शनिवार, 10 जनवरी 2026

शोध-प्रबन्ध : कामसूत्र के पृष्ठों में अंकित यौवन-सृजन -पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

(एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से)

मैं नहीं, कोई वात्स्यायन बैठा है इस लेखनी के पार,
शास्त्र के श्लोकों में टटोल रहा, रति-रहस्य का सार।
यह यौवन नहीं, कोई शास्त्र है सजीव, सुकोमल, ग्रन्थ,
जिसमें अंग-अंग रचता है काम का विशुद्ध, मनोहर अनुबन्ध।

प्रस्तावना : वसन्तागम
जब वसन्त आता है, मदन की पुष्पमयी वाणी खिलती,
तब यौवन की लिपि लिखती है देह पर सुन्दरता की रीति।
यह शरीर नहीं, भूमि है जहाँ खेलता है कला-कौशल,
हर स्पर्श, हर मुद्रा में छुपा है शास्त्र का अटल स्मृति-फल।

शीर्षक : केश-बन्ध विधान
ये केश नहीं, हैं मदन के धनुष की कोमल डोरियाँ,
जिन्हें बाँधती है नारी, विविध बन्धों में सजी सजियाँ।
एक केश-पाश में बँध जाता है सम्पूर्ण मन का मान,
शिखण्डी बन्ध, वेणी-सौन्दर्य, है कामकला का प्रमाण।

नेत्र-विज्ञान : दृष्टि-विजय
ये नेत्र नहीं, विजय-पत्र हैं कामदेव के अस्त्र समान,
जिनकी चंचल चपलता में है वशीकरण का ज्ञान।
ईशान, अग्नेय, वायव्य दृष्टि, शास्त्र ने गिनाया है,
एक टकटकी में ही तो मन का किला फतह कराया है।

मुख-मण्डल : सम्भोग-सूत्र
अधरों का यह आलिंगन, दन्तों की यह मन्द कुरङ्कश,
कामसूत्र के अध्याय में है 'चुम्बन-विचित्र' परिचय विशेष।
ऊर्ध्वाधर, निरुद्ध, संघृष्ट, तिलतण्डुल की रचना है,
हर चुम्बन श्लोक बन जाता, जब अधरों की कला रचना है।

कण्ठ-ग्रीवा : आलिङ्गन-कला
यह कण्ठ नहीं, सन्धि है जहाँ मिलते हैं आलिङ्गन चारों,
झूलते हैं लतावेष्टन, उरुजघन, ताड़ित के भेद विस्तारों।
ग्रीवा की इस वक्रता में छुपा है लालित्य का गणित,
जिसका प्रत्येक कोण बताता आसन्न सुरत का समय सुयोग्य।

स्तन-युगल : पीड़न-मर्दन
उन्नत युगल, श्वेत, कठिन, मानो कामशास्त्र के ग्रन्थ दो,
जिन पर लिखी है मर्दन, पीड़न, घर्षण की रीति अनन्त।
अंगुलियों के चिह्न, नखक्षत, बनते हैं श्लोक नूतन,
सृजन का यह भूगोल रचता प्रेम का नक्शा अभिनव।

कर-कमल : नख-दन्त-लेख
ये हाथ नहीं, लेखनी हैं जो लिखतीं देह पर भाव,
नख-दन्त-चिह्नों से रचतीं प्रेम का अक्षर-संग्राम।
दशन-च्छद, अर्धचन्द्र, कोकिल, श्वेत-हंस के रूप सजते,
जब काम-कला की वर्णमाला देह पर विहँसती है।

मध्य-देश : त्रिवली-रहस्य
नाभि-गर्त, कटि-सौष्ठव, उदर-पटल की कोमल रेख,
त्रिवली में लिपटा है सम्पूर्ण रस-विज्ञान का विशेष।
यह मध्य है मेरुदण्ड, जहाँ टिकी है आसनों की रचना,
सम्मीलित, उत्थित, परिवर्तित, स्थितियों की अद्भुत सृजना।

जघन-स्थल : उरु-युग्म-विधान
जघन स्थल, उरु-युग्म, शंखिनी, चित्रिनी का प्रभेद गूढ़,
शास्त्र यहाँ बतलाता है सौन्दर्य का मापदण्ड सुघड़।
उरुओं की गोलाई में समाया है आसनों का बल,
हर मुद्रा में खुलता है सुरत-साधना का नवीन प्रबन्ध-पल।

पाद-तल : सम्पुट-सन्धान
और यह पाद-तल, कोमल, रक्तिम, नूपुर-मण्डित, सुसज्जित,
जो सम्पुटित होते हैं रति में, बनते सन्धान विविध।
पादाघात, पद-प्रहार की कला भी है शास्त्र-सम्मत,
सौन्दर्य का सम्पूर्ण चक्र यहाँ होता है परिपूर्ण सम्पन्न।

