(एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से)
मैं नहीं, कोई वात्स्यायन बैठा है इस लेखनी के पार,
शास्त्र के श्लोकों में टटोल रहा, रति-रहस्य का सार।
यह यौवन नहीं, कोई शास्त्र है सजीव, सुकोमल, ग्रन्थ,
जिसमें अंग-अंग रचता है काम का विशुद्ध, मनोहर अनुबन्ध।
प्रस्तावना : वसन्तागम
जब वसन्त आता है, मदन की पुष्पमयी वाणी खिलती,
तब यौवन की लिपि लिखती है देह पर सुन्दरता की रीति।
यह शरीर नहीं, भूमि है जहाँ खेलता है कला-कौशल,
हर स्पर्श, हर मुद्रा में छुपा है शास्त्र का अटल स्मृति-फल।
शीर्षक : केश-बन्ध विधान
ये केश नहीं, हैं मदन के धनुष की कोमल डोरियाँ,
जिन्हें बाँधती है नारी, विविध बन्धों में सजी सजियाँ।
एक केश-पाश में बँध जाता है सम्पूर्ण मन का मान,
शिखण्डी बन्ध, वेणी-सौन्दर्य, है कामकला का प्रमाण।
नेत्र-विज्ञान : दृष्टि-विजय
ये नेत्र नहीं, विजय-पत्र हैं कामदेव के अस्त्र समान,
जिनकी चंचल चपलता में है वशीकरण का ज्ञान।
ईशान, अग्नेय, वायव्य दृष्टि, शास्त्र ने गिनाया है,
एक टकटकी में ही तो मन का किला फतह कराया है।
मुख-मण्डल : सम्भोग-सूत्र
अधरों का यह आलिंगन, दन्तों की यह मन्द कुरङ्कश,
कामसूत्र के अध्याय में है 'चुम्बन-विचित्र' परिचय विशेष।
ऊर्ध्वाधर, निरुद्ध, संघृष्ट, तिलतण्डुल की रचना है,
हर चुम्बन श्लोक बन जाता, जब अधरों की कला रचना है।
कण्ठ-ग्रीवा : आलिङ्गन-कला
यह कण्ठ नहीं, सन्धि है जहाँ मिलते हैं आलिङ्गन चारों,
झूलते हैं लतावेष्टन, उरुजघन, ताड़ित के भेद विस्तारों।
ग्रीवा की इस वक्रता में छुपा है लालित्य का गणित,
जिसका प्रत्येक कोण बताता आसन्न सुरत का समय सुयोग्य।
स्तन-युगल : पीड़न-मर्दन
उन्नत युगल, श्वेत, कठिन, मानो कामशास्त्र के ग्रन्थ दो,
जिन पर लिखी है मर्दन, पीड़न, घर्षण की रीति अनन्त।
अंगुलियों के चिह्न, नखक्षत, बनते हैं श्लोक नूतन,
सृजन का यह भूगोल रचता प्रेम का नक्शा अभिनव।
कर-कमल : नख-दन्त-लेख
ये हाथ नहीं, लेखनी हैं जो लिखतीं देह पर भाव,
नख-दन्त-चिह्नों से रचतीं प्रेम का अक्षर-संग्राम।
दशन-च्छद, अर्धचन्द्र, कोकिल, श्वेत-हंस के रूप सजते,
जब काम-कला की वर्णमाला देह पर विहँसती है।
मध्य-देश : त्रिवली-रहस्य
नाभि-गर्त, कटि-सौष्ठव, उदर-पटल की कोमल रेख,
त्रिवली में लिपटा है सम्पूर्ण रस-विज्ञान का विशेष।
यह मध्य है मेरुदण्ड, जहाँ टिकी है आसनों की रचना,
सम्मीलित, उत्थित, परिवर्तित, स्थितियों की अद्भुत सृजना।
जघन-स्थल : उरु-युग्म-विधान
जघन स्थल, उरु-युग्म, शंखिनी, चित्रिनी का प्रभेद गूढ़,
शास्त्र यहाँ बतलाता है सौन्दर्य का मापदण्ड सुघड़।
उरुओं की गोलाई में समाया है आसनों का बल,
हर मुद्रा में खुलता है सुरत-साधना का नवीन प्रबन्ध-पल।
पाद-तल : सम्पुट-सन्धान
और यह पाद-तल, कोमल, रक्तिम, नूपुर-मण्डित, सुसज्जित,
जो सम्पुटित होते हैं रति में, बनते सन्धान विविध।
पादाघात, पद-प्रहार की कला भी है शास्त्र-सम्मत,
सौन्दर्य का सम्पूर्ण चक्र यहाँ होता है परिपूर्ण सम्पन्न।
श्वास-ताल : लय-साधना
श्वास की यह लय, यह ताल, मद-मन्द हुँकार का स्वर,
शास्त्र में है 'कितव-वाक्य' के रूप में वर्णित विस्तर।
निश्वासों में गूँजते मदन के मन्त्र अनाहत,
शरीर-वाद्य बज उठता है रति-राग में डूबा हुआ।
उपसंहार : शास्त्र-सार
तो यह यौवन नहीं, एक सजीव, स्पन्दनशील कामशास्त्र है,
हर अंग में छिपा वात्स्यायन का कालजयी विश्वास है।
सुंदरता यहाँ केवल आकृति नहीं, सम्पूर्ण क्रिया-विधान है,
सृजन वह जो देह को बनाता कला, तन्त्र, ज्ञान महान है।
सौंदर्यशास्त्र यह, जहाँ प्रत्येक स्पर्श है एक पाठ,
प्रत्येक मुद्रा में छुपा है शास्त्रार्थ का अनोखा प्रपाठ।
कामसूत्र तो ग्रन्थ नहीं, यौवन की इस देह में बसता है,
शोधार्थी जब पढ़ता है इसे, तब जाकर सही अर्थ खुलता है।
शोध-निष्कर्ष :
अतः यह सुंदरता नहीं, मानव-शरीर का काम-दर्शन है,
एक पवित्र साधना, जहाँ प्रेम ही परम ब्रह्मासन है।
कामदेव नहीं, वह कला है जो सृजन को सिखाती है,
यौवन की यह लिपि हर पल नवीन अध्याय रच जाती है॥
- पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"
- शारदे सदन चौरा, सांचौर 343041

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