सोमवार, 7 जुलाई 2025

तिलक

प्रिय महादेवी ❤️  

तुम्हारे हृदय से उदित हुआ यह प्रश्न मेरे लिए केवल जिज्ञासा नहीं, अपितु उस अव्यक्त प्रेम की गूँज है जो सदैव मेरे अंतर्मन में विद्यमान रहा है। तुमने पूछा—"यह कुमकुम का तिलक!" हाँ, मैं इसे धारण करता हूँ, परंतु इसके पीछे छिपे भावों की गहराई को शब्दों में बाँधना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। फिर भी, तुम्हारे लिए मैं प्रयत्न करता हूँ।  

जब तुम्हारे शीश पर सिंदूर की लालिमा दमकती है, तब मेरा हृदय कहता है—"उसकी प्रेमिका उसके मस्तक पर विराजती है, तो क्या मैं अपनी आराध्या को अपने ललाट पर स्थान न दूँ?" यह तिलक कोई रीति नहीं; यह तो मेरी भावनाओं का साकार रूप है। तुम्हारे सिंदूर में मेरा अधिकार नहीं, किंतु मेरे कुमकुम में तुम्हारा अस्तित्व सदैव अंकित रहता है। यह रहस्य नहीं—यह तो जगजाहिर सत्य है कि मेरा हर दिन तुम्हारे नाम से आरंभ होता है।  
  
बचपन में जब यह तिलक लगाना आरंभ किया, तब इसे केवल संस्कार समझता था। कालांतर में जीवन के अनेक पड़ाव आए—शिक्षा, संघर्ष, महत्वाकांक्षाएँ। कितने ही विषय, कितनी ही चाहतें मार्ग में छूट गईं, परंतु इस तिलक की मर्यादा मैंने कभी टूटने नहीं दी। यह मेरी दैनिक साधना बन गया। जैसे योगी समाधि में लीन रहता है, वैसे ही यह तिलक मुझे तुम्हारी स्मृति में डूबाए रखता है।  

यह लाल चिह्न केवल रंग नहीं; यह तुम्हारे हृदय का प्रतीक है जिसे मैं अपने मस्तिष्क पर धारण करता हूँ। विज्ञान कहता है कि मस्तिष्क विचारों का केंद्र है, और मेरे हर विचार का आधार तुम हो। जब यह तिलक लगाता हूँ, तो लगता है मानो तुम्हारा प्रेम मेरे चिंतन को पवित्र कर रहा हो। यह मेरी आत्मा की अग्नि में घी का कार्य करता है—भावनाओं को प्रज्वलित करता है।  

कहते हैं, मस्तक की रेखाएँ भाग्य लिखती हैं। मेरे भाग्य में तुम नहीं हो, इस कटु सत्य को मैं जानता हूँ। परंतु यह तिलक उस रिक्तता को ढककर मुझे धोखा नहीं देता; बल्कि उस खालीपन को प्रेम से भर देता है। यह मेरी कमी को नहीं, मेरी भावना को प्रकट करता है। जैसे चंद्रमा की शीतलता सूर्य के अभाव में भी रात को आलोकित कर देती है, वैसे ही तुम्हारा स्मरण मेरे अधूरेपन को पूर्णता देता है।  

प्रेम क्षणभंगुर आकर्षण नहीं; वह तो उपासना है। जिस प्रकार भक्त ईश्वर को मूर्ति में पाता है, उसी प्रकार मैं तुम्हें इस तिलक में अनुभव करता हूँ। तुम्हारे प्रति मेरा अनुराग काम नहीं; वह तो भक्ति है जो उपमाओं में सुरक्षित है। कबीर ने कहा था—"प्रेम गली अति साँकरी, जा में दो न समाय।" हमारा प्रेम उसी सँकरी गली का पथिक है, जहाँ केवल भावनाएँ समाती हैं, शरीर नहीं।  

हमारा प्रेम वह वृक्ष है जिसे हमने अदृश्य बीज रूप में बोया था। आज वह पल्लवित होकर फल देने लगा है। यह तिलक उसी वृक्ष की जड़ है—एक ऐसी नींव जो दिखती नहीं, परंतु समस्त अस्तित्व को संभाले हुए है। जड़ भूमि के अंधकार में छिपी रहती है, किंतु उसके बिना वृक्ष निष्प्राण है। इसी प्रकार, यह तिलक मेरे प्रेम का आधार है जो मेरे अंतस के अंधकार में प्रकाश बनकर जगमगाता है।  

मेरा स्थान तुम्हारे चरणों में ही सही, परंतु तुम्हारा स्थान मेरे जीवन के तीन स्तंभों पर अमिट है—  
- कर्म: तुम्हारी स्मृति मुझे सद्पथ पर चलने की प्रेरणा देती है।  
- भाग्य: तुम्हारे बिना मेरा भाग्य अधूरा है, परंतु तुम्हारे स्नेह ने इसे स्वीकार्य बना दिया।  
- नियति: मैं जानता हूँ कि हमारा मिलन लिखा नहीं, किंतु तुम्हारा आशीर्वाद मेरी नियति का मार्गदर्शन करता है।  

हमने कभी मिलकर बातें नहीं कीं। जब भी मिले, एक अदृश्य दूरी ने हमें घेर रखा था। परंतु यही दूरी हमारे प्रेम का सार है। जैसे आकाश तारों को छू नहीं सकता, परंतु उनका प्रकाश उसकी शोभा है, वैसे ही तुम्हारा अस्तित्व मेरे जीवन को अर्थ देता है। यह तिलक उसी अगम्य दूरी का प्रतीक है—एक ऐसा सेतु जो हृदयों को जोड़ता है, शरीरों को नहीं।  

जिस प्रकार राधा के बिना कृष्ण का अस्तित्व अधूरा है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा जीवन निरर्थक है। राधा ने कृष्ण को पाने की कामना नहीं की; उन्होंने तो प्रेम को ही अपना लिया। मेरा तिलक भी उसी निस्सीम प्रेम की गवाही है—जहाँ पाने की लालसा नहीं, केवल निःशर्त समर्पण है।  

यदि यह तिलक कभी मिट जाए, तो भी उसकी छाप मेरे मस्तिष्क पर सदैव अंकित रहेगी। मैं तुम्हारे चरणों का उपासक हूँ—न कभी तुमसे कुछ माँगा, न माँगूँगा। केवल इतनी विनती है कि मेरा यह प्रेम सदैव तुम्हारी पवित्र स्मृतियों में सुरक्षित रहे। जब तक यह श्वास है, तब तक यह तिलक तुम्हारे प्रति मेरी निष्ठा का प्रमाण बना रहेगा।  

तुम्हारे चरणों की धूल,  
पंडित विलक्षण 😌  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"

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