श्वास-ताल : लय-साधना
श्वास की यह लय, यह ताल, मद-मन्द हुँकार का स्वर,
शास्त्र में है 'कितव-वाक्य' के रूप में वर्णित विस्तर।
निश्वासों में गूँजते मदन के मन्त्र अनाहत,
शरीर-वाद्य बज उठता है रति-राग में डूबा हुआ।

उपसंहार : शास्त्र-सार
तो यह यौवन नहीं, एक सजीव, स्पन्दनशील कामशास्त्र है,
हर अंग में छिपा वात्स्यायन का कालजयी विश्वास है।
सुंदरता यहाँ केवल आकृति नहीं, सम्पूर्ण क्रिया-विधान है,
सृजन वह जो देह को बनाता कला, तन्त्र, ज्ञान महान है।

सौंदर्यशास्त्र यह, जहाँ प्रत्येक स्पर्श है एक पाठ,
प्रत्येक मुद्रा में छुपा है शास्त्रार्थ का अनोखा प्रपाठ।
कामसूत्र तो ग्रन्थ नहीं, यौवन की इस देह में बसता है,
शोधार्थी जब पढ़ता है इसे, तब जाकर सही अर्थ खुलता है।

शोध-निष्कर्ष :
अतः यह सुंदरता नहीं, मानव-शरीर का काम-दर्शन है,
एक पवित्र साधना, जहाँ प्रेम ही परम ब्रह्मासन है।
कामदेव नहीं, वह कला है जो सृजन को सिखाती है,
यौवन की यह लिपि हर पल नवीन अध्याय रच जाती है॥

- पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"
- शारदे सदन चौरा, सांचौर 343041

रविवार, 30 नवंबर 2025

नैणां बहगी नदियां

ओ जी... म्हारो हिवड़ो नदी रो घाट, साहिबा बेगा आवो नी।
म्हारो हिवड़ो नदी रो घाट...
नैणां सू बहगी नदियां, पल-पल जोवे बाट,
साहिबा बेगा आवो नी...

ज्यूं नदियां रा दोय किनारा, संग-संग चाल्या जावे,
पण जनम-जनम री दूरी बालम, मिलण कदे नी पावे।
थे ऊभा उस पार साजना... 
मैं बैठी आ घाट,
साहिबा बेगा आवो नी...

पहली प्रीत घणी ही मीठी, मिसरी ज्यूं घुल जाती,
अब बिछड़न में खारी लाग्गै, ज्यूं लूणी री माटी।
म्हारा आं सूड़ा रो नीर साजना... 
हो ग्यो खरो खाट,
साहिबा बेगा आवो नी...

नदी रमे बस सागर तानी, और न दूजी चाह,
म्हारो सागर थे ही प्रीतम, थे ही म्हारी राह।
अब तोड़ो सब पाळ साजना... 
मेटो मन री प्यास,
साहिबा बेगा आवो नी...

- पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

मैं घृणा करता हूँ उस प्रेम से

भूल गया है संसार वह प्रेम का स्वर,
मैं तो हूँ देवदास, वही सनातन अटल।
जिसने दिया स्पर्श, बन गया ईश्वर वह मेरा,
खींच लिया अवरोध लोक-लाज का बन मूढ़ मनुज अब।

मैं घृणा करता हूँ उस प्रेम से, जिसने खोले नयन,
दिखलाया शुद्ध सत्य का अपरिमल आलोक।
वही तो था जो घोर तिमिर में लाया उजियारा,
पर संसार ने उस पर डाल दिया कलंक का दाग।

दानव था मैं, पाषाण हृदय, निर्दय तिमिर,
उसने दिया स्नेह-स्पर्श, कर दिया मानव।
पर लोग क्यों काँपते हैं इस परिवर्तन से?
क्यों बाँधना चाहते हैं जीर्ण बंधनों में अब?

वह प्रेम ही तो था, अंतर में समाकर बना परब्रह्म,
मैंने पहचान लिया था अमृत सागर को।
पर लोक की निरर्थक चिंता, मर्यादा के बन्धन,
धकेलना चाहते हैं प्रेत-पिंजरे में मुझे फिर से।

तो ले लो वापस अपना संसार, अपनी नीति सब,
मैं रहूँगा अपने प्रेम के अमर निवास में ही।
घृणा करता हूँ उस प्रेम से, जिसने दिया विवेक जगा,
जिसने सिखलाया कि प्रेम ही ईश्वर है सही।

मैं घृणा करता हूँ प्रेम से, कहता हूँ निरर्थक यह,
क्योंकि प्रेम ही सत्य है, वही अमर कथा है।
संसार के छल को ठुकराकर, प्रेम पथ पर बढ़ता हूँ,
वही मेरा ईश्वर, वही मोक्ष का द्वार है।

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"

