गुरुवार, 26 जून 2025

पावन पीर

हे पावस, भेजो पिया पास यह मेरी अरदास रे।  
बरस-बरस स्मृति उनकी अश्रु बन बरसाती जास रे॥  

घन गरजे, गगन डोले, मन मेरा भी डोले रे।  
कौन कहे उनको यहाँ, परछाईं सी घोले रे?  
बूंद-बूंद टपके छत पे, तर्पण करती जैसे रे।  
हर बूँद में उनका चेहरा मेरे सामने आये रे॥  

सावन की सुगंध भरी हवा, स्पर्श करती तन को रे।  
कहती है उनके वियोग में, यह सुख भी कैसा रे?  
खोल देख पलकें, आँखों में उनका ही रूप समाया रे।  
यह सुगंध उनकी बाँहों की, मन को बहलाती जाये रे॥  

विद्युत चमकी अँधियारे में, चित्र उभरा मन का रे।  
एक पल चमकी मुसकान उनकी, फिर हो गई बुझी सी रे।
गीली मिट्टी सी सुगंध उठी, भीगे तन की याद दिलाये रे।  
कहाँ छिपे हो पिया तुम, यह चमक तो बतलाती जाये रे॥  
मोर नाचे, पपीहा पुकारे, सब मिल मचाये हल्ला रे।  
मेरा मन गुमसुम बैठा है, सुनता सिसकियों का स्वर रे।  
क्यों न आये वे, यह पपीहे की पुकार पुकारती जाये रे?  
इस शोर में भी सुनाई देती, उनकी मधुर बोली सारी रे॥  

बादल छँटे, सूरज निकला, हरियाली छाई धरती रे।  
पर अभी तक मेरे नयनों में, बरसा ही जाती बरखा रे।  
मन का आकाश तो घिरा रहा, बादलों से भरा ही रे।  
पावस थमा पर यादों की सरिता अविरल बही रे॥  

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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