शुक्रवार, 20 जून 2025

प्राणप्रिया

हे हृदयेश्वरी प्रिया! तुम, स्मृति हृदय में बसी।  
तुम्हारे दर्शन बिना, व्याकुल यह मन रही॥  
  
तेरे नयन नीलकंज सम, अधर रसाल फल ज्यों।  
मुख चंद्रिका सुप्रकाशित, मन हर लेत सब क्षण त्यों॥  
करत तव अंग-संगति, पुलकित तन-मन होय।  
बिनु तव सुधा-सान्निध्य, जीवन सूना सखी मोय॥  

विरह-व्यथा जब घेरती, तुम आवो निकट तब।  
तुम्हारे आलिंगन में, मिले शांति अमृत-रस॥  

कुंतल तव लतिका सम, सुगंध मन को मोहै।  
वाणी तव कोकिल स्वर, श्रुति में मधु सी बहै॥  
त्वमसि मम जीवनस्य, नौका भवसागर की।  
त्वदधीन यह प्राण है, प्रतिज्ञा करत हृदय की॥  

- पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण" 🌸 

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