मंगलवार, 10 जून 2025

आषाढ़ का एक दिन - आ. मोहन राकेश

संस्कृत साहित्य के अप्रतिम कवि कालिदास की कालजयी कृतियाँ जैसे अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, मालविकाग्निमित्रम् (नाटक); रघुवंशम् एवं कुमारसं्भवम् (महाकाव्य); तथा मेघदूतम् एवं ऋतुसंहारम् (खंडकाव्य) का मैंने गहन अध्ययन किया है। इन कृतियों में न केवल काव्य की उच्चतम छटा है, अपितु जीवन-दर्शन का व्यापक बोध भी समाहित है। किंतु जब एक पर्व विशेष के दिवसों में आदरणीय मोहन राकेश द्वारा रचित "आषाढ़ का एक दिन" नाटक पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ, तब मेरी साहित्यिक चेतना जैसे किसी नए मोड़ पर आ खड़ी हुई। यह नाटक मेरे भीतर ऐसी रेखाएँ खींच गया, जिनकी दिशा और गहराई का अनुमान मुझे स्वयं नहीं था। यह अनुभव केवल एक पाठ नहीं था, बल्कि एक आत्मिक अन्वेषण बन गया—ऐसा प्रश्न, जिसका उत्तर सायास नहीं दिया जा सकता।

"आषाढ़ का एक दिन" हिन्दी के नामी लिखने वाले मोहन राकेश का लिखा हुआ एक भाव भरा खेल (नाटक) है। यह नाटक कवि कालिदास के जीवन को दर्शाता है, जब वह गाँव से राजदरबार की ओर चला जाता है। यह कहानी उसके मन के टकराव, उसके सच्चे प्रेम, और उसके भीतर उठते दुःख को हमारे सामने रखती है।

✦ नाटक के चरित्र:
कालिदास – गाँव में रहने वाला एक कवि, जो बाद में राजकवि बनता है।
मल्लिका – उसकी प्रेम करने वाली साथी, जो उसे सच्चे मन से चाहती है।
विलोमा – दरबार से आया हुआ चालाक आदमी।
प्रियंगु मंजरी – रानी बनी हुई स्त्री, जो कालिदास की पत्नी बनती है।
करुणा – मल्लिका की सहेली।
रैवत्य – कालिदास का पुराना साथी।


◉ पहला भाग:
नाटक की शुरुआत एक छोटे गाँव से होती है, जहाँ कालिदास और मल्लिका साथ रहते हैं। वे एक-दूजे को चाहने लगे हैं। तभी राजमहल से संदेश आता है कि कालिदास को दरबार बुला रहा है। मल्लिका अपने प्रेम को रोके बिना उसे जाने देती है।

◉ दूसरा भाग:
अब कालिदास राजमहल में है। वहाँ उसे नाम और मान मिलता है, लेकिन उसका मन खाली रहता है। वह रानी से ब्याह कर लेता है, पर उसका मन मल्लिका में ही अटका रहता है। उसे गाँव और अपना बीता प्यार बहुत याद आता है।

◉ तीसरा भाग:
कई सालों बाद कालिदास फिर गाँव लौटता है। मल्लिका अब भी उसी गाँव में है। वे दोनों मिलते हैं, पर अब पहले जैसा अपनापन नहीं बचा। कालिदास समझता है कि उसने बहुत कुछ पा लिया, पर असल में वह सब कुछ खो बैठा।

आदरणीय महामहोपाध्याय प्रवीण पंड्या जी ने इस नाटक की प्रति सप्रेम भेंट की थी, जिसके लिए मैं चिरऋणी हूँ। यह कृति कालिदास के अंतर्द्वंद्व, प्रेम और यश के द्वंद्व को अत्यंत मानवीय रूप में प्रस्तुत करती है। वास्तव में, यह नाटक साहित्य के माध्यम से आत्मा के मौन को उद्घाटित करने का माध्यम बन गया।


- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"




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