काशी की संध्या जब गंगा के जल में डूबती, तो अस्सी घाट की सीढ़ियाँ रहस्यों के साथ फुसफुसातीं। प्रीति की आँखें उस कोहरे को भेद रही थीं, जो अचानक लहरों से उठकर आकाश को घेरने लगा। हवा में तुलसी और धूप की सुगंध के बीच एक तीखी लौह-गंध घुली हुई थी। दूर, मणिकर्णिका घाट की ओर से एक टूटी नाव का साया धीरे-धीरे बढ़ रहा था—खाली, पर भारी। प्रीति के गले का रुद्राक्ष अचानक झनझनाया। वही रुद्राक्ष, जिसे अमन ने जाते समय दिया था, उसकी डोरी पर लिखा था—"जिस दिन इसकी एक मणि टूटे, समझ लेना... मैं यमराज से जूझ रहा हूँ।"
गंगा के किनारे बिखरी मंत्रों की गूँज और घाटों पर जलते दीयों की रोशनी के बीच प्रीति ने महसूस किया—कोई उसकी निःश्वासों में समाया है। जैसे ही उसने कदम बढ़ाए, पानी में उसकी परछाई ने अमन का रूप धर लिया। पर वह छवि अचानक विकृत होकर काली धुंध में तब्दील हो गई। धुएँ से दो लाल आँखें चमकीं—"तुम्हारा प्यार उसकी आत्मा को नर्क की अग्नि में झोंक देगा!" प्रीति की चीख़ गंगा की लहरों में दब गई। जब उसने आँखें खोलीं, तो रुद्राक्ष की एक मणि टूटकर जल में समा चुकी थी। गंगा का जल अचानक रक्तिम हो उठा, मानो कोई अदृश्य शक्ति उसे चेतावनी दे रही हो।
तभी, पीछे से एक खोखली आवाज़ गूँजी—"प्रीति... मैं तुम्हारे पास हूँ।" वह आवाज़ श्मशान की ओर से आ रही थी। प्रीति ने पलटकर देखा—एक कबंध (सिरविहीन देह) हाथ में जलती मशाल लिए खड़ा था! उसकी गर्दन से कीचड़ टपक रहा था। कबंध ने अचानक अपना सिर उठाया—वह अमन का चेहरा था, पर आँखों के स्थान पर कीड़े रेंग रहे थे। *"मुझे बचा लो... वे मुझे जिंदा जला रहे हैं!"* प्रीति के पैर जमीन में धँस गए। तभी गंगा की एक उछली हुई लहर ने कबंध को निगल लिया। प्रीति के हाथ में रुद्राक्ष की दूसरी मणि से खून टपकने लगा।
प्रीति सीढ़ियों से भागकर संकट मोचन मंदिर पहुँची। मंदिर के द्वार पर खड़े वृद्ध पुजारी ने उसे रोक लिया—"बेटी, तुम्हारे प्रेमी पर काली माता का शाप है। जिस तांत्रिक ने तुम्हारे पिता को मारकर उनकी अस्थियाँ गंगा में बहाईं, वही अब अमन की आत्मा पर कब्ज़ा करना चाहता है।" पुजारी ने एक टूटी हुई चूड़ी उसकी हथेली पर रखी "यह तुम्हारी माँ की है। उन्होंने अपनी जान देकर तुम्हें बचाया, पर वह तांत्रिक का शिकार हो गईं।" चूड़ी पर लगा रक्त अभी तक ताजा था, मानो क्षण भर पहले ही टूटी हो।
उसी रात, प्रीति ने चूड़ी को गंगा में अर्पित करने का निश्चय किया। जैसे ही उसने चूड़ी जल में छोड़ी, एक सफ़ेद साड़ी में लिपटा हाथ उसे खींचने लगा। "बेटी... मैं तुम्हारी माँ हूँ," आवाज़ ने कहा। प्रीति ने देखा—जल में उसकी माँ का चेहरा तैर रहा था, जिसकी आँखों से रक्त के आँसू बह रहे थे। "तांत्रिक ने मुझे अपने काले मंत्र से बाँध रखा है। अमन को बचाने के लिए काल भैरव की गुफा में जाओ... अपने रक्त से उनकी मूर्ति को स्नान कराओ। नहीं तो पूर्णिमा की रात, अमन की आत्मा सदा के लिए अंधेरे में खो जाएगी!" माँ की आत्मा चीख़ती हुई जल में विलीन हो गई, और प्रीति के हाथ में चूड़ी का टुकड़ा जलने लगा।
अगले दिन, अंधेरी रात में प्रीति काल भैरव की गुफा के सामने खड़ी थी। गुफा के प्रवेश द्वार पर खंजर से उकेरी गई मानव आकृतियाँ चीख़ती प्रतीत होती थीं। भीतर जाते ही उसे लगा जैसे कोई उसकी साँसें चुरा रहा है। गुफा की दीवारों पर जलते दीपकों की रोशनी में भैरव की मूर्ति विकराल लग रही थी। प्रीति ने अपनी कलाई काटी और रक्त की धारा मूर्ति पर बहा दी—"हे भैरव! यह रक्त मेरे प्रेम की पवित्रता का प्रतीक है। अमन को उस नरक से मुक्त करो!"
तभी गुफा की छत से एक विशालकाय चमगादड़ नीचे गिरा। उसकी आँखें लाल थीं, और मुँह से निकलती आग ने प्रीति के चुनरी को झुलसा दिया। चमगादड़ ने मानव आवाज़ में गरजकर कहा— "तुम्हारा रक्त व्यर्थ जाएगा! तांत्रिक ने अमन की नसों में जहर भर दिया है। उसकी आत्मा अब मेरी मुट्ठी में है!" प्रीति ने रुद्राक्ष उठाया और चमगादड़ के सीने पर दे मारा। एक विस्फोट हुआ, और गुफा में धुआँ भर गया। जब धुआँ छंटा, तो भैरव की मूर्ति से रक्त की धारा बह रही थी—संकेत कि उसकी पुकार सुनी गई।
पूर्णिमा की रात, गंगा किनारे प्रीति खड़ी थी। अचानक, अमन की नाव घाट से टकराई। पर उसकी आँखों में जीवन नहीं, मृत्यु का नीलापन था। "मैं तुम्हें लेने आया हूँ... गंगा की गहराइयों में," अमन के मुँह से तांत्रिक की आवाज़ निकली। प्रीति ने रुद्राक्ष को उसके माथे पर दे मारा। एक चीख़ के साथ अमन का शरीर गिरा, और काला धुआँ उड़कर गंगा में समा गया।
थोड़ी देर बाद असली अमन, जर्जर और क्षीण, घाट पर आया। "तुम्हारे रक्त ने मुझे उस लोक से वापस खींच लिया," उसने कहा। प्रीति ने उसके हाथ में टूटी चूड़ी रख दी—"यह हमारे प्रेम की जीत है।"
आज भी अस्सी घाट पर प्रीति और अमन गंगा आरती में शामिल होते हैं। कहते हैं, रात के समय जब कोई नाविक रास्ता भटक जाता है, तो एक सफ़ेद साड़ी पहनी स्त्री की छाया उसे रोशनी दिखाती है। पर प्रीति जानती है—यह उसकी माँ का आशीर्वाद है, जो गंगा की लहरों में सदैव जीवित है। और जब कभी गंगा की लहरें रुद्राक्ष को छूती हैं, तो वह मणि फिर से चमक उठती है... प्रेम की अमरता का प्रतीक।
- श्री भारमल गर्ग "विलक्षण"
सांचौर (राजस्थान) ३४३०४१

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें