प्रिय महादेवी,
अद्य पुनः उस पथ के शीर्ष पर स्थित होकर मैंने उस मार्ग को निहारा – वही मार्ग जो कभी तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा में मेरी दृष्टि का स्थायी आधार हुआ करता था। अद्य वह राजपथ कितना शून्य, कितना नीरव प्रतीत होता है! प्रत्येक इष्टका, प्रत्येक कोण, वह पुरातन नीम वृक्ष जिसकी छाया में हम कभी विश्रांत होते थे – सर्वत्र तुम्हारी स्मृति से स्पंदित हो उठते हैं, किंतु तुम्हारे सजीव, चेतन रूप के अभाव में यह समस्त दृश्य एक चित्रलिपि के समान निर्जीव एवं पीड़ाकर बन गया है। वह पथ अब केवल एक निर्जन मार्ग है, जिसका प्रत्येक कण तुम्हारे वियोग की वेदना को चीत्कार-चीत्कार कर कह रहा है।
तत्पश्चात् उस वातायन की ओर मेरी दृष्टि उठी, वही वातायन जहाँ से तुम्हारे आगमन का प्रथम सूचक दृष्टिगोचर होता था। अद्य उसी स्थान पर स्थित होकर जब बहिः प्रेक्षण करता हूँ, तो समस्त विश्व अन्धकार ही अन्धकार में निमग्न प्रतीत होता है। सूर्य का प्रकाश भी निष्प्रभ, चंद्रिका भी शोकाकुल, नक्षत्रों का टिमटिमाना भी करुण कथा वर्णन करता हुआ। बाह्य का यह तमस् अंतर के उस विशाल शून्य की केवल एक मूक प्रतिकृति है, जिसे तुम्हारे वियोग ने इस हृदय में प्रतिष्ठापित कर दिया है। क्या यह वातायन अब केवल एक रिक्त प्रकोष्ठ बनकर रह गया है? क्या इससे होकर अब केवल स्मृतियों की शीतल समीर ही प्रविष्ट होगी?
प्रिये, यह प्रतीक्षा कितनी कष्टदायक है! प्रत्येक क्षण एक नई वेदना का जनक बन जाता है। प्रातःकाल का प्रथम किरणपुंज जब इस कक्ष में प्रवेश करता है, तो उसमें तुम्हारे आगमन की आशा निहित होती है। सायंकाल की लालिमा जब विदा लेती है, तो वह मेरी नैराश्य को और गंभीर कर जाती है। रात्रि के निश्शब्द क्षण तो पृथक ही यंत्रणा देते हैं – नक्षत्रों के मध्य तुम्हारा मुख खोजना, चंद्र के कांतिमान प्रकाश में तुम्हारी छवि का भ्रम देखना, और तत्पश्चात् उस भ्रम के विलीन होने पर उस विशाल शून्यता से साक्षात्कार करना... यह एक चक्रव्यूह है जिससे निर्गमन का मार्ग तुम्हारे सिवा अन्य कौन प्रदर्शित कर सकता है?
तुम्हारी अनुपस्थिति ने इस जीवन की समस्त ध्वनियों को मूक बना दिया है। पक्षियों का कलरव भी अब एक शुष्क पर्ण के खड़खड़ाने के समान प्रतीत होता है। मानवीय संभाषण निरर्थक पदों का समूह प्रतीत होती है। संगीत भी केवल स्वरों का एक विषादपूर्ण विस्तार है, जिसमें तुम्हारी स्मृति का सुर ही अनुगूंजित होता रहता है। समस्त संसार एक मूक चित्र के समान स्थिर हो गया है, जिसमें केवल तुम्हारी स्मृति ही सजीव वर्ण भर सकती है।
कदाचित् ऐसा प्रतीत होता है मानो तुम्हारा मधुर स्वर वायु के झोंकों के साथ मेरे श्रवणों में गूंज उठेगा। कदाचित् भास होता है जैसे द्वार पर तुम्हारी कोमल आघात की ध्वनि श्रवणगोचर होगी। प्रत्येक पदचाप हृदय को विचलित कर देती है, प्रत्येक छाया आशा की नवीन किरण बनकर उदित होती है और तत्क्षण नष्ट हो जाती है। यह आशा और नैराश्य का निरंतर संघर्ष हृदय को क्लांत कर देता है। क्या तुम इस निराशा के तिमिर में आशा का एक दीपक लेकर नहीं आओगी? कब तक इस शून्यता की पीड़ा सहता रहूँ?
तुम्हारे वियोग में प्रकृति भी सहानुभूति का कर स्पर्श कराती प्रतीत होती है। वर्षा की बिंदुएँ मेरे अश्रुओं से मिलकर प्रवाहित होती हैं। शीतल पवन मेरी उदासी को विचलित करती है। रात्रि का तारामंडल मेरी एकाकी कष्ट को निहारता रहता है। क्या ये सब भी तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं? क्या ये प्रकृति के अंग भी जानते हैं कि उनकी सुंदरता तुम्हारे दर्शन के विना अपूर्ण है?
महादेवी, यह पत्र मेरी विरह-वेदना का मौन साक्षी है। इन पदों में बद्ध ये अक्षर मेरे हृदय की वह करुण आर्तध्वनि हैं, जो तुम तक पहुँचकर ही निवारित हो सकती है। मेरी यह याचना है, मेरी यह प्रार्थना है – इस शून्य को पूर्ण करने हेतु, इस तम को दूर करने हेतु, इस विरह की दाह को शांत करने हेतु... पुनरागच्छ। यह हृदय तुम्हारी प्रतीक्षा में तड़प रहा है। तुम्हारे विना यह समय नहीं, युग व्यतीत हो रहा है। मेरे नयन तुम्हारे मुखचंद्र के दर्शन हेतु व्याकुल हैं। मेरे श्रवण तुम्हारे मधुर स्वर हेतु लालायित हैं। यह प्राण तुम्हारे सान्निध्य हेतु अशांत है।
तुम कब आओगी?
तुम्हारा दुर्भाग्यशाली,
तुम्हारी स्मृतियों में विलीन प्रिय
- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें