शनिवार, 28 जून 2025

विरह पत्र

प्रिय महादेवी, 

इस पत्रपत्रिका पर अक्षर अंकित करने से पूर्व यह हृदय असंख्य बार स्पंदित हुआ, कंपित हुआ और एक दीर्घ, उदास श्वास लेकर निश्चल हुआ। तुमसे विछुड़े केवल एक मास व्यतीत हुआ है, किंतु मन की घटिकाएँ किस क्रूर मंद गति से चलती हैं! प्रत्येक क्षण अपने पश्चात् एक दीर्घ, अंधकारपूर्ण छाया छोड़ जाता है, मानो युगों का भारी प्रस्तर इस हृदय पर धर दिया गया हो। काल का यह विचित्र विस्तार कैसा निष्ठुर है! गतदिवस की स्मृतियाँ इतनी तीक्ष्ण, इतनी स्पर्शगम्य हैं कि प्रतीत होता है तुम्हारा मधुर मुखचंद्र अभी इसी क्षण यहाँ उपस्थित था, तुम्हारे हास्य का मधुर कंकणध्वनि अभी इस वायुमंडल में विलीन हुई है। किंतु जब नयन उन्मीलित होते हैं, तो वह सब स्वप्निल भास मात्र शेष रह जाता है। यह विरह का कैसा कठोर यथार्थ है!

अद्य पुनः उस पथ के शीर्ष पर स्थित होकर मैंने उस मार्ग को निहारा – वही मार्ग जो कभी तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा में मेरी दृष्टि का स्थायी आधार हुआ करता था। अद्य वह राजपथ कितना शून्य, कितना नीरव प्रतीत होता है! प्रत्येक इष्टका, प्रत्येक कोण, वह पुरातन नीम वृक्ष जिसकी छाया में हम कभी विश्रांत होते थे – सर्वत्र तुम्हारी स्मृति से स्पंदित हो उठते हैं, किंतु तुम्हारे सजीव, चेतन रूप के अभाव में यह समस्त दृश्य एक चित्रलिपि के समान निर्जीव एवं पीड़ाकर बन गया है। वह पथ अब केवल एक निर्जन मार्ग है, जिसका प्रत्येक कण तुम्हारे वियोग की वेदना को चीत्कार-चीत्कार कर कह रहा है।

तत्पश्चात् उस वातायन की ओर मेरी दृष्टि उठी, वही वातायन जहाँ से तुम्हारे आगमन का प्रथम सूचक दृष्टिगोचर होता था। अद्य उसी स्थान पर स्थित होकर जब बहिः प्रेक्षण करता हूँ, तो समस्त विश्व अन्धकार ही अन्धकार में निमग्न प्रतीत होता है। सूर्य का प्रकाश भी निष्प्रभ, चंद्रिका भी शोकाकुल, नक्षत्रों का टिमटिमाना भी करुण कथा वर्णन करता हुआ। बाह्य का यह तमस् अंतर के उस विशाल शून्य की केवल एक मूक प्रतिकृति है, जिसे तुम्हारे वियोग ने इस हृदय में प्रतिष्ठापित कर दिया है। क्या यह वातायन अब केवल एक रिक्त प्रकोष्ठ बनकर रह गया है? क्या इससे होकर अब केवल स्मृतियों की शीतल समीर ही प्रविष्ट होगी?

प्रिये, यह प्रतीक्षा कितनी कष्टदायक है! प्रत्येक क्षण एक नई वेदना का जनक बन जाता है। प्रातःकाल का प्रथम किरणपुंज जब इस कक्ष में प्रवेश करता है, तो उसमें तुम्हारे आगमन की आशा निहित होती है। सायंकाल की लालिमा जब विदा लेती है, तो वह मेरी नैराश्य को और गंभीर कर जाती है। रात्रि के निश्शब्द क्षण तो पृथक ही यंत्रणा देते हैं – नक्षत्रों के मध्य तुम्हारा मुख खोजना, चंद्र के कांतिमान प्रकाश में तुम्हारी छवि का भ्रम देखना, और तत्पश्चात् उस भ्रम के विलीन होने पर उस विशाल शून्यता से साक्षात्कार करना... यह एक चक्रव्यूह है जिससे निर्गमन का मार्ग तुम्हारे सिवा अन्य कौन प्रदर्शित कर सकता है?

