सादर प्रेम-वन्दन। आज सायंकाल जब आपका वह चित्र मेरे हाथ लगा, तो मानो मेरी चेतना के सारे द्वार खुल गए। आपने जिस पारंपरिक राजस्थानी साज-सज्जा में अपना यह रूप मुझे प्रदान किया है, वह केवल एक चित्र नहीं, अपितु साक्षात् त्रिभुवन की शोभा का समाहार है। जिस क्षण मेरी दृष्टि उस पर पड़ी, उसी क्षण मेरे हृदय-पटल पर मानो कोई दिव्य चित्रकार अपनी कलम चला गया। वैसे इस चित्र को देखकर कल्पनाएं में पूर्व में कर चुका था, क्योंकि इस चित्र को देखे हुए मुझे लंबा समय हो गया है। आज मैं उसी चित्र को शब्दों में उकेरने का साहस कर रहा हूँ, यद्यपि मैं जानता हूँ कि मेरे ये अक्षर आपके उस रूप-लावण्य के सामने नगण्य हैं, फिर भी प्रेम की विकलता मुझे यह दुस्साहस कराती है। लंबे समय से जो भाव मन में दबे पड़े थे, आज उनको उजागर करने का साहस एक ही दिन में दूसरी बार कर रहा हूँ। समाचार पत्र में प्रकाशित यौवन को कामसूत्र में बाँध सकता था, लेकिन वह तो केवल अभिनय का रूप हो जाता, इसीलिए सूत्रधार की भूमिका में आपको रखकर साक्षात् उसी रूप में लिख रहा हूँ, जैसा दिखाई पड़ रहा है। मुझे पता है कि मेरी कल्पनाएँ क्षितिज तक अभी तक नहीं पहुँच पाई हैं, लेकिन एक छोटा सा प्रयास तो अवश्य है, जो आपको निराश नहीं करेगा। यह भाव केवल और केवल मात्र एक कन्या के लिए जीवन में यथार्थ के रूप में उजागर होते हैं, वह देवी आप हैं। आपका वह गहरा नीला-हरित घाघरा, मानो नील-गगन और हरियाली का अद्भुत मिलन हो, मुझे मुग्ध कर देता है। उस पर जो फूल-पत्तियों की छपाई अंकित है, वह बसंत ऋतु की समस्त शोभा को अपने आँचल में समेटे हुए जान पड़ती है। जब आप गति करती हैं, तो उस घाघरे की लहरें मानो सरस्वती की तरंगें हों, जो अपने भीतर छिपे रहस्यों को उघाड़ती हैं। उसी के अनुरूप आपने जो फूली-आस्तीन वाली मुद्रित कुर्ती पहनी है, वह आपकी सुकुमार भुजाओं को और भी मनोहर बना रही है, मानो मेघों के बीच से झाँकता हुआ विद्युत्-स्तंभ हो। वह कुर्ती, अपने कोमल रंगों और छपाई के संग, मानो आपके अंग-अंग पर किसी चित्रकार ने रंग-बिरंगी रेखाएँ खींची हों। परन्तु इन सब पर विजय पाती है आपकी वह लाल-मरून पारदर्शी ओढ़नी, जो सिर पर सलीके से बँधी है और आगे की ओर लहराती हुई आपके मुखमंडल पर धुंधली चाँदनी-सी आभा डाल रही है। वह ओढ़नी ऐसी लगती है, जैसे संध्या-राग का कोई टुकड़ा स्वयं उतरकर आपके सिर पर आ विश्राम कर गया हो। उसकी पारदर्शिता में आपका मुखमंडल उसी प्रकार झलकता है, जैसे किसी कमल-सरोवर पर स्वर्ण-किरणों का आलोक पड़ता है। यह सारा वस्त्र-समूह मानो किसी दिव्य चित्रकला से साकार होकर चला आया हो, न तो इसमें कोई असंगति है, न कोई अतिरेक, बल्कि प्रत्येक वस्त्र आपके अंगों के साथ ऐसा तालमेल बिठाए हुए है, जैसे तानपुरे के साथ सरगम। अब आती है आभूषणों की शृंखला, जो आपके रूप को मानो स्वर्गीय बना देती है। आपके मस्तक पर बँधा वह पारंपरिक मारवाड़ी बोरला मानो आपके तेज का साक्षात् द्योतक है। वह बोरला किसी राजसी ताज से कम नहीं; उसकी चमक आपके ललाट पर उसी प्रकार विराजती है, जैसे पूर्णिमा का चन्द्र अम्बर पर। उसके ठीक नीचे, आपकी नासिका