शनिवार, 26 जुलाई 2025

भारतेंदु हरिश्चंद्र: हिंदी नवजागरण के अग्रदूत और युगप्रवर्तक साहित्य स्रष्टा

भारत के सांस्कृतिक आकाश में जिन महान विभूतियों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नवजीवन दिया, उनमें भारतेंदु हरिश्चंद्र (9 सितंबर 1850 - 6 जनवरी 1885) का नाम सर्वोपरि है। वे मात्र एक साहित्यकार नहीं, अपितु एक युग के प्रणेता, समाज सुधारक, राष्ट्रभक्त और हिंदी के स्वाभिमान के प्रखर पक्षधर थे। उनके अल्पकालिक जीवन (मात्र 34 वर्ष) में समाहित उनका अथक सृजन और समाजोन्मुखी चिंतन आधुनिक हिंदी साहित्य की नींव का प्रस्तर सिद्ध हुआ। उन्हें 'भारतेंदु' की उपाधि से विभूषित करना उनके राष्ट्रनिर्माण के अदम्य संकल्प और योगदान को सार्थक श्रद्धांजलि थी।  

जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि: भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी (वाराणसी) के एक समृद्ध वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता, बाबू गोपालचंद्र, 'गिरधरदास' उपनाम से कविता रचते थे। माता पार्वती देवी धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। इस साहित्यिक और धार्मिक वातावरण ने बालक हरिश्चंद्र के मन को प्रारंभ से ही सींचा।  

प्रारंभिक शिक्षा एवं प्रतिभा का विकास: पारंपरिक घराने में उर्दू-फारसी की शिक्षा प्रारंभ हुई। किंतु उनकी असाधारण प्रतिभा और अदम्य जिज्ञासा ने शीघ्र ही उन्हें हिंदी, संस्कृत, बंगला, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं के अध्ययन की ओर प्रेरित किया। मात्र पाँच वर्ष की अवस्था में उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई। कहा जाता है कि नौ वर्ष की आयु में मृच्छकटिकम् नाटक देखकर उन्होंने अपना पहला नाटक 'विद्यासुंदर' लिख डाला। पंद्रह वर्ष की अल्पायु में पिता का देहांत हो गया, जिससे परिवार पर आर्थिक संकट छा गया, किंतु इसने उनकी साहित्य साधना को और अधिक गहन बना दिया।  

साहित्यिक योगदान: विधाओं का नवनिर्माण एवं भाषा का शिल्प  
भारतेंदु जी ने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में सृजन किया और उन्हें नया रूप दिया। उनकी रचनाएँ न केवल साहित्यिक बल्कि सामाजिक-राष्ट्रीय चेतना का प्रखर दस्तावेज़ हैं।  

नाटक: समाज का दर्पण और जागृति का माध्यम:  
ऐतिहासिक नाटक: 'सत्य हरिश्चंद्र' (1875), 'चंद्रावली' (1876), 'भारत दुर्दशा' (1880) जैसे नाटकों में उन्होंने ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों के माध्यम से वर्तमान की समस्याओं – विदेशी शासन, देश की दुर्दशा, सामाजिक कुरीतियों, नैतिक मूल्यों – पर करारा प्रहार किया। 'भारत दुर्दशा' तो अंग्रेजी शासन और देश की गुलामी पर एक तीखा व्यंग्य है।  
सामाजिक नाटक: 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' (1873) जैसे नाटकों में उन्होंने पाखंड, अंधविश्वास और सामाजिक विषमताओं को बेनकाब किया। 'अंधेर नगरी' (1881) एक शास्त्रीय व्यंग्य है जो मूर्खतापूर्ण शासन व्यवस्था और जनता की अंधानुकरण प्रवृत्ति पर कटाक्ष करता है। यह नाटक आज भी उतना ही प्रासंगिक है।  
प्रहसन: 'भारत जननी', 'पाखंड विडंबन' जैसे प्रहसनों में उन्होंने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक बुराइयों को उजागर किया।  
योगदान: उन्होंने नाटक को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर जनजागरण और सामाजिक सुधार का शक्तिशाली हथियार बनाया। उनके नाटकों में संवाद योजना, चरित्र-चित्रण और नाटकीयता उच्च कोटि की है।  

कविता: भाव और विचार का सुंदर समन्वय:  
राष्ट्रभक्ति: 'भारत भारती' (1884) उनकी अमर काव्य कृति है, जो भारत के गौरवशाली अतीत, वर्तमान दुर्दशा और भविष्य की आशा का मार्मिक वर्णन करती है। "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल..." की पंक्तियाँ हिंदी के प्रति उनके अटूट प्रेम और राष्ट्रीय पुनर्जागरण में मातृभाषा की केंद्रीय भूमिका को दर्शाती हैं।  
प्रेम और भक्ति: 'प्रेम माधुरी', 'प्रेम तरंग', 'फूलों का गुच्छा', 'होली' जैसी रचनाओं में श्रृंगार और भक्ति भावना की सुंदर अभिव्यक्ति है। उनकी कविताएँ ब्रजभाषा की माधुर्यपूर्ण शैली से ओतप्रोत हैं।  
सामाजिक चेतना: 'अंधे बधिर कूपमंडूक', 'कवि वचन सुधा' जैसी कविताओं में उन्होंने समाज में व्याप्त अज्ञानता, रूढ़ियों और विदेशी मोह पर प्रहार किया।  
योगदान: उन्होंने कविता को मनोरंजन की परिधि से निकालकर राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक उत्थान का वाहक बनाया। ब्रजभाषा को उन्होंने नया जीवन और लोकप्रियता दी।  