तुम्हारी अनुपस्थिति ने इस जीवन की समस्त ध्वनियों को मूक बना दिया है। पक्षियों का कलरव भी अब एक शुष्क पर्ण के खड़खड़ाने के समान प्रतीत होता है। मानवीय संभाषण निरर्थक पदों का समूह प्रतीत होती है। संगीत भी केवल स्वरों का एक विषादपूर्ण विस्तार है, जिसमें तुम्हारी स्मृति का सुर ही अनुगूंजित होता रहता है। समस्त संसार एक मूक चित्र के समान स्थिर हो गया है, जिसमें केवल तुम्हारी स्मृति ही सजीव वर्ण भर सकती है।

कदाचित् ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम्हारा मधुर स्वर वायु के झोंकों के साथ मेरे श्रवणों में गूंज उठेगा। कदाचित् भास होता है जैसे द्वार पर तुम्हारी कोमल आघात की ध्वनि श्रवणगोचर होगी। प्रत्येक पदचाप हृदय को विचलित कर देती है, प्रत्येक छाया आशा की नवीन किरण बनकर उदित होती है और तत्क्षण नष्ट हो जाती है। यह आशा और नैराश्य का निरंतर संघर्ष हृदय को क्लांत कर देता है। क्या तुम इस निराशा के तिमिर में आशा का एक दीपक लेकर नहीं आओगी? कब तक इस शून्यता की पीड़ा सहता रहूँ?

तुम्हारे वियोग में प्रकृति भी सहानुभूति का कर स्पर्श कराती प्रतीत होती है। वर्षा की बिंदुएँ मेरे अश्रुओं से मिलकर प्रवाहित होती हैं। शीतल पवन मेरी उदासी को विचलित करती है। रात्रि का तारामंडल मेरी एकाकी कष्ट को निहारता रहता है। क्या ये सब भी तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं? क्या ये प्रकृति के अंग भी जानते हैं कि उनकी सुंदरता तुम्हारे दर्शन के विना अपूर्ण है?

महादेवी, यह पत्र मेरी विरह-वेदना का मौन साक्षी है। इन पदों में बद्ध ये अक्षर मेरे हृदय की वह करुण आर्तध्वनि हैं, जो तुम तक पहुँचकर ही निवारित हो सकती है। मेरी यह याचना है, मेरी यह प्रार्थना है – इस शून्य को पूर्ण करने हेतु, इस तम को दूर करने हेतु, इस विरह की दाह को शांत करने हेतु... पुनरागच्छ। यह हृदय तुम्हारी प्रतीक्षा में तड़प रहा है। तुम्हारे विना यह समय नहीं, युग व्यतीत हो रहा है। मेरे नयन तुम्हारे मुखचंद्र के दर्शन हेतु व्याकुल हैं। मेरे श्रवण तुम्हारे मधुर स्वर हेतु लालायित हैं। यह प्राण तुम्हारे सान्निध्य हेतु अशांत है।

तुम कब आओगी?

तुम्हारा दुर्भाग्यशाली,  
तुम्हारी स्मृतियों में विलीन प्रिय
- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण" 


शुक्रवार, 27 जून 2025

प्रतीक्षा, संघर्ष और आशा की ज्योति

कब तक यूँ सिसकियों में बिताए रातें हम?  
चुप-चुप राहों पर जलना है सूरज बताना।  
 
हर दर्द बोझल सा लगे, हर साँस गहरी हो गई,  
फिर भी धड़कन में बसी है जीत का सूरज बताना।  
  
टूटे सपनों के टुकड़े जमा करते रहे हम,  
राख से उग आए फिर नया सूरज बताना।  

काँटों की सेज पे सोया जो, उसी ने जाना है,  
कैसे खिलता है गुलशन में दर्द का सूरज बताना।  

डूबते तारों की लौ भी बना लेती है राहें,  
अंधेरों को चीर करना है सूरज बताना।  
 
अपना वक़्त भी आएगा, यूँ ही न टूटो दिल से,  
इस ज़माने को भी आखिर हार का सूरज बताना।

- भारमल गर्ग "विलक्षण"  


गुरुवार, 26 जून 2025

पावन पीर

हे पावस, भेजो पिया पास यह मेरी अरदास रे।  
बरस-बरस स्मृति उनकी अश्रु बन बरसाती जास रे॥  

घन गरजे, गगन डोले, मन मेरा भी डोले रे।  
कौन कहे उनको यहाँ, परछाईं सी घोले रे?  
बूंद-बूंद टपके छत पे, तर्पण करती जैसे रे।  
हर बूँद में उनका चेहरा मेरे सामने आये रे॥  

सावन की सुगंध भरी हवा, स्पर्श करती तन को रे।  
कहती है उनके वियोग में, यह सुख भी कैसा रे?  
खोल देख पलकें, आँखों में उनका ही रूप समाया रे।  
यह सुगंध उनकी बाँहों की, मन को बहलाती जाये रे॥  

