शुक्रवार, 18 अप्रैल 2025

विरह की पतझड़ी गीत

पतझड़ की नीरवता में, प्राण तरस उठे सुख के लिए,  
शुष्क पत्र-सा मन मेरा, क्षण-क्षण बिखरता विषाद।  
कहाँ गया वह मम सखा? छोड़ गया यह तिमिर घनघोर,  
हर श्वास में वेदना है, हर पल बढ़ती मलिन छाया भोर।  
 
शीतल समीर सरसराती, पर अंतर ज्वाला सी धधके,  
भग्न स्मृतियों के खंडित अंश, अब कैसे सँवरें सधे?  
वे क्षण जो साथ बीते थे, स्मृतिपटल पर अंकित रहे,  
अब शेष रह गई है केवल, निर्झर-सी अविरल पीर बहे। 

सावन की स्मृति दिखलाते, ये पत्रों के शुष्क वर्ण अब,  
न वर्षा का मधुर स्वर है, न प्रेम-तानों का संग रब।  
धूमिल रवि छिपा अंबर में, घनघोर मेघों की छाया सी,  
ज्यों वह मेरा प्राणनाथ, लीन हुआ किसी गुप्त नगरी।  

वृक्षों की शाखाएँ रिक्त, कोकिल का कलरव भी लुप्त,  
मेरे गीतों में अब केवल, विरह-स्वर शून्यता में डूबे।  
निशा का आवरण ओढ़कर, तारे भी रोते सकुचाए,  
ज्यों मेरे नयनों से अश्रुधार, बहती निरंतर बन जाए।  

मार्ग में गिरे पलाश के, पुष्प सिसक उठे मौन स्वर में,  
मेरे अंतर के क्षतों को, ये दृश्य और भी खोलते।  
जब साथ हँसते थे हम दोनों, वे पंथ अब सूने सभी,  
अब तो बस प्रतीक्षा है, उस मुखचंद्र की छवि ध्यान में।  

शीतल चंद्रिका निशा में, शीतल छाया-सी लगती है,  
वे दिवस कहाँ विलीन हुए, जब उसकी बाँहों में जगती।  
अब तो स्वप्नों में भी वह, धूमिल-सा दिखलाता है,  
ज्यों पतझड़ का पर्ण समीर के संग लुप्त हो जाता है।  

क्या यह ऋतु का विधान है? प्रेम भी कुम्हलाएगा क्या?  
ज्यों ये पत्र झरते सब, वह भी मुझे विसराएगा क्या?  
किंतु नहीं, मम आशा है, वसंत पुनः आएगा,  
विरह के इन क्षणों का दाह, प्रेम की छाया में मिट जाएगा।  

हे प्रभो! यह पतझड़ टले, उसके संग फिर मिलन हो,  
मेरे अधूरे गानों का, कोई मधुर समापन हो।  
जब तक वह नहीं आता, यह हृदय सिसकता रहेगा,  
पतझड़-सा मेरा मन, झर-झर कर विलीन होता रहेगा।  


• भारमल गर्ग "विलक्षण"
• सांचौर राजस्थान (३४३०४१)


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