सोमवार, 21 अप्रैल 2025

विरह के फूल

शिवम के हाथों में मिट्टी की खुशबू और फूलों का स्पर्श था, पर मीरा की यादें अब उसकी हथेलियों में काँटों की तरह चुभतीं। पारिजात के वृक्ष के नीचे बैठकर वह उन सुबहों को याद करता, जब मीरा की चुनरी हवा में लहराती और फूलों की डालियाँ उसके लिए झुक जाती थीं। अब वही डालियाँ सूनी थीं, और हर पत्ते पर मीरा का नाम लिखा प्रतीत होता था।  

जिस दिन मीरा ने कहा, "मेरे पिता ने मेरा रिश्ता दूर देश के एक परदेसी से तय कर दिया," शिवम ने उसकी आँखों में डूबते सूरज को देखा। वह जानता था—पारिजात का फूल देवताओं के लिए होता है, मृत्युलोक की प्रेमकथाएँ उसकी पंखुड़ियों पर नहीं टिकतीं। फिर भी, उसने मीरा की चूड़ियों की खनक को अपनी धड़कनों में बाँध लिया था।  

मीरा के जाने के बाद, शिवम ने उद्यान की हर क्यारी में बबूल और नागफनी के बीज बोए। लोगों ने पूछा, "इन काँटों से क्या मिलेगा?" शिवम मुस्कुराया, "फूल तो बिछड़न की रात में ही मुरझा गए। अब सिर्फ़ यही बचा है—जलन, जो हर साँस में उगेगी।"  

एक साल बाद, जब मीरा का पहला पत्र आया, उसमें लिखा था— "वहाँ के बाग़ में पारिजात नहीं होते।" शिवम ने पत्र को काँटों से छेद दिया और उद्यान के कुएँ में फेंक दिया। उस दिन से, कुएँ का पानी कड़वा हो गया। कहते हैं, अब भी वह उद्यान फूल नहीं, केवल विरह की राख उगलता है। और रात में जब पारिजात की छाया टूटती है, तो शिवम की आँखों से कोई टूटा हुआ सपना बह जाता है।  

सारांश: प्रेम की सुगंध और विरह की चुभन एक ही डाली पर खिलते हैं। शिवम का उद्यान अब उसकी भाषा है—जहाँ हर काँटा मीरा के बिना जीने का एक वाक्य है।


- भारमल गर्ग "विलक्षण"

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

विरह की पतझड़ी गीत

पतझड़ की नीरवता में, प्राण तरस उठे सुख के लिए,  
शुष्क पत्र-सा मन मेरा, क्षण-क्षण बिखरता विषाद।  
कहाँ गया वह मम सखा? छोड़ गया यह तिमिर घनघोर,  
हर श्वास में वेदना है, हर पल बढ़ती मलिन छाया भोर।  
 
शीतल समीर सरसराती, पर अंतर ज्वाला सी धधके,  
भग्न स्मृतियों के खंडित अंश, अब कैसे सँवरें सधे?  
वे क्षण जो साथ बीते थे, स्मृतिपटल पर अंकित रहे,  
अब शेष रह गई है केवल, निर्झर-सी अविरल पीर बहे। 

सावन की स्मृति दिखलाते, ये पत्रों के शुष्क वर्ण अब,  
न वर्षा का मधुर स्वर है, न प्रेम-तानों का संग रब।  
धूमिल रवि छिपा अंबर में, घनघोर मेघों की छाया सी,  
ज्यों वह मेरा प्राणनाथ, लीन हुआ किसी गुप्त नगरी।  

वृक्षों की शाखाएँ रिक्त, कोकिल का कलरव भी लुप्त,  
मेरे गीतों में अब केवल, विरह-स्वर शून्यता में डूबे।  
निशा का आवरण ओढ़कर, तारे भी रोते सकुचाए,  
ज्यों मेरे नयनों से अश्रुधार, बहती निरंतर बन जाए।  

मार्ग में गिरे पलाश के, पुष्प सिसक उठे मौन स्वर में,  
मेरे अंतर के क्षतों को, ये दृश्य और भी खोलते।  
जब साथ हँसते थे हम दोनों, वे पंथ अब सूने सभी,  
अब तो बस प्रतीक्षा है, उस मुखचंद्र की छवि ध्यान में।  

