ओ जी... म्हारो हिवड़ो नदी रो घाट, साहिबा बेगा आवो नी।
म्हारो हिवड़ो नदी रो घाट...
नैणां सू बहगी नदियां, पल-पल जोवे बाट,
साहिबा बेगा आवो नी...
ज्यूं नदियां रा दोय किनारा, संग-संग चाल्या जावे,
पण जनम-जनम री दूरी बालम, मिलण कदे नी पावे।
थे ऊभा उस पार साजना...
मैं बैठी आ घाट,
साहिबा बेगा आवो नी...
पहली प्रीत घणी ही मीठी, मिसरी ज्यूं घुल जाती,
अब बिछड़न में खारी लाग्गै, ज्यूं लूणी री माटी।
म्हारा आं सूड़ा रो नीर साजना...
हो ग्यो खरो खाट,
साहिबा बेगा आवो नी...
नदी रमे बस सागर तानी, और न दूजी चाह,
म्हारो सागर थे ही प्रीतम, थे ही म्हारी राह।
अब तोड़ो सब पाळ साजना...
मेटो मन री प्यास,
साहिबा बेगा आवो नी...
- पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

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