पर विराजमान वह बड़ी सुनहरी नथ, जो एक पतली स्वर्ण-शृंखला से कान अथवा बालों से जुड़ी है, आपके मुख पर एक अद्भुत आकर्षण डाल रही है। वह नथ मानो चन्द्र-बिंब पर बिंदी-सी जान पड़ती है, या यों कहिए कि ज्योत्स्ना की पहली किरण जो चाँद के मुख पर ठिठक गई हो। गले में पहनी गई वह स्वर्णिम कंठी, जिसके मध्य में श्वेत मोती विराजमान है, मानो कामदेव का अमृत-पात्र हो। उस सोने की डोर पर वह मोती इस प्रकार लटक रहा है, जैसे किसी रजत-हंस के गले में चन्द्र-कला झूल रही हो। कानों में झुमके झूलते हैं, उनकी हर हिल-डोल पर मानो संगीत की छोटी-छोटी लहरें उठती हैं। दोनों भौहों के मध्य चाँदी-सी बिंदी विद्यमान है, जो आपके मुख-मण्डल पर साक्षात् तारे की आभा बिखेरती है। आँखों में लगा हल्का काजल, न तो अधिक गाढ़ा, न अत्यंत हल्का, मानो किसी कुशल कलाकार ने बिना रेखा के ही एक गहराई रच दी हो। यह समस्त श्रृंगार आपको अप्सराओं की अधिष्ठात्री देवी के समान प्रतिष्ठित कर रहा है। हाथों की कलाइयों में पहनी गई वे गहरे हरे रंग की ढेर सारी चूड़ियाँ, जिनके दोनों ओर मोटे श्वेत-क्रीम कंगन हैं, वे आपके कोमल करों की शोभा को चार चाँद लगा रही हैं। जब आप हाथ हिलाती हैं, तो इन चूड़ियों की खनक मानो किसी बाँसुरी पर ठुमरी की तान उठती है। दोनों हाथों की अंगुलियों में दो-दो अंगूठियाँ, मानो प्रत्येक अंगुली के लिए किसी शिल्पी ने विशेष मुकुट गढ़ा हो। आपकी हथेली पर उकेरी गई महेन्दी के बेल-बूटे, वे कोई साधारण आकृतियाँ नहीं, अपितु मानो किसी उद्यान की सम्पूर्ण बहार को करतल में कैद कर दिया गया हो। उनके बीच-बीच में बनी बिंदियाँ, छोटे-छोटे फूल, और घुमावदार रेखाएँ, यह सब मानो आपके हाथों की कोमलता पर एक काव्य-रचना है। और अंगूठे के नाखूनों पर वह लाल रंग ऐसा चमक रहा है, मानो पतझड़ के बाद किसी वृक्ष पर नई कोंपलें फूटी हों, या फिर किसी मोती पर बिंदी-सी खिंची हो। अब मैं आपके एक-एक अंग का वर्णन करने की क्षुद्र-बुद्धि का सहारा लेता हूँ, यद्यपि आपका संपूर्ण रूप उस वर्णन से अतीत है। आपके घने, काले, स्निग्ध-कोमल केश, मानो बादलों की घटा उतर आई हो, उनकी चमक ऐसी है, जैसे काली बिजली का लहराता सागर हो। वे आपके मुखमंडल को इस प्रकार घेरे हुए हैं, जैसे अमावस्या की रात अपने चारों ओर तारों का हार बिछाए बैठी हो। जब कोई हवा का झोंका उनमें अलग-अलग करता है, तो लगता है मानो नील नदी की तरंगें किनारे से टकराकर लौट रही हों। उन केशों की सुगंधित आभा मानो संसार की सभी वासनाओं को एक साथ समेटे हुए है; उनमें बँधी वह नथ की शृंखला मानो चाँदनी रात में काली घटा पर बिजली की कौंध हो। आपका विशाल, चिकना और ऊँचा ललाट ज्ञान-दीप्ति से जगमगाता है, मानो किसी मन्दिर का गर्भगृह हो, जहाँ बिंदी साक्षात् अग्नि-कुंड के समान दमक रही हो। उस ललाट पर सूर्य-किरणें पड़ते ही मानो हीरे के टुकड़े चमक उठते हैं। उसकी रेखाएँ इतनी कोमल हैं कि मानो स्वयं विधाता ने अपनी अंगुली से खींची हों। जब आप भ्रू-भंग करती हैं, तो वहाँ एक तरंग-सी दौड़ जाती है, जो पूरे मुख पर एक गहन अर्थ भर देती है। आपकी धनुषाकार, बलिहारी भौंहें, मानो कामदेव