विद्युत चमकी अँधियारे में, चित्र उभरा मन का रे।  
एक पल चमकी मुसकान उनकी, फिर हो गई बुझी सी रे।
गीली मिट्टी सी सुगंध उठी, भीगे तन की याद दिलाये रे।  
कहाँ छिपे हो पिया तुम, यह चमक तो बतलाती जाये रे॥  
मोर नाचे, पपीहा पुकारे, सब मिल मचाये हल्ला रे।  
मेरा मन गुमसुम बैठा है, सुनता सिसकियों का स्वर रे।  
क्यों न आये वे, यह पपीहे की पुकार पुकारती जाये रे?  
इस शोर में भी सुनाई देती, उनकी मधुर बोली सारी रे॥  

बादल छँटे, सूरज निकला, हरियाली छाई धरती रे।  
पर अभी तक मेरे नयनों में, बरसा ही जाती बरखा रे।  
मन का आकाश तो घिरा रहा, बादलों से भरा ही रे।  
पावस थमा पर यादों की सरिता अविरल बही रे॥  

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

बुधवार, 25 जून 2025

प्रेम गुत्थी

यह प्रेम सरल नहीं, सागर तरंग सा डोला।  
सुख-दुख के मिलन में, वसन्त-शरद जैसा खोला॥  

कभी मधु बन बहता, मीठी बयार सा छाया।  
कभी विषधर सा डसता, जीवन में अँधेरा छाया॥  
तुम आग सी दीप्तिमान, मैं पतंगा सा भोरा।  
मिलन की अभिलाषा में, जल गया रोज निथरा॥  

तुम शीतल चन्द्रिका सी, दूर नभ में विराजत।  
मैं धरा का तृण हूँ, तुम तक पहुँचे का नहीं साजत॥  
तुम्हारा मौन वज्र सा, हृदय को करता चीर।  
मेरी वाणी पुष्प सी, तुम पर बिखरी हुई अतीर॥  

यह प्रीति कुसुमित लता, कंटकों से घिरी हुई।  
मधु चखने को चाहूँ, भय समीप खड़ा रही॥  
फिर भी यह बन्धन पुराना, छूटता नहीं हृदय से।  
रहस्यमयी रसधार सा, बहता रहेगा सदा यह॥  

पंडित. भारमल गर्ग "विलक्षण"
सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

शुक्रवार, 20 जून 2025

नव जीवन में गीत लिखो

उषा की अरुण चुनरी छाई  
तिमिर के तंत्र टूटे सारे   
मुरझाए स्वप्न फिर से जागे   
नव जीवन में गीत लिखो! 
  
विषाद की लहरें ठहरीं 
हृदय के शुष्क मरु थरके 
सुख-स्रोत बह उठे अब वहाँ  
नव जीवन में गीत लिखो! 

पुराने पात गिरे धरती   
नव कोपलों का हार खिला  
बंधन टूटे, पंख पसारे   
नव जीवन में गीत लिखो!

गगन में अनहद नाद गूँजा  
तिमिर का दीप जला अमर   
संघर्ष के पथ पर विजय ध्वजा 
नव जीवन में गीत लिखो!  

वेदना सिंधु पार उतरे 
ज्ञान ज्योति भरी नयन में 
मृत्यु के विष में अमृत फूटा  
नव जीवन में गीत लिखो 

- भारमल गर्ग "विलक्षण"

प्राणप्रिया

हे हृदयेश्वरी प्रिया! तुम, स्मृति हृदय में बसी।  
तुम्हारे दर्शन बिना, व्याकुल यह मन रही॥  
  
तेरे नयन नीलकंज सम, अधर रसाल फल ज्यों।  
मुख चंद्रिका सुप्रकाशित, मन हर लेत सब क्षण त्यों॥  
करत तव अंग-संगति, पुलकित तन-मन होय।  
बिनु तव सुधा-सान्निध्य, जीवन सूना सखी मोय॥  

विरह-व्यथा जब घेरती, तुम आवो निकट तब।  
तुम्हारे आलिंगन में, मिले शांति अमृत-रस॥  

कुंतल तव लतिका सम, सुगंध मन को मोहै।  
वाणी तव कोकिल स्वर, श्रुति में मधु सी बहै॥  
त्वमसि मम जीवनस्य, नौका भवसागर की।  
त्वदधीन यह प्राण है, प्रतिज्ञा करत हृदय की॥  

- पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण" 🌸 

मंगलवार, 17 जून 2025

जादुई जंगल का रहस्य (बाल कहानी और कविता)

