प्रियतमे महादेवी,
यह पत्र नहीं, एक यज्ञ है — जिसकी आहुतियाँ मेरी अस्थियों से लिखे गए मंत्र हैं। तुम्हारे वियोग ने मुझे उस मौन ऋषि की भाँति बना दिया है, जो प्राण त्यागने से पहले वेदों के गूढ़ रहस्यों को शिलाओं पर उत्कीर्ण करता है। तुम्हारी स्मृति के अक्षर मेरे हृदय की शिला पर इतने गहरे खुदे हैं कि समय की धार भी उन्हें मिटा नहीं सकती।
तुम्हारा अभाव मेरे लिए वह प्रथम सूक्ति है, जिसे ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में रचा था। जब श्यामल वन में कोयल अपनी तान छेड़ती है, तब मेरे कंठ से तुम्हारे नाम का उच्चार टूट जाता है। क्या तुम जानती हो? तुम्हारी अनुपस्थिति में यह शरीर उस वीणा के समान है, जिसके तारों को कोई संगीतकार नहीं छेड़ता। मेरे शास्त्रों के पन्ने अब तुम्हारी याद के बिना उन नक्षत्रों-सी लगते हैं, जिन्होंने अपना प्रकाश खो दिया हो।
तुम्हारे सान्निध्य की वह घड़ियाँ, जब हम न्यायशास्त्र पर वाद-विवाद करते हुए अचानक किसी कविता की पंक्ति में खो जाते थे — क्या वे केवल स्वप्न थे? आज तुम्हारे वियोग में मेरी बुद्धि उस चक्रवात की तरह है, जो स्वयं को ही निगल जाने को आतुर है। तुम्हारी विदग्धता मेरे लिए गार्गी के प्रश्नों-सी थी, जो मोक्ष के द्वार तक ले जाती थी। अब यह विरह मुझे कपिल मुनि के सांख्य सिद्धांतों से भी अधिक जटिल लगता है।
प्रिये, जब अरुणोदय होता है, तब मेरी छाया तुम्हारे नाम को धरती पर लिखती है। रात्रि में चन्द्रमा तुम्हारे मुख की कांति चुराकर मुझे धोखा देता है। तुम्हारी स्मृतियों का प्रत्येक क्षण उस अग्निष्टोम यज्ञ की भाँति है, जिसमें मैं स्वयं को बार-बार होम कर देता हूँ। क्या यही है प्रेम की नियति? जिसने ऋग्वेद के ऋचाओं को जन्म दिया, वही प्रेम आज मेरे लिए अथर्ववेद के मृत्युंजय मंत्र बन गया है।
महादेवी, यदि तुम इस पत्र को पढ़ रही हो, तो समझ लो — ये शब्द नहीं, मेरे हृदय के तड़पते हुए तंतु हैं। हमारा मिलन उस उषाकाल की प्रतीक्षा में है, जब सूर्य और चन्द्रमा एक ही क्षितिज पर मिलेंगे। तब तक, मेरी प्रतीक्षा उस अश्वत्थ वृक्ष की भाँति अडिग रहेगी, जिसकी जड़ें पाताल तक पहुँची हुई हैं।
तुम्हारा,
वेद-वेदान्त में तुम्हें खोजता तपस्वी
- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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