मैं तो हूँ देवदास, वही सनातन अटल।
जिसने दिया स्पर्श, बन गया ईश्वर वह मेरा,
खींच लिया अवरोध लोक-लाज का बन मूढ़ मनुज अब।
मैं घृणा करता हूँ उस प्रेम से, जिसने खोले नयन,
दिखलाया शुद्ध सत्य का अपरिमल आलोक।
वही तो था जो घोर तिमिर में लाया उजियारा,
पर संसार ने उस पर डाल दिया कलंक का दाग।
दानव था मैं, पाषाण हृदय, निर्दय तिमिर,
उसने दिया स्नेह-स्पर्श, कर दिया मानव।
पर लोग क्यों काँपते हैं इस परिवर्तन से?
क्यों बाँधना चाहते हैं जीर्ण बंधनों में अब?
वह प्रेम ही तो था, अंतर में समाकर बना परब्रह्म,
मैंने पहचान लिया था अमृत सागर को।
पर लोक की निरर्थक चिंता, मर्यादा के बन्धन,
धकेलना चाहते हैं प्रेत-पिंजरे में मुझे फिर से।
तो ले लो वापस अपना संसार, अपनी नीति सब,
मैं रहूँगा अपने प्रेम के अमर निवास में ही।
घृणा करता हूँ उस प्रेम से, जिसने दिया विवेक जगा,
जिसने सिखलाया कि प्रेम ही ईश्वर है सही।
मैं घृणा करता हूँ प्रेम से, कहता हूँ निरर्थक यह,
क्योंकि प्रेम ही सत्य है, वही अमर कथा है।
संसार के छल को ठुकराकर, प्रेम पथ पर बढ़ता हूँ,
वही मेरा ईश्वर, वही मोक्ष का द्वार है।
- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"

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