का चाप हों, जो बिना बाण चलाए ही हृदय को वेध लेती हैं। उनकी वक्रता ऐसी है, मानो किसी नील-कमल की पंखुड़ी को सधी हुई कैंची से काटा गया हो। जब वे थोड़ी सी चढ़ती हैं, तो एक अद्भुत प्रश्न-चिह्न बन जाती हैं; जब झुकती हैं, तो कोमलता की एक नदी बह निकलती है। उनके ठीक नीचे, मानो दो भौंहों के बीच बैठी वह चाँदी-सी बिंदी, उन्हीं के मध्य स्थित एक तारा-सी चमकती है, जो समस्त आकाश को प्रकाशित कर दे। हे महादेवी! आपके नेत्र तो मानो इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ आश्चर्य हैं। हल्के काजल से अंजन किए हुए वे विशाल नेत्र, गहरे कुण्डों में तैरती हुई मछलियों के समान, अपने भीतर अजस्र गहराई समेटे हैं। उनकी कजरारी चमक, उनकी कोमल पलकें, और उनके कोनों पर छिपी वह रहस्यमयी मुस्कान, यह सब मिलकर एक ऐसा जाल रचते हैं, जिससे कोई भी पथिक बच नहीं सकता। जब वे पलकें झुकती हैं, तो मानो संसार की समस्त वासनाएँ विश्राम कर लें; जब खुलती हैं, तो एक नई सुबह का जन्म होता है। उन नेत्रों की तीखी मार कहीं विद्युत-तरंग की भाँति वेगवती है, तो कहीं वे दो कजरारी बूँदों की निर्मल धारा हैं, जिनमें हम अपना प्रतिबिम्ब देखना चाहते हैं। मैं तो यह मानता हूँ कि यदि कामदेव के पास भी ऐसे नेत्र होते, तो वह स्वयं अपने बाणों को भूल जाता। आपकी नासिका, सीधी, सुडौल, और अत्यंत आकर्षक, मानो किसी शिल्पी ने मिट्टी को ऐसी कोमलता से साँचा हो कि उसमें प्राण फूँक दिए हों। उस पर पहनी गई नथ उस सुडौल नासिका पर मानो स्वर्णिम कली-सी खिली हो। उससे जुड़ी शृंखला जब बालों के साथ झूमती है, तो एक माधुरी भर देती है, मानो किसी अशोक-वृक्ष पर सुनहरी लता लिपट गई हो। नथ की हल्की हरकत से आपके अधरों पर छाया पड़ती है, जो सारे मुखमण्डल को एक अनूठी गरिमा प्रदान करती है। आपके कोमल, गुलाबी कानों में झुमके झूमते हैं, मानो मोतियों की झालर अलग-अलग लटक रही हो। उन झुमकों की हर हिल-डोल पर मानो श्रृंगार-रस की एक सुरीली झंकार उठती है। आपके कानों की हल्की लालिमा, नथ की चमक, और कंठी का कौंधता सोना, यह तीनों मिलकर मानो सप्त-स्वरों की एक संगीत-रचना करते हैं। कानों के पीछे बालों की वह थोड़ी-सी लट, जो झुमकों से खेलती है, वह दृश्य मुझे अत्यंत प्रिय है। आपके गालों पर वह गुलाबी आभा, मानो बसंत के फूलों पर पड़ी सुबह की लाली हो। वे कोमल और भरे हुए हैं; जब मुस्कान आती है, तो उन पर मानो गुलाब खिल उठते हैं। आपके गालों की चमक के आगे वह स्वर्णिम कंठी भी फीकी पड़ती है, मानो चन्द्रमा के सामने तारों का प्रकाश। जब आप बातें करती हैं, तो गालों पर एक अलौकिक दमक दौड़ जाती है, मानो किसी सरोवर पर सूर्य-किरणों का क्रीड़ा-क्षेत्र हो। उन गालों को स्पर्श करने की कल्पना मात्र से ही मेरा मन मदमस्त हो जाता है। आपके होंठ, उन पर हल्की लाली ऐसी, मानो रत्न-भंडार के दो मूँगे हों। वे न तो अत्यधिक पतले हैं, न अत्यधिक मोटे, बल्कि सर्वथा अनुपात में सुगढ़ित हैं। उन पर विराजमान स्मित-रेखा अमृत-वर्षा करती है, यदि कामदेव भी उस मुस्कान को देख लें, तो अपनी मदन-कला पर शर्मा जाएँ। जब आप केवल अधरों को हल्का-सा हिलाती