शीतल चंद्रिका निशा में, शीतल छाया-सी लगती है,  
वे दिवस कहाँ विलीन हुए, जब उसकी बाँहों में जगती।  
अब तो स्वप्नों में भी वह, धूमिल-सा दिखलाता है,  
ज्यों पतझड़ का पर्ण समीर के संग लुप्त हो जाता है।  

क्या यह ऋतु का विधान है? प्रेम भी कुम्हलाएगा क्या?  
ज्यों ये पत्र झरते सब, वह भी मुझे विसराएगा क्या?  
किंतु नहीं, मम आशा है, वसंत पुनः आएगा,  
विरह के इन क्षणों का दाह, प्रेम की छाया में मिट जाएगा।  

हे प्रभो! यह पतझड़ टले, उसके संग फिर मिलन हो,  
मेरे अधूरे गानों का, कोई मधुर समापन हो।  
जब तक वह नहीं आता, यह हृदय सिसकता रहेगा,  
पतझड़-सा मेरा मन, झर-झर कर विलीन होता रहेगा।  


• भारमल गर्ग "विलक्षण"
• सांचौर राजस्थान (३४३०४१)


मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

विरह-पत्र: महादेवी के प्रति


प्रिय महादेवी, 

मणिकर्णिका के उस पावन घाट पर, जहाँ गंगा की लहरें हमारे मौन को समझती थीं, आज वही निर्झर मेरे नेत्रों की नमी को अपने अधरों में समेट रहा है। तुम्हारे बिना यह काशी, जो कभी हमारे मिलन का साक्षी था, अब एक सूनी गुफा-सी प्रतीत होती है। प्राणों में बसी तुम्हारी छवि आज भी उसी प्रथम दृष्टि की भाँति अमिट है, जब तुमने घाट की रेत पर चंचल चरण रखे थे और हम दोनों ने स्वयं को विधाता के अक्षय वरदान की संज्ञा दी थी। क्या तुम्हें स्मरण है? उस क्षण हमने प्रतिज्ञा की थी कि इसी घाट की रज में, इसी गंगा की गोद में, हमारे प्राणों का अंतिम संगम भी होगा। परंतु हे प्रिये, आज वह प्रतिज्ञा कहाँ विलीन हो गई?  

तुम्हारा उज्जैन चले जाना मेरे लिए वह दुःस्वप्न बन गया है, जिससे जागने का साहस नहीं होता। क्या प्रेम की यह अग्नि केवल एक तन की सीमा तक सिमटकर रह जाती है? जब तुमने कहा था, "हम दोनों इस घाट के दीपक की भाँति हैं, जो एक ही लौ से जलेंगे," तब क्यों नहीं समझा कि यह लौ इतनी क्षणभंगुर होगी? आज उज्जैन की धरा तुम्हें थामे है, और मैं इस घाट की शिला पर बैठा, तुम्हारे नाम का जाप करता हूँ। प्रत्येक आरती के समय, जब घंटियों की ध्वनि गूँजती है, मुझे तुम्हारी मधुर मुस्कान सुनाई देती है—पर वह केवल भ्रम होता है।  

हे महादेवी! क्या तुम्हारा हृदय अब उस मणिकर्णिका की स्मृतियों से विमुख हो गया है? जिस प्रकार यमुना के बिना यमुनोत्री व्यर्थ है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा यह जीवन भी निरर्थक प्रतीत होता है। तुमने कहा था ना—"प्रेम वह सरिता है जो मृत्यु के सागर में भी अमर रहती है," पर आज तुम स्वयं उस प्रवाह को बीच में ही छोड़कर चली गईं। क्या विरह की यह वेदना हमारे प्रेम की परीक्षा थी? यदि हाँ, तो मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं असफल हो गया... क्योंकि तुम्हारे बिना हर पल एक युग बन जाता है।  

