हर दिशा में गरजे बादल घन।
टप-टप बूँदों का संगीत सुन,
मन के तारों में बजे मधुर रन।
काली मिट्टी की सोंधी खुशबू,
हर सांस में भर जाए रस घुला।
पेड़ों पर हरा साड़ी ओढ़ी,
धरती ने लिया सजीव रूप धरा।
छप्पर से टपकती फुहारें,
हर बूँद में है सुकून समाया।
दादी के हाथ का सेंका मक्का,
आँगन में धुआँ-सा छाया।
नदी उफान पर आई रुधिर सी,
पानी का रंग मटमैला हुआ।
बचपन की नाव डूबी जहाँ,
वो स्मृति अब भी मन को चैना हुआ।
सावन यूँ ही बरसे झम-झम कर,
धरती के हर घाव को धो दे।
जीवन की सादगी में छुपा है,
वो सुख जो चमकता सोना दे।
- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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