प्रिय जसराज,
गंगा की लहरों ने जिस दिन हमारी मौन भाषा सुनी थी, वह स्मृति अब मेरे हृदय में एक जलती हुई दीपशिखा बन गई है। आज जब यह पत्र लिख रही हूँ, तो कलम के स्याही में मेरे अश्रुओं का मिश्रण है। मेरा विवाह तय हो चुका है... यह वाक्य लिखते हुए हर अक्षर मेरे सीने पर सुई-सी चुभता है। पर मैं क्या करूँ? समाज की वह जंजीरें, जो हमें जन्म के नाम पर अलग कर देती हैं, उन्हें तोड़ने का साहस मेरे भीतर नहीं।
तुम्हें याद होगा, केशव कुंज के उस आम्रवृक्ष के नीचे, जहाँ तुम्हारे वेदांत आश्रम की पुस्तकों की सुगंध और मेरी चूड़ियों की खनक मिल जाती थी। उस दिन जब मैंने तुम्हें अपने हृदय की बात बताई, तब तक मेरे पिता ने मिथिलांचल के एक परिचित कुल में मेरा हाथ सुंदर कर दिया था। काश! मैं उस संध्या को फिर से जी सकती, जब तुम्हारी आँखों में झांककर मैंने पहली बार "प्रेम" शब्द का अर्थ समझा था। पर अब तो मैं यहाँ मिथिला की माटी में उस पौधे-सी हूँ, जिसकी जड़ें काशी की गंगा-तट की स्मृतियों से कट चुकी हैं।
जसराज, मैं तुम्हें दोष नहीं देती। न तुम्हें, न इस समाज को। यह तो हमारे भाग्य का लेख है कि वैश्य कन्या और ब्राह्मण युवक की प्रेमकथा केवल विरह के गीतों तक सीमित रहे। मेरी डोली जब उठेगी, तो मेरे साथ तुम्हारे वे पत्र और वह सूखा गुलाब भी जाएगा, जो तुमने उस बसंत में मेरे केशों में सजाया था। मुझे डर है कि कहीं मिथिला की नई हवाएँ इन यादों की खुशबू को न बिखेर दें...
तुम्हारे लिए मेरा प्रेम गंगा के अविरल प्रवाह-सा है। चाहे मेरा शरीर किसी और के नाम हो जाए, पर मेरी आत्मा तुम्हारे नाम की ज्योति बनकर जलती रहेगी। यदि कभी तुम्हारे आश्रम से गंगा की लहरें मिथिला तक आएँ, तो उन्हें मेरी विदाई का संदेश समझना।
तुम्हारी,
महादेवी
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दूसरा पत्र: पंडित जसराज का महादेवी के नाम
प्रिय महादेवी,
तुम्हारा पत्र पाकर मेरे हाथों ने जिस शांति से उसे छुआ, वही शांति अब मेरे मन में उथल-पुथल का कारण बन गई है। गंगा तट पर बैठकर यह पत्र लिख रहा हूँ, जहाँ तुम्हारी अनुपस्थिति में हर लहर तुम्हारा नाम पुकारती प्रतीत होती है। तुम्हारे विवाह का समाचार सुनकर मेरे हृदय ने जिस निर्वेद को जन्म दिया, वह वेदांत के उस सत्य की याद दिलाता है—"सब कुछ अनित्य है, केवल प्रेम की छाया शाश्वत।"
तुम्हारा निर्णय सही है, महादेवी। समाज की प्रथाएँ हमारे लिए अदृश्य दीवारें खड़ी कर देती हैं, जिन्हें तोड़ने का प्रयास करना हमारे प्रेम को और अधिक रक्तरंजित कर देगा। तुम्हारे परिवार का आदर करो, क्योंकि उनकी नियति भी हमारी भाँति इसी चक्रव्यूह में बंधी है। मिथिला की पावन भूमि में तुम्हारा नया जीवन ऐसा खिले, जैसे यमुना तट पर खिला कोई नवीन कमल। मैं तुम्हारे सुख की कामना में अपने दुख का दीपक जलाऊँगा।
याद करो वह शाम, जब तुमने कहा था—"प्रेम की कोई जाति नहीं होती।" आज वही प्रेम हमें सिखा रहा है कि कभी-कभी त्याग में ही प्रेम की सच्ची परिभाषा छिपी होती है। मेरे वेदांत ने मुझे यही पाठ पढ़ाया है। तुम्हारे विवाह के दिन मैं अपने आश्रम के मंदिर में तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा। मेरे प्राणों का हर श्वास तुम्हारे नाम का जाप बनेगा।
विदा।
तुम्हारा अक्षय प्रेमी
जसराज
- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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