अंतिम बार याद करो वह क्षण, जब हमने गंगा की लहरों से वचन लिया था। आज भी मेरी आत्मा उसी संकल्प पर अटल है। पर हे प्रियतमे, यदि तुम्हारी पथरीली चुप्पी ने इस प्रेम को पराजित कर दिया है, तो मुझे क्षमा करना—मैं तुम्हें विवश नहीं करूँगा। केवल इतना जान लो कि जिस दिन इस घाट की राख में मेरा शरीर विलीन होगा, उस दिन भी मेरी अंतिम आकांक्षा तुम्हारे चरणचिह्नों का स्पर्श ही होगी।  

तुम्हारा ही पंडित


- भारमल गर्ग "विलक्षण"

रविवार, 13 अप्रैल 2025

नयन-नीर के पत्र

पहला पत्र: महादेवी का पंडित जसराज के नाम
प्रिय जसराज,  

गंगा की लहरों ने जिस दिन हमारी मौन भाषा सुनी थी, वह स्मृति अब मेरे हृदय में एक जलती हुई दीपशिखा बन गई है। आज जब यह पत्र लिख रही हूँ, तो कलम के स्याही में मेरे अश्रुओं का मिश्रण है। मेरा विवाह तय हो चुका है... यह वाक्य लिखते हुए हर अक्षर मेरे सीने पर सुई-सी चुभता है। पर मैं क्या करूँ? समाज की वह जंजीरें, जो हमें जन्म के नाम पर अलग कर देती हैं, उन्हें तोड़ने का साहस मेरे भीतर नहीं।  

तुम्हें याद होगा, केशव कुंज के उस आम्रवृक्ष के नीचे, जहाँ तुम्हारे वेदांत आश्रम की पुस्तकों की सुगंध और मेरी चूड़ियों की खनक मिल जाती थी। उस दिन जब मैंने तुम्हें अपने हृदय की बात बताई, तब तक मेरे पिता ने मिथिलांचल के एक परिचित कुल में मेरा हाथ सुंदर कर दिया था। काश! मैं उस संध्या को फिर से जी सकती, जब तुम्हारी आँखों में झांककर मैंने पहली बार "प्रेम" शब्द का अर्थ समझा था। पर अब तो मैं यहाँ मिथिला की माटी में उस पौधे-सी हूँ, जिसकी जड़ें काशी की गंगा-तट की स्मृतियों से कट चुकी हैं।  

जसराज, मैं तुम्हें दोष नहीं देती। न तुम्हें, न इस समाज को। यह तो हमारे भाग्य का लेख है कि वैश्य कन्या और ब्राह्मण युवक की प्रेमकथा केवल विरह के गीतों तक सीमित रहे। मेरी डोली जब उठेगी, तो मेरे साथ तुम्हारे वे पत्र और वह सूखा गुलाब भी जाएगा, जो तुमने उस बसंत में मेरे केशों में सजाया था। मुझे डर है कि कहीं मिथिला की नई हवाएँ इन यादों की खुशबू को न बिखेर दें...  

तुम्हारे लिए मेरा प्रेम गंगा के अविरल प्रवाह-सा है। चाहे मेरा शरीर किसी और के नाम हो जाए, पर मेरी आत्मा तुम्हारे नाम की ज्योति बनकर जलती रहेगी। यदि कभी तुम्हारे आश्रम से गंगा की लहरें मिथिला तक आएँ, तो उन्हें मेरी विदाई का संदेश समझना।  

तुम्हारी,  
महादेवी 

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दूसरा पत्र: पंडित जसराज का महादेवी के नाम 
प्रिय महादेवी,

तुम्हारा पत्र पाकर मेरे हाथों ने जिस शांति से उसे छुआ, वही शांति अब मेरे मन में उथल-पुथल का कारण बन गई है। गंगा तट पर बैठकर यह पत्र लिख रहा हूँ, जहाँ तुम्हारी अनुपस्थिति में हर लहर तुम्हारा नाम पुकारती प्रतीत होती है। तुम्हारे विवाह का समाचार सुनकर मेरे हृदय ने जिस निर्वेद को जन्म दिया, वह वेदांत के उस सत्य की याद दिलाता है—"सब कुछ अनित्य है, केवल प्रेम की छाया शाश्वत।"  