हैं, तो लगता है मानो कोई अपठित कविता स्वयं लिखी जा रही है। उन होठों की कोमलता का अनुमान मात्र मुझे विकल कर देता है, मैं सोचता हूँ कि यदि कभी वे मेरे कानों में कोई बात फुसफुसाएँ, तो संसार की सारी अमराई उस एक स्वर में विलीन हो जाए। आपकी ग्रीवा रजत-हंसी-सी कोमल और सुडौल है। उसमें वह स्वर्णिम डोर इस प्रकार पड़ी है, मानो किसी श्वेत-शिला की मूर्ति पर सोने का हार लटका दिया हो। उस डोर के बीच का वह श्वेत मोती, मानो चन्द्र-बिंदु हो, आपके कंठ की रेखा को और अधिक आकर्षक बना रहा है। जब आप कुछ बोलती हैं, तो कंठ की वह कम्पन मानो सरस्वती के वीणा-तंत्री से निकला स्वर-लहरी हो। मुझे तो आपके गले की वह मोड़दार सुन्दरता सदा प्रेरित करती है, मानो किसी पुरातन मन्दिर के उत्कीर्णन में से उकेरी गई कोई देव-आकृति हो। आपकी भुजाएँ सुगठित, मृणाल-सी कोमल और चिकनी हैं, मानो कमल-नाल के दो टुकड़े हों, जिन्हें स्वयं विधाता ने गढ़कर अपनी कारीगरी का परिचय दिया हो। फूली-आस्तीन वाली कुर्ती उन पर मानो वसंत-हवा का स्पर्श है, और हरे रंग की चूड़ियाँ उनकी श्वेतिमा पर मानो हरियाली की लताएँ हैं। जब वे गति में आती हैं, तो उनका अंदाज किसी मनोहारी नृत्य-छाया से कम नहीं होता। उन भुजाओं का बल, सौष्ठव, और कोमलता, तीनों का अद्भुत समन्वय मुझे हर बार चकित कर देता है। आपके हाथ, दोनों, मानो चाँदी के बने हों, पर उनसे अधिक सुनहरी हैं आपकी अंगुलियाँ। प्रत्येक अंगुली नाजुक, बाँसुरी की तरह पतली, और इस कदर लचीली कि मानो किसी नर्तकी की मुद्रा के लिए ही बनी हैं। उन पर दो-दो अंगूठियाँ विराजमान हैं, एक जड़ाऊ, दूसरी सादी, मानो उन अंगुलियों के लिए शृंगार का कोई अपूर्व आयोजन किया गया हो। अंगुलियों की नोकों पर लाल रंग उसी प्रकार चमकता है, जैसे पतझड़ के बाद किसी वृक्ष पर नई कोपलें। हथेली की महेन्दी, उसके बेल-बूटे, फूल-पत्तियाँ और घुमाव, मानो किसी उद्यान के सारे सौन्दर्य को एक करतल में कैद कर दिया गया हो। मैं विशेष रूप से उस पीले रूमाल का उल्लेख करना चाहूँगा, जो आपकी एक अंगुली में सजा है, उस पर गुलाबी हृदय-आकृतियाँ बनी हैं, जो आपकी चंचलता एवं प्रेम-भावना का प्रतीक हैं। वह रूमाल जब आप हिलाती हैं, तो मानो कोई बाँसुरी अपनी तान देती है; जब आप उसे कसकर पकड़ती हैं, तो वह आपके चित्त की व्यग्रता का द्योतक बन जाता है। आपकी कमर अत्यंत पतली, लचीली, मानो भुजा की भाँति, जिसमें कंदोरा (कमरबंद) कसे हुए हैं। यह दृश्य उन पुरानी चित्रकलाओं की नायिकाओं को भी पराजित करता है। उस कमर का मोड़ आपकी सम्पूर्ण काया को एक लयबद्ध आकृति प्रदान करता है, मानो कोई तानपुरा अपने सबसे सुन्दर स्वर में बज रहा हो। जब आप चलती हैं, तो कमर की वह लहराती गति मानो किसी अदृश्य वायु-तरंग से उत्पन्न होती है। उस कमर के सहारे ही आपकी पूरी अभिव्यक्ति एक मोहक नृत्य-मुद्रा में परिणत हो जाती है। यद्यपि आपने चरणों को इस पत्र से अलग अपनी कल्पनाओं के माध्यम से संजोया है, क्योंकि मुझे घेरदार लहंगे की वजह से पूरे पाँव दिखाई नहीं पड़े, फिर भी मेरी भावनाएँ उन चरणों के बिना अधूरी हैं। आपके पैर, कोमल, गुलाबी