हे अम्बिके! तुम्हीं वह प्राणप्रतिष्ठा हो सनातनी,
शब्दब्रह्म का नाद जिसमें, वही तुम्हारी वाणी हो।
सहस्रार के कमल में विराजित चिद्घन की ज्योति,
महाकाल के नेत्रों से टपकी अमृत-बूँद रानी हो॥
युग-युगांतर के पृष्ठों पर अंकित तपःसिद्ध लिपि,
त्रिगुणातीत गगन की व्योमस्थ महिमा-निधानी हो।
प्रलय के मौन में भी जो गूँजे ॐ का सुषमा-स्वर,
वह निर्वाण की वीणा के तारों की अधिष्ठानी हो॥
मृत्युंजय के हस्त से रची पञ्चभूत की रंगभूमि,
अखण्ड मण्डलाकार में ब्रह्मांड का क्षणिक खिलौना हो।
तुम्हारी मौन मुद्रा में विराट् का सम्पुटित रहस्य,
अनाहत नाद सा अनन्त, पर मूक अभिनव कल्पना हो॥
कालचक्र के दंष्ट्रों में फँसी नश्वरता को चीर,
अक्षय पात्र लिए खड़ी ध्रुवतारा-सी अडिग धुरिनी हो।
संस्कार के बीजों को अम्बर में बोने वाली कृषिका,
सृष्टि के प्रत्येक कण में सनातन का स्पन्दन तुम्हीं हो॥
शून्य के सागर में डूबे अणु को दिया जिसने आकार,
वह महाशक्ति तुम्हारे सृजन-हस्त की अद्भुत लीला हो।
मुक्ति के मार्ग पर चलते जीव की प्रत्येक साँस में,
तुम प्रारब्ध की लेखिका, दैव और पुरुषार्थ की संधि हो॥
- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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