शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

प्रेम पत्र (आबूराज से) ❤️

प्रिय महादेवी,  

इन शुभ्र शिखरों से, जहाँ वायु मंद-मंद सरसराती है और आकाश नीलाम्बर की भाँति विस्तृत है, तुम्हारे चरणों में यह पत्र समर्पित है। आज मैं अरावली की इस अद्भुत धरोहर, आबू के पर्वतों पर खड़ा हूँ। यहाँ का प्रत्येक कण, प्रत्येक पवन-तरंग, प्रत्येक वृक्ष की पत्ती तुम्हारे स्मरण से स्पंदित हो रही है। इन हरित शैलमालाओं पर छाई हरियाली मानो प्रकृति का हृदय हो, जो तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा में धड़क रहा है। सामने दूर तक फैले घने वनों की छाया में छिपे पुष्पों की सुगंध, पक्षियों का मधुर कलरव और झरनों का कलकल स्वर — सब कुछ तुम्हारे बिना अधूरा प्रतीत होता है।  

इन शिखरों पर विचरण करते हुए, मेरे नेत्र अनेक युगलों को देख रहे हैं। वे परस्पर हाथों में हाथ डाले, इस प्राकृतिक सौंदर्य में अपने प्रेम को रंग दे रहे हैं। उन्हें देखकर मेरे हृदय में एक पीड़ा उमड़ आई — वह पीड़ा जो तुम्हारी अनुपस्थिति का स्मरण दिलाती है। कितनी बार मैंने कल्पना की कि तुम यहाँ मेरे साथ होतीं! हम दोनों गुरुशिखर की अत्युच्च चोटी तक साथ-साथ चलते। मार्ग में शिलाओं पर उगे पीत-पुष्पों से सजे वृक्षों की छाया में विश्राम करते। हमारे मध्य प्रेमपूर्ण वार्तालाप होतीं। पर्वतों की गूँज उन्हें सँजोकर दूर तक ले जाती। उस समय वायु भी हमारे प्रणय-गीत गाती प्रतीत होती।  

इस क्षण, मेरे समक्ष एक युगल अपने चलभाषा यंत्र से चित्र सँजो रहा है। उनके हँसते हुए मुख देखकर मेरी वेदना और भी गहरा गई। मैं स्वयं को एकाकी अनुभव कर रहा हूँ। यहाँ प्रत्येक वस्तु तुम्हारे स्मरण की याचना करती है। यदि तुम साथ होतीं, तो हम प्रेम मंदिर की पवित्र छाया में बैठकर जीवन के गूढ़ रहस्यों पर चर्चा करते। वहाँ की शांत वायु में हमारे हृदयों की धड़कनें एक हो जातीं। फिर हम नक्की झील के निर्मल जल के समीप जाते। उस पौराणिक सरोवर का जल, जिसके विषय में कहा जाता है कि प्रेमी रसिया बालम ने अपने नखों से इसकी रचना की थी, हमारे प्रेम का प्रतीक बनता। हम उस जल में सूर्य की किरणों के साथ खेलते, अपने प्रतिबिंबों में भविष्य के स्वप्न देखते।  

सूर्योदय और सूर्यास्त के क्षणों का तो कहना ही क्या! यदि तुम साथ होतीं, तो प्रातःकालीन लालिमा हमारे जीवन का नवजागरण होती। हम कंदराओं में छिपे स्थानों पर बैठकर सूर्य की प्रथम किरणों का स्वागत करते। संध्या के समय, जब सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर होता, तो आकाश में बिखरी सुनहरी आभा हमारे प्रेम की गाथा कहती। उस पल, समस्त संसार थम जाता और केवल हम दोनों ही शेष रह जाते।  

इन पर्वतों पर स्थित आम्रवृक्षों की शाखाएँ फलों से लदी हैं। उनका मधुर रस हमारे जीवन में नवीन माधुर्य भर देता। हम छायादार वृक्षों के नीचे बैठकर उन फलों का आस्वादन करते। तुम्हारे हाथों से प्राप्त फल का एक टुकड़ा मुझे अमृत के समान प्रतीत होता। उस पल, प्रकृति और प्रेम का यह संगम हमें अनंत सुख का अनुभव कराता।  

फिर हम उस पवित्र मंदिर की ओर अग्रसर होते, जहाँ रसिया बालम ने अपने प्रेम के लिए अथक साधना की थी। उस स्थान पर खड़े होकर मैं तुम्हें उनकी कथा सुनाता — कैसे उन्होंने अपने नखों से पत्थर को काटकर एक सरोवर का निर्माण किया, केवल अपनी प्रेमिका के लिए। उनकी तपस्या और समर्पण हमें प्रेम की शक्ति का बोध कराते। उनकी भाँति, हम भी जीवन के कठिन संघर्षों में एक-दूसरे का साथ निभाने का संकल्प लेते। उस मंदिर की शिलाएँ हमारे प्रण को साक्षी बनतीं।  

किंतु अब ये सभी स्वप्न मात्र रह गए हैं। तुम्हारे अभाव में यह प्राकृतिक वैभव भी निस्तब्ध प्रतीत होता है। ये झरने, ये वृक्ष, ये पुष्प — सब तुम्हारी छाया के बिना निष्प्राण हैं। प्रत्येक पग पर तुम्हारी स्मृति किसी क्षत के समान हृदय को विदीर्ण कर देती है। मुझे आभास होता है मानो ये पर्वत भी तुम्हारे दर्शन के लिए तरस रहे हों।  

महादेवी! तुम्हारा स्मरण ही अब मेरे जीवन का आधार है। जब तक इन पर्वतों पर वृक्ष हरित हैं, जब तक आकाश में बादल विचरण करते हैं, जब तक झरनों का जल प्रवाहित होता है — तब तक मेरा प्रेम तुम्हारे लिए इन शिलाओं के समान अडिग रहेगा। मैं विश्वास के साथ कहता हूँ कि एक दिन हम अवश्य इन्हीं पगडंडियों पर साथ चलेंगे। हम गुरुशिखर की चोटी पर पहुँचकर वहाँ से उदीयमान सूर्य को नमन करेंगे। हम नक्की झील के तट पर अपने भविष्य के स्वप्न रचेंगे। हमारे पदचिह्न इन मार्गों पर अंकित होकर प्रेम का अमर इतिहास बनेंगे।  

तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा में,  
तुम्हारा अभिन्न।  

- भारमल गर्ग "विलक्षण"

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