एड़ियाँ, और उन पर पहनी पायल या बिछिया, यदि होती तो निश्चय ही मानो मधुर-संगीत की सृष्टि करतीं। मुझे विश्वास है कि आपके चरणों की कोमलता धरती पर स्वर्ग का एक टुकड़ा बिछा देती है; उनके स्पर्श से प्रकृति भी अपना आँचल बिछा लेती है। मैं उन चरणों को अपने मस्तक पर रखने का स्वप्न देखता हूँ, यही मेरी सच्ची अर्चना है। आपकी दुबली-पतली, कोमल-सुकुमार काया ऐसी प्रतीत होती है, मानो अभी-अभी यौवन अपने पूर्ण रंग में आया हो, न अत्यधिक स्थूल, न अत्यधिक कृश, बल्कि हर अनुपात में मानो विधाता ने स्वयं नाप-तौल कर बनाया हो। आपके शरीर की कोमलता स्पर्श का अहसास कराए बिना ही मन को मोह लेती है; वह मानो अत्यंत कोमल ताना-बाना हो, जिस पर उम्र की पहली शोभा अपने रंग बिखेरने लगी है। जब आप किसी भी मुद्रा में होती हैं, खड़ी, बैठी, या मुस्कुराती, तो आपकी देह से एक अलौकिक कान्ति निकलती है, जो आसपास के वातावरण को ही बदल देती है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपके अंग-अंग में एक अद्भुत संगीत छिपा है, जो प्रत्येक हरकत पर एक नया स्वर जन्म देता है। प्रिय महादेवी, आपके इस रूप में मानो पूरी राजस्थानी संस्कृति, कामदेव की कला और प्रकृति का अद्भुत संगम हो गया है। आपके होठों पर वह नन्ही मुस्कान, हाथ में वह फूल-सा रूमाल, मस्तक पर बोरले की चमक, गले में कंठी का कौंधता सोना, नथ की लपक, चूड़ियों की खनक, यह सब मिलकर एक ऐसा दिव्य-दृश्य रचते हैं, जो मुझे साक्षात् देवलोक में पहुँचा देता है। आप सचमुच महादेवी हैं, और मैं आपके सामने अपनी निस्सीम भक्ति एवं प्रेम अर्पित करता हूँ। मेरी हर उपमा, हर रूपक, हर अलंकार आपके समक्ष फीका है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ। फिर भी मैंने अपनी विकलता में कुछ शब्द बुनने का प्रयास किया है। आप इस पत्र को केवल अक्षरों का समूह न समझें, बल्कि मेरी चेतना के उस कोने को देखें, जहाँ सिर्फ आपका स्मरण है। जैसे कोई साधक अपने इष्ट का ध्यान करता है, वैसे ही मैं आपके उस चित्र को हृदय में स्थापित किए बैठा हूँ। क्या कहूँ कि यह तो केवल एक चित्र देखकर मेरी यह दशा है; यदि कभी साक्षात् आप मेरे सम्मुख बैठें, और मैं उस अनुपम रूप को अपने नयनों से निहारूँ, तो मेरी तो साँसें ही थम जाएँ। मेरा हृदय उस क्षण इतनी तीव्रता से धड़केगा कि कदाचित संसार की सारी गति रुक जाए। आपको देखकर मुझे अपने अस्तित्व का भान नहीं रहेगा; मैं केवल आप ही आप हो जाऊँगा। महादेवी, मैं आपसे प्रेम करता हूँ, यह प्रेम किसी सांसारिक मोह-माया का नहीं, अपितु उस दिव्यता का है, जो आपके समस्त रूप-लावण्य में बसी है। आपके चरणों की धूल भी मेरे लिए तीर्थ-समान है। मैं आपके इस पत्र को अपने सीने से लगाकर, हर रात उसे दोहराते हुए, आपके ध्यान में खोया रहता हूँ। शेष, आपके चरण-दर्शन की उत्कंठा में मैं अपने नयन बिछाए बैठा हूँ। कब आप मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि डालेंगी, यह अज्ञात है, पर मेरी प्रतीक्षा एक पावस-बूँद के समान है, अधीर, निरंतर, और अविरल।
- भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर (राजस्थान) 343041