शिवम के हाथों में मिट्टी की खुशबू और फूलों का स्पर्श था, पर मीरा की यादें अब उसकी हथेलियों में काँटों की तरह चुभतीं। पारिजात के वृक्ष के नीचे बैठकर वह उन सुबहों को याद करता, जब मीरा की चुनरी हवा में लहराती और फूलों की डालियाँ उसके लिए झुक जाती थीं। अब वही डालियाँ सूनी थीं, और हर पत्ते पर मीरा का नाम लिखा प्रतीत होता था।
जिस दिन मीरा ने कहा, "मेरे पिता ने मेरा रिश्ता दूर देश के एक परदेसी से तय कर दिया," शिवम ने उसकी आँखों में डूबते सूरज को देखा। वह जानता था—पारिजात का फूल देवताओं के लिए होता है, मृत्युलोक की प्रेमकथाएँ उसकी पंखुड़ियों पर नहीं टिकतीं। फिर भी, उसने मीरा की चूड़ियों की खनक को अपनी धड़कनों में बाँध लिया था।
मीरा के जाने के बाद, शिवम ने उद्यान की हर क्यारी में बबूल और नागफनी के बीज बोए। लोगों ने पूछा, "इन काँटों से क्या मिलेगा?" शिवम मुस्कुराया, "फूल तो बिछड़न की रात में ही मुरझा गए। अब सिर्फ़ यही बचा है—जलन, जो हर साँस में उगेगी।"
एक साल बाद, जब मीरा का पहला पत्र आया, उसमें लिखा था— "वहाँ के बाग़ में पारिजात नहीं होते।" शिवम ने पत्र को काँटों से छेद दिया और उद्यान के कुएँ में फेंक दिया। उस दिन से, कुएँ का पानी कड़वा हो गया। कहते हैं, अब भी वह उद्यान फूल नहीं, केवल विरह की राख उगलता है। और रात में जब पारिजात की छाया टूटती है, तो शिवम की आँखों से कोई टूटा हुआ सपना बह जाता है।
सारांश: प्रेम की सुगंध और विरह की चुभन एक ही डाली पर खिलते हैं। शिवम का उद्यान अब उसकी भाषा है—जहाँ हर काँटा मीरा के बिना जीने का एक वाक्य है।
- भारमल गर्ग "विलक्षण"

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