तुम्हारा निर्णय सही है, महादेवी। समाज की प्रथाएँ हमारे लिए अदृश्य दीवारें खड़ी कर देती हैं, जिन्हें तोड़ने का प्रयास करना हमारे प्रेम को और अधिक रक्तरंजित कर देगा। तुम्हारे परिवार का आदर करो, क्योंकि उनकी नियति भी हमारी भाँति इसी चक्रव्यूह में बंधी है। मिथिला की पावन भूमि में तुम्हारा नया जीवन ऐसा खिले, जैसे यमुना तट पर खिला कोई नवीन कमल। मैं तुम्हारे सुख की कामना में अपने दुख का दीपक जलाऊँगा।  

याद करो वह शाम, जब तुमने कहा था—"प्रेम की कोई जाति नहीं होती।" आज वही प्रेम हमें सिखा रहा है कि कभी-कभी त्याग में ही प्रेम की सच्ची परिभाषा छिपी होती है। मेरे वेदांत ने मुझे यही पाठ पढ़ाया है। तुम्हारे विवाह के दिन मैं अपने आश्रम के मंदिर में तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा। मेरे प्राणों का हर श्वास तुम्हारे नाम का जाप बनेगा।  

विदा।  
तुम्हारा अक्षय प्रेमी
जसराज



- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

प्रेम-तपस्या:

तुम्हारा मौन शिला बन, अरुणाचल-शिखर ज्यों तपे,  
मेरी वाणी नदी बही, शिला में लीन सागर समापे।  
तुम नभ के दीपक जले, वेदों के मंत्र-सी ज्वाला,  
मेरी पृथ्वी तलाशती, तुम्हारे प्रकाश की माला।  

तुम्हारे स्पर्श वसंत बन, खिले अशोक के पुष्प भारी,  
मेरे विरह की शरद रात, पत्तों की चिता जलाती भारी।  
धुआँ बनकर उड़ती हूँ मैं, तुम तक पहुँचे यही आस,  
वटवृक्ष की छाया तुम, मैं जड़ों में बँधी वसुधा-प्यास।  

प्रेम नहीं यह ब्रह्म का, स्वयं से संवाद है गूढ़ा,  
तुम पृथ्वी, मैं नभ हूँ—यह परछाईयों का दुःख-सा ठूँडा।  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2025

श्री हनुमान चमत्कारी स्तोत्र




जय सूर्यमुखी हनुमान, ज्योति अमर अविनाश।  
कानीवाड़ा धाम तव, चमत्कार अति विशेष॥  
संगमरमर शिला से, निर्मित मंदिर विराज।  
छत विहीन छाया तव, नभ तलक सदा साथ॥  

पंच शताब्दी पूर्व, प्रगटे स्वयं बजरंग।  
पद्मासन ध्यानमग्न, तेजःपुंज दिव्य अंग॥  
दीवार उठी मूर्ति चढ़ी, रहस्य यह अद्भुत।  
भक्तजन के संकट हर, बालाजी महाबल॥  

वन मध्ये निर्जन था, अब विशाल धाम।  
छत रचना जद्यपि करो, टूट जाय समीर॥  
वायु वेग, तूफान सब, नत शीश करें आज।  
खुले गगन तले तव, कृपा-वृष्टि अमृत धार॥  

तेरह ज्योति अखंड ज्वलै, भक्ति का प्रतीक।  
मनोकामना पूर्ण होत, ज्योति बढ़े अनेक॥  
निराश्रित को संतान दें, वरदान तव दयाल।  
चरण रज लागत जो, तन-मन हो निर्मल॥  

गर्गवंशी पुजारी की , पूजा में प्रेम सार,  
गर्गाचार्य तपस्या की, यहाँ बहती है धार।  
जाति-भेद विहीन यहाँ, सबको सम दृष्टि।  
हनुमान प्रभु की महिमा, करे संकट मुक्त॥  
 
यदुकुल गुरु तपस्वी, वसुदेव हृदयेश।  
गोकुल से चलकर आए, ज्ञान-भक्ति विशेष॥  
परंपरा अखंड यहाँ, पूजा नित्य होत।  
अर्चक वंशज तव, सेवा में सदा रत॥  

आते भक्त दर्शन को, बन जाते दीवान।  
बालाजी चरणों में, अर्पित सब समान॥  
सिंदूर-तेल चढ़ावन, मनोबंधन टूट।  
हनुमान कृपा से हर, संताप सब छूट॥  

