सोमवार, 19 मई 2025

प्रेम-सरिता और सागर: एक अमर संवाद

प्रकृति के हृदय में बसा प्रेम का संगीत सदैव अलंकारों से सजा होता है। नदी और सागर का नाता भी ऐसा ही है — वियोग के टुकड़ों से लिखी गई एक काव्यात्मक गाथा, जहाँ मौन की चादर कभी प्रेम के प्रवाह को नहीं ढँक सकती। जब ग्रीष्म की तप्त रेत नदी को मरुस्थल के महलों में बाँध देती है, तो सागर की लहरें मृगतृष्णा-सी व्याकुल हो उठती हैं। क्या प्रेम की भाषा में विराम हो सकता है? यह तो अनहद का वह राग है, जो बिना स्वरों के भी हृदय की तारों को झंकृत कर देता है।  

जब सरिता मौन धारण करती है, तो उसकी हर बूँद सिसकती हुई कालिमा बन जाती है। वह वियोग के टुकड़ों से लिखती है — _"प्रेम वादी नहीं, विवादी नहीं, मौन तो कंटक है, जो रिश्तों की गाँठों में चुभता है।"_ सच्चा प्रेम कालिमा नहीं, जो पन्नों पर सूख जाए, बल्कि अलंकारों का हार है। उपमा के तारे, रूपक की ओढ़नी, अनुप्रास के गीत, और उत्प्रेक्षा की डोर — यही तो प्रेम की भाषा है!  

ज्योंहि वर्षा ऋतु आती है, नदी लालिमा चुनरी ओढ़कर सागर से मिलने छटपटाती है। बादलों के सजल कण बनकर उसकी हर बूँद सागर की गोद में समा जाना चाहती है। सागर मुस्कुराता है — _"तूने अब जाना, प्रेम का रहस्य क्या है? मेरी गोद तक आने के लिए तुझे अपने नयन-जल बहाने पड़े!"_ यही तो प्रेम का विरोधाभास है — विद्रोही होकर भी सागर का प्यासा रहना, मरुस्थल में न खोकर बादल बन बरस जाना।  

प्रेम नदी-सा है — निर्बाध, अथक, और संघर्षशील। वह तर्कों के पाषाणों को पिघलाकर भावनाओं का जल-प्रपात लाता है। मौन उसके लिए मरुस्थल है, जबकि संवाद सागर की विशालता। कविता के हर शब्द की तरह, प्रेम भी हृदय-धड़कन में बसता है। फिर चाहे वह नदी का सागर से संघर्ष हो या मनुष्य का मनुष्य से मिलन — प्रेम तभी अमर होता है, जब वह मौन के बंधन तोड़कर भावनाओं के मुक्त पक्ष फैलाता है।  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"

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