मंगलवार, 27 मई 2025

कहानी: विरह की वेदी

राजस्थान के जालोर जिले में बसा भीनमाल कस्बा, जहाँ रेत के टीलों और ढाणियों के बीच प्राचीन मंदिरों की छाया में जीवन बसता है। गर्मियों की एक सांझ, जब सूरज लाल गोल गुब्बारे की तरह रेत में समा रहा था, महादेवी अपनी सहेली लता और वैशाली के साथ कुएँ से पानी भरकर लौट रही थी। उसके हाथों की चूडिय़ों की खनक और पगड़ी बाँधे गाँव के बुजुर्गों की गपशप के बीच, वह अपने पिता पंडित नित्यानंद शुक्ल की चिंता में डूबी थी। नित्यानंद, जो भीनमाल के प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वान थे, उनके लिए समाज की मर्यादा ही सर्वोपरि थी। महादेवी की माँ की मृत्यु के बाद से वह और अधिक कठोर हो गए थे।

"सुनो महादेवी! कल तेजाजी मंदिर में भंडारे का आयोजन है। तू भी हमारे साथ चलेगी?" लता ने पूछा।  
"पिताजी की अनुमति के बिना कुछ नहीं होता," महादेवी ने आँखें झुकाते हुए कहा।  
वैशाली ने हँसकर कहा, "तुम्हारे पिता तो तुम्हें पत्थर की मूरत बनाना चाहते हैं!"

उसी क्षण, सामने से आती हुई भजन की आवाज़ ने उनका ध्यान खींचा। रास्ते में एक युवक, गले में तुलसी की माला और हाथ में एक पोथी लिए, भजन गाता हुआ चला आ रहा था। वह पंडित अनंत था, जिसे गाँव वाले "पंडितजी" कहकर पुकारते थे। संस्कृत के प्रकांड विद्वान, परंतु गरीबी में जीवन बिताने वाला यह युवक, महादेवी की आँखों में उतर गया। दोनों की नजरें मिलीं, और महादेवी ने तेजी से अपना घूँघट सँभाल लिया।

अगले दिन तेजाजी मंदिर में भंडारा था। महादेवी ने पिता से बहुत विनती की तब जाकर उन्होंने उसे जाने दिया। मंदिर प्रांगण में लगी भीड़ के बीच, पंडित अनंत वेद मंत्रों का पाठ कर रहे थे। उनकी गम्भीर आवाज़ और ज्ञान से प्रभावित होकर नित्यानंद शुख्ला ने उन्हें अपने घर पाठ पढ़ाने का निमंत्रण दिया। अनंत ने स्वीकार कर लिया।

धीरे-धीरे, अनंत महादेवी के जीवन का हिस्सा बन गए। वह उसे संस्कृत के श्लोक सिखाते, और महादेवी उन्हें राजस्थानी लोकगीत सुनाती। एक दिन, जब अनंत ने "गीत गोविन्द" का पाठ करते हुए राधा-कृष्ण के विरह का वर्णन किया, तो महादेवी की आँखों में आँसू आ गए। अनंत ने पूछा, "क्यों रो दिया?"  
"ये विरह... इतना कष्ट क्यों होता है?" महादेवी ने कंपकंपाती आवाज़ में पूछा।  
अनंत ने गहरी साँस ली, "प्रेम बिना विरह अधूरा है, महादेवी।"
 
गाँव में चर्चाएँ शुरू हो गईं। लोगों ने अनंत और महादेवी को बाग़ में साथ देखा था। बात नित्यानंद शुक्ला तक पहुँची। उसी रात, उन्होंने महादेवी को डाँटते हुए कहा, "ब्राह्मण कन्या होकर एक गरीब पंडित के साथ इतनी घनिष्ठता? यह समाज क्या कहेगा?"  

अगले दिन, अनंत को घर आने से मना कर दिया गया। महादेवी ने खिड़की से झाँककर देखा, अनंत द्वार पर खड़े थे, उनकी आँखों में असह्य पीड़ा थी। उसने चुपके से एक पत्र लिखा: "मेरे प्राण, मैं तुम्हारी हूँ।" पत्र उसने लता के हाथों अनंत तक पहुँचाया।

नित्यानंद ने महादेवी की शादी तय कर दी—मोहनलाल से, जो जालोर के एक संपन्न व्यापारी का बेटा था। महादेवी ने विरोध किया, पर पिता का आग्रह अटल था। उसी रात, वह अनंत से मिलने उनके कुटिया में पहुँची।  

"मुझे ले चलो यहाँ से," वह रो पड़ी।  
अनंत ने उसके हाथ थामे, "तुम्हारे पिता की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचेगी। क्या तुम सह पाओगी?"  
महादेवी चुप रही। दोनों जानते थे—समाज की दीवारें उनसे ऊँची थीं।

शादी का दिन आया। महादेवी लाल चुनरी में सजी, पालकी में बैठी मोहनलाल के घर जा रही थी। गाँव भर के लोग इकट्ठे थे। मंडप के पीछे, एक टूटे खंभे के साये में अनंत खड़े थे। उनकी आँखों से आँसू की धारा बह रही थी। जब महादेवी ने फेरों के लिए सिर उठाया, तो उसकी नजर अनंत पर पड़ी। दोनों के हृदय चीत्कार कर उठे।  

"कन्या के विवाह पर पिता नहीं प्रेमी रोता है..." गाँव की एक वृद्धा ने फुसफुसाया।  

महादेवी ने मोहनलाल के घर में सब कुछ सह लिया, पर उसका हृदय सूनापन लिए रहा। अनंत ने भीनमाल छोड़ दिया और एक साधु बनकर हिमालय की ओर चले गए। वर्षों बाद, जब नित्यानंद शुक्ला बीमार पड़े, तो महादेवी उनकी सेवा में लौट आई। एक शाम, उसने पिता से पूछा, "आपने मेरा हृदय तोड़ दिया, क्यों?"  

नित्यानंद ने आँखें बंद कर लीं, "मैंने समाज के डर से तुझे खो दिया... माफ करना बेटी।"  

उस रात, महादेवी ने अनंत की पोथी को छाती से लगाया और रेत पर उनके नाम लिखते हुए रो पड़ी। भीनमाल की हवा में विरह का राग गूँज उठा...  


- कवि भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)





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