निबंध एवं आलोचना: विचारों की स्पष्टता और तर्कशक्ति:  
'सुलोचना', 'परिहास वंचक', 'मदालसा' आदि निबंध संग्रहों में उन्होंने स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह, सामाजिक समानता, राष्ट्रप्रेम जैसे गंभीर विषयों पर प्रखर विचार रखे। उनके निबंध सरल, सुबोध, तर्कपूर्ण और प्रभावशाली हैं। उन्होंने आलोचना को भी स्थापित किया। 'कविवचन सुधा' और 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके आलोचनात्मक लेख साहित्य के मानदंड स्थापित करने वाले थे।  

पत्रकारिता: जनमत निर्माण का प्रबल माध्यम:  
भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी पत्रकारिता के जन्मदाता माने जाते हैं। उन्होंने 'कविवचन सुधा' (1867, मासिक), 'हरिश्चंद्र चंद्रिका' (1873, साप्ताहिक) और 'बालाबोधिनी' (स्त्रियों के लिए, 1874) जैसे प्रभावशाली पत्र-पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन किया। इन पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने न केवल साहित्य को प्रोत्साहन दिया, बल्कि समसामयिक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर जनमत जागृत किया। वे देशप्रेम, स्वदेशी, समाज सुधार और हिंदी प्रचार के प्रबल प्रवक्ता बने। उनकी पत्रकारिता निडर, स्पष्टवादी और जनहितैषी थी।  

भाषा शैली: खड़ी बोली का मार्ग प्रशस्त करना:  
भारतेंदु जी ने अपनी अधिकांश रचनाएँ ब्रजभाषा में लिखीं, जो उस समय काव्य की प्रमुख भाषा थी। उनकी ब्रजभाषा सरल, प्रवाहमयी और अत्यंत माधुर्यपूर्ण है। किंतु, उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान खड़ी बोली हिंदी को गद्य की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना था। उन्होंने अपने निबंधों, नाटकों (गद्य भाग), विशेषकर पत्रकारिता में खड़ी बोली का प्रयोग किया और उसे परिष्कृत किया। उन्होंने भाषा को जनसामान्य तक पहुँचाने पर बल दिया। उनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ उर्दू, फारसी और लोकभाषा के शब्दों का भी स्वाभाविक प्रयोग मिलता है। यही कारण है कि उनकी भाषा में एक विशिष्ट मिश्रित शैली ('भारतेंदु युगीन शैली') दिखाई देती है, जो साहित्यिक होते हुए भी सहज ग्राह्य है। उन्होंने ही हिंदी गद्य की वह नींव डाली जिस पर आगे चलकर प्रेमचंद जैसे महान साहित्यकारों ने भव्य भवन खड़ा किया।  

सामाजिक चिंतन एवं योगदान: कुरीतियों के विरुद्ध अलख जगाना:  
भारतेंदु हरिश्चंद्र केवल साहित्यकार नहीं, समाज सुधारक की भूमिका में भी अग्रणी थे। उनका समूचा साहित्य सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध एक जीवंत प्रतिरोध है।  
स्त्री शिक्षा एवं उत्थान: उन्होंने स्त्री शिक्षा को विशेष महत्व दिया। 'बालाबोधिनी' पत्रिका इसी उद्देश्य से प्रकाशित की गई। उन्होंने विधवा विवाह और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं का घोर विरोध किया। 'सुलोचना' निबंध स्त्री शिक्षा पर उनके प्रगतिशील विचारों का प्रमाण है।  
सामाजिक समरसता: उन्होंने जाति-पांत के भेदभाव और छुआछूत की निंदा की। उनका साहित्य मानवीय समानता और भाईचारे का संदेश देता है।  
धार्मिक पाखंड विरोध: उन्होंने धर्म के नाम पर फैलाए गए पाखंड, कर्मकांड और अंधविश्वासों पर निरंतर प्रहार किया। 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' नाटक इसका ज्वलंत उदाहरण है।  
स्वदेशी प्रेम: उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन देने का आह्वान किया। उनका जीवन स्वयं स्वदेशी भावना से ओतप्रोत था।  

