आज यहाँ वर्षा का पूर्वाभास हो रहा है। वातावरण शांत है, पर उमस की सघनता हृदय को व्याकुल कर रही है—जैसे तुम्हारे दर्शनमात्र से यह उत्कंठा और बढ़ जाती है। बगीचे में एकांत अध्ययन करते हुए, मेरे सम्मुख नीम का वृक्ष आम्र-सा दिखाई दे रहा है। उस पर लगी निंबोलियाँ आधी हरी, आधी पीतवर्णी हैं। ये फल मुझे द्विधा में डाल देते हैं: एकांत में हरी निंबोली की कटुता अनुभव होती है, और तुम्हारे विचारों में डूबा हुआ जब देखता हूँ तो पीली निंबोली मधुर प्रतीत होती है—मानो तुम्हारे आगमन की स्वर्णिम आशा। ये फल जीवन की उस द्वंद्वात्मक दृष्टि का प्रतिबिंब हैं, जो तुम्हें देखकर मेरे मन में जागी है।
तुमसे विछुड़े अल्प दिन ही बीते हैं, किंतु ऐसा प्रतीत होता है मानो युग बीत गए हों। अब ये निंबोली पककर तुम्हारे मधुर ओष्ठों का स्पर्श पाने को आतुर हैं... और तुम यहाँ नहीं हो। बसंत में भी वर्षा आने वाली है, परंतु हे मेघसुभगे! तुम कब आओगी?
हे चंद्रानना! तुम्हारी प्रथम दृष्टि का स्मरण आज भी हृदय में जीवंत है। उस दिन तुम्हारे मंद मुस्कान और नयनों की नीलिमा ने मुझे मोहित कर लिया। तुम केवल एक छात्रा नहीं, अपितु जीवन का काव्य, प्रकृति की सजीव मूर्ति हो। तुम्हारे बिना जीवन नीम के हरे फल-सा कटु रह गया है। संध्या के समय जब गोधूली आकाश को रंजित करती है, तब तुम्हारी स्मृति मुझे बाग़ की ओर खींच लाती है। नीम की छाया में बैठकर, पत्तों की सरसराहट में तुम्हारे पायलों की झंकार सुनने का भ्रम होता है... किंतु नेत्र खोलते ही सब शून्य हो जाता है।
मेरे स्मृति-पटल पर अंकित हैं। दुखियों पर करुणा, कविताओं में रुचि, चिंतन की गंभीरता—ये सब तुम्हें दिव्य बनाते हैं। तुम्हारे सान्निध्य में मौन भी संवाद बन जाता था। अब तुम्हारा वियोग जीवन को नीरस बना रहा है। भोजन में स्वाद नहीं, पुस्तकें रुचिहीन लगती हैं। रात्रि में चंद्रिका देखकर तुम्हारे मुखचंद्र की स्मृति हो आती है। हे प्राणप्रिया! तुम मेरे दिन की प्रभा और रात की चंद्रिका हो।
अब असह्य हो रही है। तुम्हारे पत्र, तुम्हारे स्पर्श से सुरभित पुष्प, तुम्हारी भृकुटि की रेखाएँ—ये ही मेरी शांति हैं। वर्षा का प्रत्येक बूँद तुम्हारे अश्रु-सा प्रतीत होगा। पीली निंबोलियाँ जल से आर्द्र होकर तुम्हारे आगमन पर मेरे हर्षाश्रुओं का स्मरण दिलाएँगी। हे वर्षासुभगे! कब तुम भी इस शुष्क हृदय को अपने स्पर्श से आर्द्र करोगी?
तुम्हारा वियोग विरहानल-सा दग्ध कर रहा है। तुम मेरे लिए शीतल चंदन, मलय की पवन और तृषित हृदय की जलधारा हो। तुम्हारे बिना यह जीवन वैराग्य का नीरस पथ बन गया है। तुम्हारे आगमन पर ही यह निंबोली-सा कटु जीवन अमृतमय होगा।
तुम्हारा अपना:-
पं. भारमल गर्ग "विलक्षण" 🌸

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