शनिवार, 31 मई 2025

विषाद के रंग: 😥

श्रवण। केवल एक नाम नहीं, वह एक कलाकार था, जिसने मेरे जीवन के उजियारे-अंधियारे के चित्रपट पर असंख्य रंग बिखेरे थे। उसकी हँसी सूरज की किरणों जैसी थी, जो हर धुंध को चीर देती थी। उसकी बातचीत की सरलता में वह मिठास थी जो हर कड़वाहट को पिघला देती थी। उसकी उपस्थिति ही एक ऐसा रंग थी जिससे मेरे जीवन की तस्वीर दमक उठती थी – चटख हरियाली, गहरा नीला विश्वास, उज्ज्वल लाल उमंग, कोमल गुलाबी स्नेह। उसने मेरी सामान्य दुनिया को असाधारण छटाओं से सरोबार कर दिया था।

पर अब? अब तो सारे रंग ही फीके पड़ गए हैं। निष्प्राण। निर्वर्ण। ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी ने उस सजीव चित्रपट पर जल की एक भारी धारा उड़ेल दी हो। रंग अब घुल-मिल गए हैं, एक पीड़ादायक, अस्पष्ट, मलिन धूसरता में। श्रवण का इस संसार से चले जाना केवल एक समाचार नहीं था; वह तो एक भीषण भूकम्प था, जिसने मेरे अस्तित्व की नींव ही हिला दी। उसके जाने के बाद की मौनता कानों में एक ऐसी चीत्कार बनकर गूँजती है जो कभी रुकती ही नहीं। यह मौनता उसकी हँसी का विपरीत छोर है – भीषण, पोली और अनन्त।

उसका अभाव एक ऐसा सूना घाव है जिस पर कोई औषध नहीं लगती। हर पुरानी गली, हर जाना-माना चौराहा, हर वह वृक्ष जहाँ हम बैठे थे, अब उसकी स्मृतियों की चुभती हुई सुइयाँ बन गए हैं। उसकी रुचि की कोई वस्तु देखना, उससे जुड़ा कोई गीत सुनना – ये सब अब वेदना के प्रमाणपत्र बन गए हैं। मन एक विचित्र विरोधाभास में जकड़ा है: उन स्मृतियों को सँजोकर रखना चाहता है जो सुख देती थीं, पर वही स्मृतियाँ अब विष के समान क्यों दाह उत्पन्न करती हैं? उसकी हँसी की प्रतिध्वनि सुनाई देने का भास होता है, पलटकर देखता हूँ – और वहाँ केवल शून्यता होती है, एक भारी, साँस रोक देने वाली शून्यता। यही तो है करुणा का सबसे निर्दय रूप – प्रिय की छवि स्पष्ट होकर भी उसका स्पर्श सर्वदा के लिए अगम्य हो जाना।

प्रिय श्रवण, तुम्हारे चले जाने ने जीवन के इस पाठ को कितना दुष्कर बना दिया है। यह विदाई तो एक ऐसा दुःखान्त अध्याय है जिसकी पंक्तियाँ अश्रुओं से लिखी गई हैं, जिसका हर शब्द हृदय पर एक क्षत छोड़ जाता है। तुम्हारे बिना यह संसार एक अपरिचित, शीतल और वर्णहीन लोक जैसा प्रतीत होता है। तुम्हारी स्मृतियाँ ही अब वह दीपक हैं जो इस तिमिरमय वेदना के गलियारों में कभी-कभी एक क्षण की मन्द रोशनी बिखेर देती हैं। पर वह प्रकाश तुम्हारे सान्निध्य की उष्णता, तुम्हारे रंगों का तेज तो कभी नहीं लौटा पाएगा। तुम्हारा शान्त हो जाना मेरे जीवन का वह स्थायी कलंक है जिसे काल भी धो नहीं सकता, केवल उसे सहने का सामर्थ्य ही दे सकता है। तुम्हारी याद सदैव एक मधुर पीड़ा बनी रहेगी – एक ऐसा रंग जो अब केवल हृदय के अंधकारमय कोष्ठ में ही दीप्तिमान है। 😭



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