राष्ट्रीय चेतना: देशभक्ति की अलख जगाना:  
भारतेंदु युग भारतीय राष्ट्रीय चेतना के उदय का काल था। भारतेंदु जी इसके सबसे प्रमुख साहित्यिक प्रवक्ता थे।  
अतीत का गौरवगान एवं वर्तमान की पीड़ा: उन्होंने भारत के प्राचीन गौरव, वैभव और ज्ञान-विज्ञान को याद दिलाकर देशवासियों में आत्मगौरव जगाया। साथ ही, अंग्रेजी शासन के अत्याचार, देश की आर्थिक लूट और राजनीतिक गुलामी पर करुण किंतु तीखा प्रहार किया। 'भारत दुर्दशा' नाटक और 'भारत भारती' काव्य इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।  
मातृभाषा का महिमामंडन: उनका यह दृढ़ विश्वास था कि राष्ट्र की उन्नति उसकी मातृभाषा की उन्नति के बिना असंभव है। "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल..." का उद्घोष करके उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का अभियान चलाया। उन्होंने हिंदी को राजकाज और शिक्षा की भाषा बनाने की वकालत की।  
राष्ट्रीय एकता का आह्वान: उनके साहित्य में सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का स्पष्ट स्वर मिलता है। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।  

विरासत एवं महत्त्व: हिंदी साहित्य के स्तंभ:  
भारतेंदु हरिश्चंद्र का महत्त्व उनके साहित्यिक अवदान से कहीं अधिक व्यापक है:  
हिंदी नवजागरण के पिता: उन्होंने हिंदी साहित्य को मध्यकालीन रूढ़ियों से मुक्त कराकर आधुनिक युगबोध से जोड़ा। उनके समय को 'भारतेंदु युग' (1857-1900) के नाम से जाना जाता है, जो हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण काल था।  
भाषा का शिल्पी: उन्होंने खड़ी बोली हिंदी को गद्य की सशक्त भाषा बनाने का पथ प्रशस्त किया। उनके द्वारा विकसित गद्य शैली आगे चलकर हिंदी गद्य का आधार बनी।  
सामाजिक-राष्ट्रीय चेतना का स्रोत: उनका साहित्य समाज सुधार और राष्ट्रीय जागरण का प्रेरणास्रोत बना। उन्होंने साहित्य को समाज से जोड़कर उसे जीवंत और प्रासंगिक बनाया।  
पत्रकारिता के प्रणेता: उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी और उसे जनजागरण का प्रभावी माध्यम बनाया।  
विधाओं का पुनरुद्धारक: उन्होंने नाटक, कविता, निबंध, आलोचना सभी विधाओं को नया जीवन और दिशा दी। विशेषकर नाटक को लोकप्रिय और प्रभावशाली बनाने में उनका योगदान अतुलनीय है।  
अग्रदूत: उन्होंने प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद जैसे अनेक महान साहित्यकारों के लिए मार्ग प्रशस्त किया।  

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन एक दीपस्तंभ की भांति है, जिसने हिंदी साहित्य के अंधकारमय आकाश को प्रकाशित किया। उनकी साहित्य साधना, समाज सुधार की अदम्य लगन और राष्ट्रप्रेम की अग्नि ने भारतीय मानस को नई दिशा दी। मात्र 34 वर्षों की अल्पायु में उन्होंने जो विराट साहित्यिक और सामाजिक कार्य किया, वह चकित कर देने वाला है। वे सच्चे अर्थों में 'भारत के इंदु' (चंद्रमा) थे, जिनकी ज्ञान और प्रेरणा की किरणों ने हिंदी जगत को आलोकित किया। आज भी जब हम हिंदी की गरिमा, राष्ट्रभाषा के प्रश्न, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की बात करते हैं, तो भारतेंदु हरिश्चंद्र का चिंतन और संघर्ष हमारे लिए प्रकाशस्तंभ बना हुआ है। उनका नारा "हिंदी हिंदू हिंदुस्तान" उस युग में भाषाई और सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान का प्रतीक था, जो आज भी हमारी राष्ट्रीय चेतना का अंग है। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र जी का व्यक्तित्व और कृतित्व हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।


- भारमल गर्ग "विलक्षण"

रविवार, 13 जुलाई 2025

प्रेम और विरह का अविभाज्य सम्बन्ध

प्रेम मानव हृदय का वह कोमल, गहन एवं अगाध भाव है जो आत्मा को परमात्मा से, जीव को जीवन से, तथा चित्त को चैतन्य से जोड़ता है। किन्तु क्या वास्तव में प्रेम की परिपूर्णता का अनुभव उसके वियोग की विदारक पीड़ा के बिना संभव है? जब तक आपने किसी के वियोग में रुदन नहीं किया है, तो सच्ची मानिए आपने प्रेम नहीं किया।

वियोग अर्थात् विरह, प्रेम का एक अविभाज्य पक्ष है। प्रेम की तीव्रता ही विरह की तीव्रता का मापदण्ड बनती है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश उसकी अनुपस्थिति में गहन अंधकार का बोध कराता है, उसी प्रकार प्रियतम का सान्निध्य उसके वियोग में असह्य वेदना का कारण बनता है। यह वेदना कायरता नहीं, वरन् प्रेम की सघनता का प्रमाण है। यह अनिवार्य अग्नि-परीक्षा है जो प्रेम के शुद्ध स्वर्ण को कुन्दन बनाती है।