सोनिया आठ साल की जिज्ञासु और बहादुर लड़की थी। उसका घर एक छोटे से गाँव के किनारे था, जिसके पीछे फैला था विशाल, रहस्यमय 'नीले पहाड़ों का जंगल'। बड़े-बुजुर्गों के मुताबिक, यह कोई साधारण जंगल नहीं था। कहा जाता था कि यहाँ के पेड़ बातें करते थे, जानवरों के गीतों में जादू होता था, और चमकीले रंग के फूल रात में रोशनी बिखेरते थे। पर पिछले कुछ महीनों से जंगल का जादू मुरझा सा गया था। पेड़ों की पत्तियाँ झड़ रही थीं, जानवर चुपचाप रहने लगे थे, और फूलों की रोशनी फीकी पड़ गई थी। सोनिया के मन में इस रहस्य को सुलझाने की तीव्र इच्छा थी।

एक दिन, अपनी दादी के पुराने संदूक में खोजबीन करते हुए, सोनिया को एक चमकीले नीले कपड़े में लिपटी हुई किताब मिली। उस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था – "नीले पहाड़ों के रहस्य"। पन्ने पलटते ही सोनिया की आँखें चौंधिया गईं। किताब में जंगल के जादुई नक्शे थे, अजीबोगरीब पौधों के चित्र थे, और एक विशेष पन्ने पर लिखा था: "जब जंगल का दिल दुखी हो, जब फीका पड़े प्रकाश, खोजो 'हरे मोती' का रास्ता, वही लाएगा उजाला वापस।" नीचे एक चमकीले पत्थर का चित्र था, जिसे 'हरा मोती' कहा गया था।

सोनिया का दिल धड़कने लगा। क्या यही जंगल की परेशानी का हल था? वह तुरंत तैयार हुई – पीठ पर एक छोटा बैग, उसमें किताब, पानी की बोतल, कुछ बिस्कुट और अपना सबसे भरोसेमंद टॉर्च। जंगल के किनारे पहुँचते ही उसे एक अजीब सी खामोशी ने घेर लिया। हवा में गीतों की जगह एक उदास सी सन्नाटा था। तभी झाड़ियों में हलचल हुई और एक छोटा सा, सफेद फर वाला खरगोश कूदकर सामने आया। उसकी आँखें गुलाबी थीं और वह सीधे सोनिया की तरफ देख रहा था।

"हैलो! तुम कौन हो?" खरगोश ने स्पष्ट हिंदी में पूछा।

सोनिया हैरान रह गई! "मैं... मैं सोनिया हूँ। और तुम... तुम बोल सकते हो?"

खरगोश ने कान हिलाए, "हाँ, जब तक जंगल का जादू था, हम सब बात कर सकते थे। मैं हूँ चंचल। पर अब तो सब कुछ बिगड़ गया है। दिन पर दिन जंगल की चमक फीकी पड़ती जा रही है।"

सोनिया ने उत्साहित होकर अपनी किताब दिखाई और 'हरे मोती' के बारे में बताया। चंचल की आँखें चमक उठीं, "हरा मोती? हाँ! वह तो 'जीवन का पत्थर' है! वही जंगल के दिल की धड़कन है! पर वह तो जंगल के सबसे गहरे, सबसे पुराने बरगद के पेड़ की जड़ों में छिपा है। वहाँ पहुँचना आसान नहीं।"

"लेकिन हमें कोशिश तो करनी ही चाहिए, चंचल!" सोनिया ने दृढ़ता से कहा, "मेरे पास नक्शा है। चलो, हम साथ चलें!"

चंचल ने खुशी से हामी भरी। और इस तरह शुरू हुई एक आठ साल की लड़की और एक बोलने वाले खरगोश की अद्भुत यात्रा। नक्शे के अनुसार उन्हें पहले 'गीतों की घाटी' से गुजरना था। कभी यहाँ चिड़ियों का मधुर स्वर गूँजता था। आज सब कुछ सुनसान था। तभी एक कोमल आवाज सुनाई दी, "हू... हू... कौन जाता है मेरे जंगल में?" एक पुराने ओक के पेड़ पर बैठा विशाल उल्लू था, जिसकी आँखें बुद्धिमानी से चमक रही थीं। उसका नाम था ग्यानी।

"नमस्ते ग्यानी जी!" सोनिया ने विनम्रता से कहा, "हम हरा मोती ढूँढ़ने जा रहे हैं, जंगल का जादू वापस लाने के लिए।"

ग्यानी ने गहरी साँस ली, "अच्छा किया बेटा। जंगल का दिल दुखी है। उसकी चमक इसलिए फीकी पड़ रही है क्योंकि बाहर की दुनिया से आने वाली गंदगी और शोर ने उसे घायल कर दिया है। हरा मोती ही उसे शक्ति दे सकता है। सावधान रहना, गीतों की घाटी के बाद 'काँटों का मैदान' आता है। वहाँ रास्ता कठिन है। यह लो, यह चमकीला पंख तुम्हारी मदद करेगा।" ग्यानी ने अपने पंख से एक नीला चमकता पंख तोड़कर सोनिया को दिया।