चमत्कार सागर यह, पावन तीर्थ धाम।  
रामभक्त की कीर्ति यह, जग विख्यात नाम॥  
जय हनुमान बोलो, नभ धरा गूँज उठे।  
कानीवाड़ा महिमा, जगत भर में फूटे॥  

सूर्यमुखी स्वरूप तव, तेज प्रकाशमान।  
खुले नभ की छत्रछाय, करे सब कल्याण॥  
डुबकी लगाओ भक्ति में, श्रद्धा सहित मन।  
पाप-ताप सब नष्ट हो, बचे प्रेम अखंड॥  

जय हो हनुमान प्रभु, जय चमत्कारी स्थान।  
कानीवाड़ा गाथा यह, हो अमर अविचल॥  
दर्शन मात्र से पावन, हो जाये अंतर।  
हनुमान चालीसा गाव, मुक्ति पाए संसार॥  


• भारमल गर्ग "विलक्षण"
• सांचौर राजस्थान (३४३०४१)



कहानी - विरह-विन्यास (काशी का रक्तिम रहस्य)


काशी की संध्या जब गंगा के जल में डूबती, तो अस्सी घाट की सीढ़ियाँ रहस्यों के साथ फुसफुसातीं। प्रीति की आँखें उस कोहरे को भेद रही थीं, जो अचानक लहरों से उठकर आकाश को घेरने लगा। हवा में तुलसी और धूप की सुगंध के बीच एक तीखी लौह-गंध घुली हुई थी। दूर, मणिकर्णिका घाट की ओर से एक टूटी नाव का साया धीरे-धीरे बढ़ रहा था—खाली, पर भारी। प्रीति के गले का रुद्राक्ष अचानक झनझनाया। वही रुद्राक्ष, जिसे अमन ने जाते समय दिया था, उसकी डोरी पर लिखा था—"जिस दिन इसकी एक मणि टूटे, समझ लेना... मैं यमराज से जूझ रहा हूँ।"  

गंगा के किनारे बिखरी मंत्रों की गूँज और घाटों पर जलते दीयों की रोशनी के बीच प्रीति ने महसूस किया—कोई उसकी निःश्वासों में समाया है। जैसे ही उसने कदम बढ़ाए, पानी में उसकी परछाई ने अमन का रूप धर लिया। पर वह छवि अचानक विकृत होकर काली धुंध में तब्दील हो गई। धुएँ से दो लाल आँखें चमकीं—"तुम्हारा प्यार उसकी आत्मा को नर्क की अग्नि में झोंक देगा!" प्रीति की चीख़ गंगा की लहरों में दब गई। जब उसने आँखें खोलीं, तो रुद्राक्ष की एक मणि टूटकर जल में समा चुकी थी। गंगा का जल अचानक रक्तिम हो उठा, मानो कोई अदृश्य शक्ति उसे चेतावनी दे रही हो।  

तभी, पीछे से एक खोखली आवाज़ गूँजी—"प्रीति... मैं तुम्हारे पास हूँ।" वह आवाज़ श्मशान की ओर से आ रही थी। प्रीति ने पलटकर देखा—एक कबंध (सिरविहीन देह) हाथ में जलती मशाल लिए खड़ा था! उसकी गर्दन से कीचड़ टपक रहा था। कबंध ने अचानक अपना सिर उठाया—वह अमन का चेहरा था, पर आँखों के स्थान पर कीड़े रेंग रहे थे। *"मुझे बचा लो... वे मुझे जिंदा जला रहे हैं!"* प्रीति के पैर जमीन में धँस गए। तभी गंगा की एक उछली हुई लहर ने कबंध को निगल लिया। प्रीति के हाथ में रुद्राक्ष की दूसरी मणि से खून टपकने लगा।  
  
