याद रहे वह, देश पुराना
रोय पड़े मन, साँझ-सवेरे
ऐ सखि साजन? ना सखि, पीहर!
बाग़ खिले थे, फूल घनेरे
गीत सुनाते, पंछी सबेरे
रूठ गया सब, हर्ष घनेरा
ऐ सखि साजन? ना सखि, पीहर!
रूठ गए सब, संगी प्यारे
दीप बुझे हैं, नैन-किनारे
छूट गया जो, साथ सलोना
ऐ सखि साजन? ना सखि, पीहर!
ताप न कोई, तन को घेरे
मात-कृपा की, शीतल छाँहें
चैन मिले जिस, द्वार पधारे
ऐ सखि साजन? ना सखि, पीहर!
रोय पड़े जब, आँखें मेरी
गोद मिले सुख-धाम घनेरी
कष्ट हरे जो, जीवन भर के
ऐ सखि साजन? ना सखि, पीहर!
तात-दुलारे, बाग़ निराले
साँझ ढली सब, दीप बुझा ले
छोड़ चली मैं, जिसको रोती
ऐ सखि साजन? ना सखि, पीहर!
वीर बुलाए, बाहें खोले
भाभिय प्यारी, अमृत बोले
दौड़ पड़ूँ मैं, द्वार पधारे
ऐ सखि साजन? ना सखि, पीहर!
नैन भरे जब, सूनी रातें
याद रहें वो, मीठी बातें
ख्वाब सताए, साँझ-सवेरे
ऐ सखि साजन? ना सखि, पीहर!
- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर (राजस्थान)

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