हमारे शास्त्रों एवं साहित्य में इस सत्य का अनेकानेक बार उल्लेख हुआ है। राम के वियोग में सीता का क्रन्दन, राधा की कृष्ण-विरह में व्याकुलता, या मीरा का गिरधर नागर के लिए तड़प—ये सभी उदाहरण प्रमाणित करते हैं कि विरह की पीड़ा प्रेम की गहराई की सहज अभिव्यक्ति है। यह रुदन क्षणिक दुर्बलता नहीं, वरन् हृदय की उस गूँज को मुखर करता है जो प्रिय के अभाव में अश्रुधारा बनकर बहती है।

निःसंदेह, प्रेम में आनन्द, उल्लास एवं सुख भी निहित हैं। किन्तु वियोग की पीड़ा प्रेम को एक गम्भीरता, एक परिपक्वता एवं एक अस्तित्वगत गहराई प्रदान करती है। यह पीड़ा प्रेम को सतही आकर्षण या क्षणभंगुर भावना न रहने देकर, उसे जीवन के ताने-बाने में अमिट रूप से बुन देती है। वह अश्रु जो विरह की अग्नि में पिघलकर बहता है, वही प्रेम के शाश्वत स्वरूप को साकार करता है। अतः, प्रेम की सच्ची पराकाष्ठा विरह के उस रुदन में ही निहित है जो हृदय की गहनतम परतों से उत्पन्न होता है। यही प्रेम की कसौटी-शिला है।

- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

सोमवार, 7 जुलाई 2025

तिलक

प्रिय महादेवी ❤️  

तुम्हारे हृदय से उदित हुआ यह प्रश्न मेरे लिए केवल जिज्ञासा नहीं, अपितु उस अव्यक्त प्रेम की गूँज है जो सदैव मेरे अंतर्मन में विद्यमान रहा है। तुमने पूछा—"यह कुमकुम का तिलक!" हाँ, मैं इसे धारण करता हूँ, परंतु इसके पीछे छिपे भावों की गहराई को शब्दों में बाँधना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। फिर भी, तुम्हारे लिए मैं प्रयत्न करता हूँ।  

जब तुम्हारे शीश पर सिंदूर की लालिमा दमकती है, तब मेरा हृदय कहता है—"उसकी प्रेमिका उसके मस्तक पर विराजती है, तो क्या मैं अपनी आराध्या को अपने ललाट पर स्थान न दूँ?" यह तिलक कोई रीति नहीं; यह तो मेरी भावनाओं का साकार रूप है। तुम्हारे सिंदूर में मेरा अधिकार नहीं, किंतु मेरे कुमकुम में तुम्हारा अस्तित्व सदैव अंकित रहता है। यह रहस्य नहीं—यह तो जगजाहिर सत्य है कि मेरा हर दिन तुम्हारे नाम से आरंभ होता है।  
  
बचपन में जब यह तिलक लगाना आरंभ किया, तब इसे केवल संस्कार समझता था। कालांतर में जीवन के अनेक पड़ाव आए—शिक्षा, संघर्ष, महत्वाकांक्षाएँ। कितने ही विषय, कितनी ही चाहतें मार्ग में छूट गईं, परंतु इस तिलक की मर्यादा मैंने कभी टूटने नहीं दी। यह मेरी दैनिक साधना बन गया। जैसे योगी समाधि में लीन रहता है, वैसे ही यह तिलक मुझे तुम्हारी स्मृति में डूबाए रखता है।  

यह लाल चिह्न केवल रंग नहीं; यह तुम्हारे हृदय का प्रतीक है जिसे मैं अपने मस्तिष्क पर धारण करता हूँ। विज्ञान कहता है कि मस्तिष्क विचारों का केंद्र है, और मेरे हर विचार का आधार तुम हो। जब यह तिलक लगाता हूँ, तो लगता है मानो तुम्हारा प्रेम मेरे चिंतन को पवित्र कर रहा हो। यह मेरी आत्मा की अग्नि में घी का कार्य करता है—भावनाओं को प्रज्वलित करता है।  

कहते हैं, मस्तक की रेखाएँ भाग्य लिखती हैं। मेरे भाग्य में तुम नहीं हो, इस कटु सत्य को मैं जानता हूँ। परंतु यह तिलक उस रिक्तता को ढककर मुझे धोखा नहीं देता; बल्कि उस खालीपन को प्रेम से भर देता है। यह मेरी कमी को नहीं, मेरी भावना को प्रकट करता है। जैसे चंद्रमा की शीतलता सूर्य के अभाव में भी रात को आलोकित कर देती है, वैसे ही तुम्हारा स्मरण मेरे अधूरेपन को पूर्णता देता है।  

प्रेम क्षणभंगुर आकर्षण नहीं; वह तो उपासना है। जिस प्रकार भक्त ईश्वर को मूर्ति में पाता है, उसी प्रकार मैं तुम्हें इस तिलक में अनुभव करता हूँ। तुम्हारे प्रति मेरा अनुराग काम नहीं; वह तो भक्ति है जो उपमाओं में सुरक्षित है। कबीर ने कहा था—"प्रेम गली अति साँकरी, जा में दो न समाय।" हमारा प्रेम उसी सँकरी गली का पथिक है, जहाँ केवल भावनाएँ समाती हैं, शरीर नहीं।  