प्रीति सीढ़ियों से भागकर संकट मोचन मंदिर पहुँची। मंदिर के द्वार पर खड़े वृद्ध पुजारी ने उसे रोक लिया—"बेटी, तुम्हारे प्रेमी पर काली माता का शाप है। जिस तांत्रिक ने तुम्हारे पिता को मारकर उनकी अस्थियाँ गंगा में बहाईं, वही अब अमन की आत्मा पर कब्ज़ा करना चाहता है।" पुजारी ने एक टूटी हुई चूड़ी उसकी हथेली पर रखी "यह तुम्हारी माँ की है। उन्होंने अपनी जान देकर तुम्हें बचाया, पर वह तांत्रिक का शिकार हो गईं।" चूड़ी पर लगा रक्त अभी तक ताजा था, मानो क्षण भर पहले ही टूटी हो।  
  
उसी रात, प्रीति ने चूड़ी को गंगा में अर्पित करने का निश्चय किया। जैसे ही उसने चूड़ी जल में छोड़ी, एक सफ़ेद साड़ी में लिपटा हाथ उसे खींचने लगा। "बेटी... मैं तुम्हारी माँ हूँ," आवाज़ ने कहा। प्रीति ने देखा—जल में उसकी माँ का चेहरा तैर रहा था, जिसकी आँखों से रक्त के आँसू बह रहे थे। "तांत्रिक ने मुझे अपने काले मंत्र से बाँध रखा है। अमन को बचाने के लिए काल भैरव की गुफा में जाओ... अपने रक्त से उनकी मूर्ति को स्नान कराओ। नहीं तो पूर्णिमा की रात, अमन की आत्मा सदा के लिए अंधेरे में खो जाएगी!" माँ की आत्मा चीख़ती हुई जल में विलीन हो गई, और प्रीति के हाथ में चूड़ी का टुकड़ा जलने लगा।  
  
अगले दिन, अंधेरी रात में प्रीति काल भैरव की गुफा के सामने खड़ी थी। गुफा के प्रवेश द्वार पर खंजर से उकेरी गई मानव आकृतियाँ चीख़ती प्रतीत होती थीं। भीतर जाते ही उसे लगा जैसे कोई उसकी साँसें चुरा रहा है। गुफा की दीवारों पर जलते दीपकों की रोशनी में भैरव की मूर्ति विकराल लग रही थी। प्रीति ने अपनी कलाई काटी और रक्त की धारा मूर्ति पर बहा दी—"हे भैरव! यह रक्त मेरे प्रेम की पवित्रता का प्रतीक है। अमन को उस नरक से मुक्त करो!" 

तभी गुफा की छत से एक विशालकाय चमगादड़ नीचे गिरा। उसकी आँखें लाल थीं, और मुँह से निकलती आग ने प्रीति के चुनरी को झुलसा दिया। चमगादड़ ने मानव आवाज़ में गरजकर कहा— "तुम्हारा रक्त व्यर्थ जाएगा! तांत्रिक ने अमन की नसों में जहर भर दिया है। उसकी आत्मा अब मेरी मुट्ठी में है!" प्रीति ने रुद्राक्ष उठाया और चमगादड़ के सीने पर दे मारा। एक विस्फोट हुआ, और गुफा में धुआँ भर गया। जब धुआँ छंटा, तो भैरव की मूर्ति से रक्त की धारा बह रही थी—संकेत कि उसकी पुकार सुनी गई।  

पूर्णिमा की रात, गंगा किनारे प्रीति खड़ी थी। अचानक, अमन की नाव घाट से टकराई। पर उसकी आँखों में जीवन नहीं, मृत्यु का नीलापन था। "मैं तुम्हें लेने आया हूँ... गंगा की गहराइयों में," अमन के मुँह से तांत्रिक की आवाज़ निकली। प्रीति ने रुद्राक्ष को उसके माथे पर दे मारा। एक चीख़ के साथ अमन का शरीर गिरा, और काला धुआँ उड़कर गंगा में समा गया।  

थोड़ी देर बाद असली अमन, जर्जर और क्षीण, घाट पर आया। "तुम्हारे रक्त ने मुझे उस लोक से वापस खींच लिया," उसने कहा। प्रीति ने उसके हाथ में टूटी चूड़ी रख दी—"यह हमारे प्रेम की जीत है।"
  