उन्होंने ग्यानी को धन्यवाद दिया और आगे बढ़े। काँटों का मैदान वाकई में डरावना था। ऊँचे-ऊँचे काँटेदार पौधे रास्ता रोक रहे थे। तभी सोनिया को ग्यानी का दिया पंख याद आया। जैसे ही उसने पंख को आगे करके कदम बढ़ाया, अद्भुत बात हुई! काँटे धीरे-धीरे पीछे हटने लगे, एक संकरा रास्ता बनाते हुए। चंचल खुशी से उछल पड़ा, "वाह! यह पंख तो जादुई है!"

रास्ते में उनकी मुलाकात एक छोटी, नीले पंखों वाली चिड़िया नीलीमा से हुई, जो उदास बैठी थी। "मेरा गाना गुम हो गया है," वह रोई, "इतनी गंदगी और शोर के बीच गाना कैसे निकले?"

सोनिया ने उसे हौसला दिया, "हम जादू वापस ला रहे हैं, नीलीमा। तुम्हारा गाना जरूर लौटेगा!" नीलीमा ने उम्मीद भरी मुस्कान दी।

अगला पड़ाव था 'बातूनी बांस का जंगल'। यहाँ के लंबे-लंबे बांस के पेड़ कभी आपस में फुसफुसाते रहते थे। आज वे चुप और नीरस खड़े थे। जैसे ही सोनिया और चंचल ने जंगल में प्रवेश किया, एक दुखी सी आवाज गूँजी, "ओह... कितनी धूल... कितना कूड़ा... साँस लेना भी मुश्किल हो रहा है।"

सोनिया ने देखा – बांस के पेड़ों के आसपास प्लास्टिक की बोतलें, रैपर और कागज बिखरे पड़े थे। उसने तुरंत अपना बैग खोला और उसमें जितना कूड़ा समा सकता था, भरने लगी। चंचल ने भी अपने छोटे-छोटे दाँतों से कागज उठाने में मदद की। थोड़ी ही देर में उस जगह को साफ कर दिया गया। बांस के पेड़ों की पत्तियाँ खनखनाईं, "आह... शुक्रिया बच्चो! अब थोड़ा आराम मिला। हरा मोती पुराने बरगद के पास है। बस आगे बढ़ो।"

थके हारे, पर हौसले से भरे सोनिया और चंचल ने आखिरी मंजिल की ओर कदम बढ़ाए। वहाँ खड़ा था विशालकाय, प्राचीन बरगद का पेड़। उसकी जड़ें जमीन में गहरे धँसी हुई थीं, जैसे जंगल की नींव हों। पर उसकी पत्तियाँ भी मुरझाई हुई थीं। किताब के नक्शे के अनुसार, हरा मोती उसकी सबसे मोटी जड़ के नीचे दबा होना चाहिए था।

सोनिया और चंचल ने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की। मिट्टी कड़ी थी। कई मिनटों की मेहनत के बाद उनके हाथ किसी ठोस और ठंडी चीज से टकराए। सोनिया ने उसे बाहर निकाला – यह एक चमकदार, हरे रंग का पत्थर था, जिसके अंदर से हल्की सी धूप-छाँह जैसी रोशनी निकल रही थी। हरा मोती!

जैसे ही सोनिया ने उसे हाथ में उठाया, एक अद्भुत घटना हुई। मोती से निकलती हल्की रोशनी तेज हो गई और पूरे बरगद के पेड़ को घेर लिया। रोशनी पेड़ की जड़ों से ऊपर तने तक, फिर शाखाओं और पत्तियों तक फैल गई। जहाँ-जहाँ रोशनी गई, मुरझाई पत्तियाँ फिर से हरी-भरी हो उठीं! रोशनी आगे बढ़ी, जंगल के पेड़ों को छूती हुई। पत्तियाँ खनखनाने लगीं, जैसे खुशी से हँस रही हों।

और फिर... धीमी, मधुर स्वरलहरी हवा में तैरने लगी। नीलीमा का गाना लौट आया था! दूर से चिड़ियों के कलरव और जानवरों के आहट की आवाजें सुनाई देने लगीं। रात होने लगी थी, और जंगल के फूलों की कलियाँ खिल उठीं, अपनी कोमल, जादुई रोशनी से जंगल को नहला दिया! जंगल का खोया हुआ जादू वापस आ गया था!

