रविवार, 13 जुलाई 2025

प्रेम और विरह का अविभाज्य सम्बन्ध

प्रेम मानव हृदय का वह कोमल, गहन एवं अगाध भाव है जो आत्मा को परमात्मा से, जीव को जीवन से, तथा चित्त को चैतन्य से जोड़ता है। किन्तु क्या वास्तव में प्रेम की परिपूर्णता का अनुभव उसके वियोग की विदारक पीड़ा के बिना संभव है? जब तक आपने किसी के वियोग में रुदन नहीं किया है, तो सच्ची मानिए आपने प्रेम नहीं किया।

वियोग अर्थात् विरह, प्रेम का एक अविभाज्य पक्ष है। प्रेम की तीव्रता ही विरह की तीव्रता का मापदण्ड बनती है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश उसकी अनुपस्थिति में गहन अंधकार का बोध कराता है, उसी प्रकार प्रियतम का सान्निध्य उसके वियोग में असह्य वेदना का कारण बनता है। यह वेदना कायरता नहीं, वरन् प्रेम की सघनता का प्रमाण है। यह अनिवार्य अग्नि-परीक्षा है जो प्रेम के शुद्ध स्वर्ण को कुन्दन बनाती है।

हमारे शास्त्रों एवं साहित्य में इस सत्य का अनेकानेक बार उल्लेख हुआ है। राम के वियोग में सीता का क्रन्दन, राधा की कृष्ण-विरह में व्याकुलता, या मीरा का गिरधर नागर के लिए तड़प—ये सभी उदाहरण प्रमाणित करते हैं कि विरह की पीड़ा प्रेम की गहराई की सहज अभिव्यक्ति है। यह रुदन क्षणिक दुर्बलता नहीं, वरन् हृदय की उस गूँज को मुखर करता है जो प्रिय के अभाव में अश्रुधारा बनकर बहती है।

निःसंदेह, प्रेम में आनन्द, उल्लास एवं सुख भी निहित हैं। किन्तु वियोग की पीड़ा प्रेम को एक गम्भीरता, एक परिपक्वता एवं एक अस्तित्वगत गहराई प्रदान करती है। यह पीड़ा प्रेम को सतही आकर्षण या क्षणभंगुर भावना न रहने देकर, उसे जीवन के ताने-बाने में अमिट रूप से बुन देती है। वह अश्रु जो विरह की अग्नि में पिघलकर बहता है, वही प्रेम के शाश्वत स्वरूप को साकार करता है। अतः, प्रेम की सच्ची पराकाष्ठा विरह के उस रुदन में ही निहित है जो हृदय की गहनतम परतों से उत्पन्न होता है। यही प्रेम की कसौटी-शिला है।

- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)

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