शुक्रवार, 27 जून 2025

प्रतीक्षा, संघर्ष और आशा की ज्योति

कब तक यूँ सिसकियों में बिताए रातें हम?  
चुप-चुप राहों पर जलना है सूरज बताना।  
 
हर दर्द बोझल सा लगे, हर साँस गहरी हो गई,  
फिर भी धड़कन में बसी है जीत का सूरज बताना।  
  
टूटे सपनों के टुकड़े जमा करते रहे हम,  
राख से उग आए फिर नया सूरज बताना।  

काँटों की सेज पे सोया जो, उसी ने जाना है,  
कैसे खिलता है गुलशन में दर्द का सूरज बताना।  

डूबते तारों की लौ भी बना लेती है राहें,  
अंधेरों को चीर करना है सूरज बताना।  
 
अपना वक़्त भी आएगा, यूँ ही न टूटो दिल से,  
इस ज़माने को भी आखिर हार का सूरज बताना।

- भारमल गर्ग "विलक्षण"  


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