सोनिया और चंचल खुशी से झूम उठे। ग्यानी उड़कर आया, "शाबाश बेटी सोनिया! तुमने जंगल का दिल जीत लिया। पर याद रखो, हरा मोती तो जंगल के दिल को शक्ति देता है, पर उसकी रक्षा तो हम सबको मिलकर करनी है।"

सोनिया ने गंभीरता से सिर हिलाया, "हाँ, ग्यानी जी। मैंने देखा कि गंदगी और लापरवाही ने ही जंगल को दुखी किया था। हमें अपने जंगल, अपनी प्रकृति की देखभाल करनी होगी।"

अगले दिन सोनिया ने पूरे गाँव के बच्चों को इकट्ठा किया। उसने उन्हें जंगल की सैर कराई, पेड़ों से बात करते देखा (अब सभी बच्चे उनकी फुसफुसाहट सुन सकते थे!), चंचल और नीलीमा से मिलवाया। उसने सबको बताया कि कैसे कूड़ा-करकट और शोर जंगल के जादू के दुश्मन हैं।

बच्चों ने मिलकर ठान ली! वे हर हफ्ते जंगल की सफाई करने आएँगे, नए पौधे लगाएँगे, और जंगल के पास जोर-जोर से शोर मचाने से बचेंगे। सोनिया ने हरे मोती को वापस बरगद के पेड़ की जड़ों के पास सुरक्षित रख दिया, जहाँ वह जंगल के दिल की धड़कन बनकर सदा चमकता रहेगा।

नीले पहाड़ों का जंगल फिर से खिल उठा था – गीतों से गूँजता, रोशनी से जगमगाता, और जीवन से लबालब। और सोनिया सीखकर लौटी थी कि सच्चा जादू किसी पत्थर में नहीं, बल्कि हमारे प्रकृति के प्रति प्रेम, सम्मान और देखभाल में होता है। जंगल का रहस्य सुलझ चुका था, और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी अब गाँव के हर बच्चे के कंधों पर थी। वे सब मिलकर अपने जादुई जंगल के रक्षक बन गए थे।

बाल कविता - जंगल का जादू लौटाना

नीले पहाड़ों के जंगल में,
छाई थी उदासी गहरी।
पत्ते झर रहे, फूल मुरझाए,
चुप थे सब पशु-पंछी सारे।

सोनिया बेटी जिज्ञासु बहुत,
दादी के संदूक में पाया रत्न।
"नीले पहाड़ों का रहस्य" किताब,
हरे मोती का मिला महत्व।

"जंगल का दर्द मिटाना है,
हरा मोती लाना है!"
बैग लिया, टॉर्च लिया साथ,
चली सोनिया जंगल की पथ।

खामोशी भारी, डरावनी राह,
तभी आया चंचल खरगोश सामने।
"हूँ मैं चंचल, बोलता था पहले,
पर अब खो गया सब जंगल वाले।"

किताब दिखाई, बताई बात,
"हाँ!" बोला चंचल, "वो जीवन की धार!"
गीतों की घाटी, गीत नहीं आते,
उदास उल्लू ग्यानी बैठे पेड़ पाते।

"सावधान रहना, प्यारी बच्ची,
काँटों का मैदान आता है आगे।"
दिया नीला जादुई पंख साथी,
काँटे हटे, बना रास्ता साथी।

नीलीमा चिड़िया गाना भूली,
"शोर-गंदगी ने गीत चुरा लिया!"
बातूनी बांस भी दुखी बहुत थे,
प्लास्टिक के कचरे से घिरे सब थे।

सोनिया ने कचरा साफ किया सारा,
बांस ने कहा, "धन्यवाद प्यारा!"
पुराने बरगद की जड़ों के पास,
खोदा, मिला हरा मोती अकस्मात!

हाथ में लिया, चमकी ज्योत निराली,
फैली सब जगह, हरी-भरी डाली!
पत्ते खिले, फूलों की रोशनी जगी,
गीतों की धुन फिर हवा में लहरी!

नीलीमा गाई, चंचल ने नाचा,
ग्यानी बोले, "तूने कमाल किया!"
"पर याद रखो, प्यारे बच्चो,
जंगल की रक्षा सबकी जिम्मेदारी है।

हरा मोती दिल है जंगल का,
साफ-सुथरा रखो घर इसका।
पेड़ लगाओ, कचरा न फैलाओ,
जादू यहाँ हमेशा बनाए रखो!"

सोनिया ने गाँव के बच्चे बुलाए,
जंगल के रक्षक सबको बनाये।
हरा मोती जड़ों में जगमगाए,
जंगल का जादू फिर से महकाए!