आज भी अस्सी घाट पर प्रीति और अमन गंगा आरती में शामिल होते हैं। कहते हैं, रात के समय जब कोई नाविक रास्ता भटक जाता है, तो एक सफ़ेद साड़ी पहनी स्त्री की छाया उसे रोशनी दिखाती है। पर प्रीति जानती है—यह उसकी माँ का आशीर्वाद है, जो गंगा की लहरों में सदैव जीवित है। और जब कभी गंगा की लहरें रुद्राक्ष को छूती हैं, तो वह मणि फिर से चमक उठती है... प्रेम की अमरता का प्रतीक।  


- श्री भारमल गर्ग "विलक्षण"
सांचौर (राजस्थान) ३४३०४१

गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

प्रेम-पत्र: प्रलय-काल में लिखा गया एक अमर ग्रन्थ

प्रियतमे महादेवी,  


यह पत्र नहीं, एक यज्ञ है — जिसकी आहुतियाँ मेरी अस्थियों से लिखे गए मंत्र हैं। तुम्हारे वियोग ने मुझे उस मौन ऋषि की भाँति बना दिया है, जो प्राण त्यागने से पहले वेदों के गूढ़ रहस्यों को शिलाओं पर उत्कीर्ण करता है। तुम्हारी स्मृति के अक्षर मेरे हृदय की शिला पर इतने गहरे खुदे हैं कि समय की धार भी उन्हें मिटा नहीं सकती।  


तुम्हारा अभाव मेरे लिए वह प्रथम सूक्ति है, जिसे ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में रचा था। जब श्यामल वन में कोयल अपनी तान छेड़ती है, तब मेरे कंठ से तुम्हारे नाम का उच्चार टूट जाता है। क्या तुम जानती हो? तुम्हारी अनुपस्थिति में यह शरीर उस वीणा के समान है, जिसके तारों को कोई संगीतकार नहीं छेड़ता। मेरे शास्त्रों के पन्ने अब तुम्हारी याद के बिना उन नक्षत्रों-सी लगते हैं, जिन्होंने अपना प्रकाश खो दिया हो।  


तुम्हारे सान्निध्य की वह घड़ियाँ, जब हम न्यायशास्त्र पर वाद-विवाद करते हुए अचानक किसी कविता की पंक्ति में खो जाते थे — क्या वे केवल स्वप्न थे? आज तुम्हारे वियोग में मेरी बुद्धि उस चक्रवात की तरह है, जो स्वयं को ही निगल जाने को आतुर है। तुम्हारी विदग्धता मेरे लिए गार्गी के प्रश्नों-सी थी, जो मोक्ष के द्वार तक ले जाती थी। अब यह विरह मुझे कपिल मुनि के सांख्य सिद्धांतों से भी अधिक जटिल लगता है।  


प्रिये, जब अरुणोदय होता है, तब मेरी छाया तुम्हारे नाम को धरती पर लिखती है। रात्रि में चन्द्रमा तुम्हारे मुख की कांति चुराकर मुझे धोखा देता है। तुम्हारी स्मृतियों का प्रत्येक क्षण उस अग्निष्टोम यज्ञ की भाँति है, जिसमें मैं स्वयं को बार-बार होम कर देता हूँ। क्या यही है प्रेम की नियति? जिसने ऋग्वेद के ऋचाओं को जन्म दिया, वही प्रेम आज मेरे लिए अथर्ववेद के मृत्युंजय मंत्र बन गया है।  


महादेवी, यदि तुम इस पत्र को पढ़ रही हो, तो समझ लो — ये शब्द नहीं, मेरे हृदय के तड़पते हुए तंतु हैं। हमारा मिलन उस उषाकाल की प्रतीक्षा में है, जब सूर्य और चन्द्रमा एक ही क्षितिज पर मिलेंगे। तब तक, मेरी प्रतीक्षा उस अश्वत्थ वृक्ष की भाँति अडिग रहेगी, जिसकी जड़ें पाताल तक पहुँची हुई हैं।  


तुम्हारा,  

वेद-वेदान्त में तुम्हें खोजता तपस्वी  

- भारमल गर्ग "विलक्षण" 

- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

शोध-प्रबन्ध : कामसूत्र के पृष्ठों में अंकित यौवन-सृजन -पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

(एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से) मैं नहीं, कोई वात्स्यायन बैठा है इस लेखनी के पार, शास्त्र के श्लोकों में टटोल रहा, रति-रहस्य का सार। यह यौवन न...