तुम्हारा मौन शिला बन, अरुणाचल-शिखर ज्यों तपे,
मेरी वाणी नदी बही, शिला में लीन सागर समापे।
तुम नभ के दीपक जले, वेदों के मंत्र-सी ज्वाला,
मेरी पृथ्वी तलाशती, तुम्हारे प्रकाश की माला।
तुम्हारे स्पर्श वसंत बन, खिले अशोक के पुष्प भारी,
मेरे विरह की शरद रात, पत्तों की चिता जलाती भारी।
धुआँ बनकर उड़ती हूँ मैं, तुम तक पहुँचे यही आस,
वटवृक्ष की छाया तुम, मैं जड़ों में बँधी वसुधा-प्यास।
प्रेम नहीं यह ब्रह्म का, स्वयं से संवाद है गूढ़ा,
तुम पृथ्वी, मैं नभ हूँ—यह परछाईयों का दुःख-सा ठूँडा।
- भारमल गर्ग "विलक्षण"

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