नाम - भारमल गर्ग "विलक्षण"
पता - सांचौर राजस्थान (३४३०४१)
चलभाष:- 8890370911
अणुडाक:- bhamugarg@gmail.com


    इंदौर समाचार में प्रकाशित १७/०६/२०२५ को


सोमवार, 16 जून 2025

"सावन की सुरभि"

सावन के झूलते बादल घन,  
हर दिशा में गरजे बादल घन।  
टप-टप बूँदों का संगीत सुन,  
मन के तारों में बजे मधुर रन।  

काली मिट्टी की सोंधी खुशबू,  
हर सांस में भर जाए रस घुला।  
पेड़ों पर हरा साड़ी ओढ़ी,  
धरती ने लिया सजीव रूप धरा।  

छप्पर से टपकती फुहारें,  
हर बूँद में है सुकून समाया।  
दादी के हाथ का सेंका मक्का,  
आँगन में धुआँ-सा छाया।  

नदी उफान पर आई रुधिर सी,  
पानी का रंग मटमैला हुआ।  
बचपन की नाव डूबी जहाँ,  
वो स्मृति अब भी मन को चैना हुआ।  

सावन यूँ ही बरसे झम-झम कर,  
धरती के हर घाव को धो दे।  
जीवन की सादगी में छुपा है,  
वो सुख जो चमकता सोना दे।  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

शनिवार, 14 जून 2025

वर्षा का पूर्वाभास

प्रियतमा महादेवी

आज यहाँ वर्षा का पूर्वाभास हो रहा है। वातावरण शांत है, पर उमस की सघनता हृदय को व्याकुल कर रही है—जैसे तुम्हारे दर्शनमात्र से यह उत्कंठा और बढ़ जाती है। बगीचे में एकांत अध्ययन करते हुए, मेरे सम्मुख नीम का वृक्ष आम्र-सा दिखाई दे रहा है। उस पर लगी निंबोलियाँ आधी हरी, आधी पीतवर्णी हैं। ये फल मुझे द्विधा में डाल देते हैं: एकांत में हरी निंबोली की कटुता अनुभव होती है, और तुम्हारे विचारों में डूबा हुआ जब देखता हूँ तो पीली निंबोली मधुर प्रतीत होती है—मानो तुम्हारे आगमन की स्वर्णिम आशा। ये फल जीवन की उस द्वंद्वात्मक दृष्टि का प्रतिबिंब हैं, जो तुम्हें देखकर मेरे मन में जागी है।  

तुमसे विछुड़े अल्प दिन ही बीते हैं, किंतु ऐसा प्रतीत होता है मानो युग बीत गए हों। अब ये निंबोली पककर तुम्हारे मधुर ओष्ठों का स्पर्श पाने को आतुर हैं... और तुम यहाँ नहीं हो। बसंत में भी वर्षा आने वाली है, परंतु हे मेघसुभगे! तुम कब आओगी?  

हे चंद्रानना! तुम्हारी प्रथम दृष्टि का स्मरण आज भी हृदय में जीवंत है। उस दिन तुम्हारे मंद मुस्कान और नयनों की नीलिमा ने मुझे मोहित कर लिया। तुम केवल एक छात्रा नहीं, अपितु जीवन का काव्य, प्रकृति की सजीव मूर्ति हो। तुम्हारे बिना जीवन नीम के हरे फल-सा कटु रह गया है। संध्या के समय जब गोधूली आकाश को रंजित करती है, तब तुम्हारी स्मृति मुझे बाग़ की ओर खींच लाती है। नीम की छाया में बैठकर, पत्तों की सरसराहट में तुम्हारे पायलों की झंकार सुनने का भ्रम होता है... किंतु नेत्र खोलते ही सब शून्य हो जाता है।  

मेरे स्मृति-पटल पर अंकित हैं। दुखियों पर करुणा, कविताओं में रुचि, चिंतन की गंभीरता—ये सब तुम्हें दिव्य बनाते हैं। तुम्हारे सान्निध्य में मौन भी संवाद बन जाता था। अब तुम्हारा वियोग जीवन को नीरस बना रहा है। भोजन में स्वाद नहीं, पुस्तकें रुचिहीन लगती हैं। रात्रि में चंद्रिका देखकर तुम्हारे मुखचंद्र की स्मृति हो आती है। हे प्राणप्रिया! तुम मेरे दिन की प्रभा और रात की चंद्रिका हो।  

अब असह्य हो रही है। तुम्हारे पत्र, तुम्हारे स्पर्श से सुरभित पुष्प, तुम्हारी भृकुटि की रेखाएँ—ये ही मेरी शांति हैं। वर्षा का प्रत्येक बूँद तुम्हारे अश्रु-सा प्रतीत होगा। पीली निंबोलियाँ जल से आर्द्र होकर तुम्हारे आगमन पर मेरे हर्षाश्रुओं का स्मरण दिलाएँगी। हे वर्षासुभगे! कब तुम भी इस शुष्क हृदय को अपने स्पर्श से आर्द्र करोगी?  