हमारा प्रेम वह वृक्ष है जिसे हमने अदृश्य बीज रूप में बोया था। आज वह पल्लवित होकर फल देने लगा है। यह तिलक उसी वृक्ष की जड़ है—एक ऐसी नींव जो दिखती नहीं, परंतु समस्त अस्तित्व को संभाले हुए है। जड़ भूमि के अंधकार में छिपी रहती है, किंतु उसके बिना वृक्ष निष्प्राण है। इसी प्रकार, यह तिलक मेरे प्रेम का आधार है जो मेरे अंतस के अंधकार में प्रकाश बनकर जगमगाता है।  

मेरा स्थान तुम्हारे चरणों में ही सही, परंतु तुम्हारा स्थान मेरे जीवन के तीन स्तंभों पर अमिट है—  
- कर्म: तुम्हारी स्मृति मुझे सद्पथ पर चलने की प्रेरणा देती है।  
- भाग्य: तुम्हारे बिना मेरा भाग्य अधूरा है, परंतु तुम्हारे स्नेह ने इसे स्वीकार्य बना दिया।  
- नियति: मैं जानता हूँ कि हमारा मिलन लिखा नहीं, किंतु तुम्हारा आशीर्वाद मेरी नियति का मार्गदर्शन करता है।  

हमने कभी मिलकर बातें नहीं कीं। जब भी मिले, एक अदृश्य दूरी ने हमें घेर रखा था। परंतु यही दूरी हमारे प्रेम का सार है। जैसे आकाश तारों को छू नहीं सकता, परंतु उनका प्रकाश उसकी शोभा है, वैसे ही तुम्हारा अस्तित्व मेरे जीवन को अर्थ देता है। यह तिलक उसी अगम्य दूरी का प्रतीक है—एक ऐसा सेतु जो हृदयों को जोड़ता है, शरीरों को नहीं।  

जिस प्रकार राधा के बिना कृष्ण का अस्तित्व अधूरा है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा जीवन निरर्थक है। राधा ने कृष्ण को पाने की कामना नहीं की; उन्होंने तो प्रेम को ही अपना लिया। मेरा तिलक भी उसी निस्सीम प्रेम की गवाही है—जहाँ पाने की लालसा नहीं, केवल निःशर्त समर्पण है।  

यदि यह तिलक कभी मिट जाए, तो भी उसकी छाप मेरे मस्तिष्क पर सदैव अंकित रहेगी। मैं तुम्हारे चरणों का उपासक हूँ—न कभी तुमसे कुछ माँगा, न माँगूँगा। केवल इतनी विनती है कि मेरा यह प्रेम सदैव तुम्हारी पवित्र स्मृतियों में सुरक्षित रहे। जब तक यह श्वास है, तब तक यह तिलक तुम्हारे प्रति मेरी निष्ठा का प्रमाण बना रहेगा।  

तुम्हारे चरणों की धूल,  
पंडित विलक्षण 😌  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"

शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

प्रेम पत्र (आबूराज से) ❤️

प्रिय महादेवी,  

इन शुभ्र शिखरों से, जहाँ वायु मंद-मंद सरसराती है और आकाश नीलाम्बर की भाँति विस्तृत है, तुम्हारे चरणों में यह पत्र समर्पित है। आज मैं अरावली की इस अद्भुत धरोहर, आबू के पर्वतों पर खड़ा हूँ। यहाँ का प्रत्येक कण, प्रत्येक पवन-तरंग, प्रत्येक वृक्ष की पत्ती तुम्हारे स्मरण से स्पंदित हो रही है। इन हरित शैलमालाओं पर छाई हरियाली मानो प्रकृति का हृदय हो, जो तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा में धड़क रहा है। सामने दूर तक फैले घने वनों की छाया में छिपे पुष्पों की सुगंध, पक्षियों का मधुर कलरव और झरनों का कलकल स्वर — सब कुछ तुम्हारे बिना अधूरा प्रतीत होता है।  

इन शिखरों पर विचरण करते हुए, मेरे नेत्र अनेक युगलों को देख रहे हैं। वे परस्पर हाथों में हाथ डाले, इस प्राकृतिक सौंदर्य में अपने प्रेम को रंग दे रहे हैं। उन्हें देखकर मेरे हृदय में एक पीड़ा उमड़ आई — वह पीड़ा जो तुम्हारी अनुपस्थिति का स्मरण दिलाती है। कितनी बार मैंने कल्पना की कि तुम यहाँ मेरे साथ होतीं! हम दोनों गुरुशिखर की अत्युच्च चोटी तक साथ-साथ चलते। मार्ग में शिलाओं पर उगे पीत-पुष्पों से सजे वृक्षों की छाया में विश्राम करते। हमारे मध्य प्रेमपूर्ण वार्तालाप होतीं। पर्वतों की गूँज उन्हें सँजोकर दूर तक ले जाती। उस समय वायु भी हमारे प्रणय-गीत गाती प्रतीत होती।  

