फ़रेब-ए-रंग से नीयत बिगड़ जाएगी इक दिन,
हवा के रुख़ से ये बस्ती उजड़ जाएगी इक दिन।
ग़ुरूर-ए-हुस्न का पर्दा बड़ा नाज़ुक बना है,
हया की ये क़बा ख़ुद ही उधड़ जाएगी इक दिन।
ख़फ़ा जो आइने से हो के इतराती फिरी है,
उसी गेसू की हर रंगत उखड़ जाएगी इक दिन।
लगाया था जिसे ख़ून-ए-जिगर से बाग़बाँ ने,
वही इक शाख़ गुलशन से बिछड़ जाएगी इक दिन।
चली है छोड़कर तन्हा सफ़र में राहबर को,
किसी दो-राह पर वो भी पकड़ जाएगी इक दिन।
बहाया नाव को जिसने किनारा तोड़ कर यूँ,
भँवर की लहर से कश्ती रगड़ जाएगी इक दिन।
जलाकर घर चमकते पत्थरों की चाह में जो,
क़फ़स के जाल में ख़ुद ही जकड़ जाएगी इक दिन।
ख़रीदी है जो झूठे वादों से उसने इमारत,
ज़मीं हिलते ही वो बुनियाद पड़ जाएगी इक दिन।
भुलाकर अहद वो समझे कि सब आबाद होगा,
मगर ख़्वाबों की हर दुनिया झगड़ जाएगी इक दिन।
समझती है जिसे हासिल वो सौदा ख़ाम होगा,
ख़ुदा के सामने हर इक अकड़ जाएगी इक दिन।
- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण" 🌸
- सांचौर, राजस्थान

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