तुम्हारा वियोग विरहानल-सा दग्ध कर रहा है। तुम मेरे लिए शीतल चंदन, मलय की पवन और तृषित हृदय की जलधारा हो। तुम्हारे बिना यह जीवन वैराग्य का नीरस पथ बन गया है। तुम्हारे आगमन पर ही यह निंबोली-सा कटु जीवन अमृतमय होगा।  

                                       तुम्हारा अपना:- 
                             पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"  🌸 


मंगलवार, 10 जून 2025

आषाढ़ का एक दिन - आ. मोहन राकेश

संस्कृत साहित्य के अप्रतिम कवि कालिदास की कालजयी कृतियाँ जैसे अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम् (नाटक); रघुवंशम् एवं कुमारसं्भवम् (महाकाव्य); तथा मेघदूतम् एवं ऋतुसंहारम् (खंडकाव्य) का मैंने गहन अध्ययन किया है। इन कृतियों में न केवल काव्य की उच्चतम छटा है, अपितु जीवन-दर्शन का व्यापक बोध भी समाहित है। किंतु जब एक पर्व विशेष के दिवसों में आदरणीय मोहन राकेश द्वारा रचित "आषाढ़ का एक दिन" नाटक पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ, तब मेरी साहित्यिक चेतना जैसे किसी नए मोड़ पर आ खड़ी हुई। यह नाटक मेरे भीतर ऐसी रेखाएँ खींच गया, जिनकी दिशा और गहराई का अनुमान मुझे स्वयं नहीं था। यह अनुभव केवल एक पाठ नहीं था, बल्कि एक आत्मिक अन्वेषण बन गया—ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर सायास नहीं दिया जा सकता।

"आषाढ़ का एक दिन" हिन्दी के नामी लिखने वाले मोहन राकेश का लिखा हुआ एक भाव भरा खेल (नाटक) है। यह नाटक कवि कालिदास के जीवन को दर्शाता है, जब वह गाँव से राजदरबार की ओर चला जाता है। यह कहानी उसके मन के टकराव, उसके सच्चे प्रेम, और उसके भीतर उठते दुःख को हमारे सामने रखती है।

✦ नाटक के चरित्र:
कालिदास – गाँव में रहने वाला एक कवि, जो बाद में राजकवि बनता है।
मल्लिका – उसकी प्रेम करने वाली साथी, जो उसे सच्चे मन से चाहती है।
विलोमा – दरबार से आया हुआ चालाक आदमी।
प्रियंगु मंजरी – रानी बनी हुई स्त्री, जो कालिदास की पत्नी बनती है।
करुणा – मल्लिका की सहेली।
रैवत्य – कालिदास का पुराना साथी।


◉ पहला भाग:
नाटक की शुरुआत एक छोटे गाँव से होती है, जहाँ कालिदास और मल्लिका साथ रहते हैं। वे एक-दूजे को चाहने लगे हैं। तभी राजमहल से संदेश आता है कि कालिदास को दरबार बुला रहा है। मल्लिका अपने प्रेम को रोके बिना उसे जाने देती है।

◉ दूसरा भाग:
अब कालिदास राजमहल में है। वहाँ उसे नाम और मान मिलता है, लेकिन उसका मन खाली रहता है। वह रानी से ब्याह कर लेता है, पर उसका मन मल्लिका में ही अटका रहता है। उसे गाँव और अपना बीता प्यार बहुत याद आता है।

◉ तीसरा भाग:
कई सालों बाद कालिदास फिर गाँव लौटता है। मल्लिका अब भी उसी गाँव में है। वे दोनों मिलते हैं, पर अब पहले जैसा अपनापन नहीं बचा। कालिदास समझता है कि उसने बहुत कुछ पा लिया, पर असल में वह सब कुछ खो बैठा।

आदरणीय महामहोपाध्याय प्रवीण पंड्या जी ने इस नाटक की प्रति सप्रेम भेंट की थी, जिसके लिए मैं चिरऋणी हूँ। यह कृति कालिदास के अंतर्द्वंद्व, प्रेम और यश के द्वंद्व को अत्यंत मानवीय रूप में प्रस्तुत करती है। वास्तव में, यह नाटक साहित्य के माध्यम से आत्मा के मौन को उद्घाटित करने का माध्यम बन गया।


- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"




शोध-प्रबन्ध : कामसूत्र के पृष्ठों में अंकित यौवन-सृजन -पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

(एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से) मैं नहीं, कोई वात्स्यायन बैठा है इस लेखनी के पार, शास्त्र के श्लोकों में टटोल रहा, रति-रहस्य का सार। यह यौवन न...