प्रिय महादेवी,
मणिकर्णिका के उस पावन घाट पर, जहाँ गंगा की लहरें हमारे मौन को समझती थीं, आज वही निर्झर मेरे नेत्रों की नमी को अपने अधरों में समेट रहा है। तुम्हारे बिना यह काशी, जो कभी हमारे मिलन का साक्षी था, अब एक सूनी गुफा-सी प्रतीत होती है। प्राणों में बसी तुम्हारी छवि आज भी उसी प्रथम दृष्टि की भाँति अमिट है, जब तुमने घाट की रेत पर चंचल चरण रखे थे और हम दोनों ने स्वयं को विधाता के अक्षय वरदान की संज्ञा दी थी। क्या तुम्हें स्मरण है? उस क्षण हमने प्रतिज्ञा की थी कि इसी घाट की रज में, इसी गंगा की गोद में, हमारे प्राणों का अंतिम संगम भी होगा। परंतु हे प्रिये, आज वह प्रतिज्ञा कहाँ विलीन हो गई?
तुम्हारा उज्जैन चले जाना मेरे लिए वह दुःस्वप्न बन गया है, जिससे जागने का साहस नहीं होता। क्या प्रेम की यह अग्नि केवल एक तन की सीमा तक सिमटकर रह जाती है? जब तुमने कहा था, "हम दोनों इस घाट के दीपक की भाँति हैं, जो एक ही लौ से जलेंगे," तब क्यों नहीं समझा कि यह लौ इतनी क्षणभंगुर होगी? आज उज्जैन की धरा तुम्हें थामे है, और मैं इस घाट की शिला पर बैठा, तुम्हारे नाम का जाप करता हूँ। प्रत्येक आरती के समय, जब घंटियों की ध्वनि गूँजती है, मुझे तुम्हारी मधुर मुस्कान सुनाई देती है—पर वह केवल भ्रम होता है।
हे महादेवी! क्या तुम्हारा हृदय अब उस मणिकर्णिका की स्मृतियों से विमुख हो गया है? जिस प्रकार यमुना के बिना यमुनोत्री व्यर्थ है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा यह जीवन भी निरर्थक प्रतीत होता है। तुमने कहा था ना—"प्रेम वह सरिता है जो मृत्यु के सागर में भी अमर रहती है," पर आज तुम स्वयं उस प्रवाह को बीच में ही छोड़कर चली गईं। क्या विरह की यह वेदना हमारे प्रेम की परीक्षा थी? यदि हाँ, तो मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं असफल हो गया... क्योंकि तुम्हारे बिना हर पल एक युग बन जाता है।
अंतिम बार याद करो वह क्षण, जब हमने गंगा की लहरों से वचन लिया था। आज भी मेरी आत्मा उसी संकल्प पर अटल है। पर हे प्रियतमे, यदि तुम्हारी पथरीली चुप्पी ने इस प्रेम को पराजित कर दिया है, तो मुझे क्षमा करना—मैं तुम्हें विवश नहीं करूँगा। केवल इतना जान लो कि जिस दिन इस घाट की राख में मेरा शरीर विलीन होगा, उस दिन भी मेरी अंतिम आकांक्षा तुम्हारे चरणचिह्नों का स्पर्श ही होगी।
तुम्हारा ही पंडित
- भारमल गर्ग "विलक्षण"

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