इस क्षण, मेरे समक्ष एक युगल अपने चलभाषा यंत्र से चित्र सँजो रहा है। उनके हँसते हुए मुख देखकर मेरी वेदना और भी गहरा गई। मैं स्वयं को एकाकी अनुभव कर रहा हूँ। यहाँ प्रत्येक वस्तु तुम्हारे स्मरण की याचना करती है। यदि तुम साथ होतीं, तो हम प्रेम मंदिर की पवित्र छाया में बैठकर जीवन के गूढ़ रहस्यों पर चर्चा करते। वहाँ की शांत वायु में हमारे हृदयों की धड़कनें एक हो जातीं। फिर हम नक्की झील के निर्मल जल के समीप जाते। उस पौराणिक सरोवर का जल, जिसके विषय में कहा जाता है कि प्रेमी रसिया बालम ने अपने नखों से इसकी रचना की थी, हमारे प्रेम का प्रतीक बनता। हम उस जल में सूर्य की किरणों के साथ खेलते, अपने प्रतिबिंबों में भविष्य के स्वप्न देखते।  

सूर्योदय और सूर्यास्त के क्षणों का तो कहना ही क्या! यदि तुम साथ होतीं, तो प्रातःकालीन लालिमा हमारे जीवन का नवजागरण होती। हम कंदराओं में छिपे स्थानों पर बैठकर सूर्य की प्रथम किरणों का स्वागत करते। संध्या के समय, जब सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर होता, तो आकाश में बिखरी सुनहरी आभा हमारे प्रेम की गाथा कहती। उस पल, समस्त संसार थम जाता और केवल हम दोनों ही शेष रह जाते।  

इन पर्वतों पर स्थित आम्रवृक्षों की शाखाएँ फलों से लदी हैं। उनका मधुर रस हमारे जीवन में नवीन माधुर्य भर देता। हम छायादार वृक्षों के नीचे बैठकर उन फलों का आस्वादन करते। तुम्हारे हाथों से प्राप्त फल का एक टुकड़ा मुझे अमृत के समान प्रतीत होता। उस पल, प्रकृति और प्रेम का यह संगम हमें अनंत सुख का अनुभव कराता।  

फिर हम उस पवित्र मंदिर की ओर अग्रसर होते, जहाँ रसिया बालम ने अपने प्रेम के लिए अथक साधना की थी। उस स्थान पर खड़े होकर मैं तुम्हें उनकी कथा सुनाता — कैसे उन्होंने अपने नखों से पत्थर को काटकर एक सरोवर का निर्माण किया, केवल अपनी प्रेमिका के लिए। उनकी तपस्या और समर्पण हमें प्रेम की शक्ति का बोध कराते। उनकी भाँति, हम भी जीवन के कठिन संघर्षों में एक-दूसरे का साथ निभाने का संकल्प लेते। उस मंदिर की शिलाएँ हमारे प्रण को साक्षी बनतीं।  

किंतु अब ये सभी स्वप्न मात्र रह गए हैं। तुम्हारे अभाव में यह प्राकृतिक वैभव भी निस्तब्ध प्रतीत होता है। ये झरने, ये वृक्ष, ये पुष्प — सब तुम्हारी छाया के बिना निष्प्राण हैं। प्रत्येक पग पर तुम्हारी स्मृति किसी क्षत के समान हृदय को विदीर्ण कर देती है। मुझे आभास होता है मानो ये पर्वत भी तुम्हारे दर्शन के लिए तरस रहे हों।  

महादेवी! तुम्हारा स्मरण ही अब मेरे जीवन का आधार है। जब तक इन पर्वतों पर वृक्ष हरित हैं, जब तक आकाश में बादल विचरण करते हैं, जब तक झरनों का जल प्रवाहित होता है — तब तक मेरा प्रेम तुम्हारे लिए इन शिलाओं के समान अडिग रहेगा। मैं विश्वास के साथ कहता हूँ कि एक दिन हम अवश्य इन्हीं पगडंडियों पर साथ चलेंगे। हम गुरुशिखर की चोटी पर पहुँचकर वहाँ से उदीयमान सूर्य को नमन करेंगे। हम नक्की झील के तट पर अपने भविष्य के स्वप्न रचेंगे। हमारे पदचिह्न इन मार्गों पर अंकित होकर प्रेम का अमर इतिहास बनेंगे।  

तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा में,  
तुम्हारा अभिन्न।  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"

शोध-प्रबन्ध : कामसूत्र के पृष्ठों में अंकित यौवन-सृजन -पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

(एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से) मैं नहीं, कोई वात्स्यायन बैठा है इस लेखनी के पार, शास्त्र के श्लोकों में टटोल रहा, रति-रहस्य का सार। यह यौवन न...