"  

(सैनिक आगे बढ़ते हैं। सखा और मित्र मधुर के सामने खड़े हो जाते हैं।)

सखा: (वीरतापूर्वक)  
"रुको! इस निरीह प्रेमी को छूने से पहले हमारे शरीर से गुजरना होगा!"  

मधुर: (मालिनी को पीछे करके)  
"हे क्षत्रियो! यदि धर्म युद्ध चाहिए, तो लो! पर याद रखो, प्रेम कभी पराजित नहीं होता!"  

(युद्ध छिड़ने ही वाला है कि अचानक आकाश में एक तेजस्वी प्रकाश फैलता है। एक देवदूत स्वर्णिम विमान में प्रकट होता है। सब निःशब्द, स्तब्ध रह जाते हैं।)

देवदूत: (गंभीर, मधुर स्वर में)  
"महाराज! इस युगल पर क्रोध त्यागो। यह प्रेम साधारण नहीं, पूर्वजन्मों के संस्कारों का बंधन है। स्वयं कामदेव ने इनके हृदयों में प्रेमबीज रोपा है। राजकुमार! तुम्हारा वास्तविक प्रेम तुम्हारी राजसभा की एक गुणवती कन्या की प्रतीक्षा में है, जिसे तुमने अब तक नहीं पहचाना।"  

(राजकुमार तलवार नीचे रख देता है। पिता का क्रोध शांत हो जाता है।)

देवदूत: (मधुर और मालिनी की ओर मुड़कर)  
"तुम दोनों की परीक्षा समाप्त हुई। तुम्हारा प्रेम निष्कलंक है। जाओ, सुखपूर्वक विवाह करो। यह वरदान है देवताओं का।"  

(इतना कहकर देवदूत अंतर्ध्यान हो जाता है। सब आश्चर्यचकित रह जाते हैं। मालिनी के पिता आगे बढ़ते हैं।)

पिता: (गद्गद स्वर में)  
"पुत्री! क्षमा करो मुझे। मैंने तुम्हारे हृदय की पुकार नहीं सुनी। मधुर! तुम सचमुच इस कन्या के योग्य हो। मैं तुम्हारा विवाह इसी क्षण संपन्न करता हूँ।"  

(सब आनंदित हो उठते हैं। चंद्रमा पूर्ण गौरव से चमकता है। मधुर और मालिनी के हाथ जुड़ते हैं।)

मधुर: (मालिनी से, आँखों में आँसू लिए)  
"हे प्रिये! विरह की प्रतीक्षा ने हमें अमर कर दिया। आज हमारा प्रेम सच्चे अर्थों में पूर्ण हुआ।"  

मालिनी: (मुस्कुराते हुए)  
"हाँ, प्राणनाथ! यह पूर्णिमा हमारे मिलन का शाश्वत साक्षी बनेगी।"  

(सब मित्रगण, पिता और राजकुमार आशीर्वाद देते हैं। दृश्यान्त।)


- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)




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