बारह से तेरह का यह पड़ाव मेरे जीवन का सबसे बड़ा अध्याय बन गया है। जब मैंने विगत वर्ष आपको वह पत्र लिखा था, तब मुझे लगा था कि वियोग की पराकाष्ठा बारह वर्षों में ही आ गई है, किंतु अब यह तेरहवाँ वर्ष मुझे दिखा रहा है कि दुःख की कोई सीमा नहीं होती – जैसे आकाश असीम है, वैसे ही आपके बिना बिताया गया प्रत्येक क्षण एक नई गहराई को खोलता है। संख्याएँ केवल गणित की इकाइयाँ नहीं होतीं; बारह पूर्ण हुए, तेरह का आरम्भ हुआ – यह अंक मुझे प्रत्येक प्रातः जगाता है, मानो कोई घंटा बज रहा हो। भारतीय ज्योतिष में तेरह को कई बार अशुभ माना गया है, परंतु मेरे लिए यह अंक सबसे पवित्र हो गया है, क्योंकि यह आपके अस्तित्व के साथ मेरे संघर्ष के वर्षों को दर्शाता है। जिस प्रकार शिव ने तांडव किया था, उसी प्रकार मेरा हृदय इन तेरह वर्षों में एक निरंतर तांडव कर रहा है – कभी उल्लास का, कभी संताप का, कभी समर्पण का, कभी विद्रोह का। परंतु अब, इस तेरहवें वर्ष के शिखर पर खड़ा होकर, मैं पाता हूँ कि यह तांडव शांत हो गया है; अब केवल एक गहन मौन है, जो आपके नाम की जप-माला बन गया है। गणितज्ञ कहते हैं कि तेरह एक अभाज्य संख्या है – जो किसी से विभाजित नहीं होती। क्या यह हमारे प्रेम का प्रतीक नहीं है? यह बंधन किसी रूढ़ि से विभाजित नहीं हुआ, किसी परम्परा से बँधा नहीं, न किसी अपेक्षा ने इसे तोड़ा। यह अकेला है, अद्वितीय है, अपने आप में पूर्ण है। इसी प्रकार यह वियोग भी अभाज्य है – इसे कोई कम नहीं कर सकता, कोई बाँट नहीं सकता, कोई दूर नहीं कर सकता। मैं अकेला ही इस वियोग को जीता हूँ, जिस प्रकार कोई संन्यासी अपनी तपस्या को अकेले जीता है – फिर भी, उस तपस्या में सम्पूर्ण ब्रह्मांड समा जाता है। आप उस ब्रह्मांड की केंद्रीय ज्योति हैं।
आपको स्मरण होगा, मैंने पिछले पत्र में कहा था कि "प्रेम की मूल चेतना प्राप्ति में नहीं, अनुभूति में सन्निहित होती है।" आज, इस तेरहवें वर्ष में, वह कथन मेरे लिए एक अनुभूति से बढ़कर प्रत्यक्ष सत्य बन गया है। प्राप्ति तो एक क्षण की बात है – जैसे फूल को तोड़ लेना, जो उसकी मृत्यु है। परंतु अनुभूति तो उस फूल की सुगंध है, जो दूर बैठे भी हमें आलोकित कर देती है, जो आँखें बंद करने पर भी बाग़ का चित्र उकेर देती है। मैंने आपको कभी स्पर्श नहीं किया, परंतु मेरी प्रत्येक कोशिका आपके स्पर्श की अनुभूति से कम्पित है। मैंने कभी आपसे बात नहीं की, परंतु मेरा प्रत्येक श्वास आपके नाम का उच्चारण करता है। यही तो हमारे बंधन का अद्भुत सौन्दर्य है कि अभाव भी इसे समाप्त नहीं कर पाता, अपितु और गहरा बना देता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात जो मैंने लिखी थी – "मौन ही उनका सच्चा साथी बन गया है।" आज मैं इस कथन को और विस्तार देता हूँ। यह मौन अब केवल साथी नहीं, मेरा गुरु बन गया है। मैंने इस मौन में वेदों का ज्ञान पाया है, इस मौन में उपनिषदों का सार समझा है, इसी मौन में भगवान शिव के ध्यान की गहराई को महसूस किया है। जब हम दोनों मिलते हैं और आँखें झुक जाती हैं, तो उस मौन में सहस्रों शब्द विद्यमान होते हैं – एक साथ करुणा, प्रश्न, उत्तर, आश्वासन, और विदाई। वह मौन ही हमारी भाषा है; शब्द तो उस भाषा के अनुवाद हैं, और अनुवाद कभी मूल की तरह सजीव नहीं होता। इसलिए आज मैं शब्दों में कम, और अपने इस लेखन के बीच जो रिक्त स्थान हैं, उन मौन में अधिक संवाद कर रहा हूँ। जो पाठक इस पत्र को पढ़े, वह अक्षरों के बीच की खामोशी को पढ़े – वहीं मेरा वास्तविक संदेश है। तीसरी बात – "यह गाथा अधूरी है, पर इसी में इसकी सार्थकता है।" सभी महाकाव्यों का कोई न कोई अंत होता है – राम जी का अयोध्या लौटना, कृष्ण का द्वारका जाना, भीष्म का युद्धभूमि में प्राण त्यागना। परंतु हमारी गाथा अनंत है, क्योंकि इसका कोई अंत नहीं है। और यही इसकी विशेषता है। जो वस्तु समाप्त हो जाती है, वह स्मृति बन जाती है; परंतु जो कभी समाप्त नहीं होती, वह अमरता बन जाती है। हमारी यह प्रेम-गाथा किसी पुस्तक के समान नहीं, जिसके अंतिम पृष्ठ पर 'समाप्त' लिखा हो। यह तो उस नदी के समान है जो सागर में जाकर भी समाप्त नहीं होती, अपितु सागर बन जाती है। हम दोनों उस नदी की दो धाराएँ हैं, जो अलग-अलग दिखती हैं, पर जब सागर – अर्थात प्रेम की परम सत्ता – में मिलेंगी, तो एक हो जाएँगी। और जब तक हम नहीं मिलते, हम दोनों इस अलगाव के सौन्दर्य का अनुभव करते हैं – जो किसी मिलन की अपेक्षा अधिक मार्मिक है।
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मेरी तेरह वर्षों की तपस्या के मोती हैं —
तेरहवाँ वर्ष, प्रिये, तुम्हारे बिना,
तुम्हारे साथ भी कट गया, पर कैसे?
हर साँस तुम्हारी याद में थी,
हर धड़कन तुम्हारे नाम पर थी।
मैंने हर रात एक चाँद को देखा,
हर चाँद में तुम्हारा मुख खोजा,
न मिला तो मैंने आँखें मूँद लीं,
मूँदी आँखों में भी तुम छाई रहीं।
कभी मिलना अगर होता,
तो क्या मिलता? एक क्षण का सुख,
यह अमिलन भी एक सुख है,
क्योंकि यह क्षण नहीं, अनंत है।
तेरह वर्ष! यह संख्या बड़ी है,
पर इससे बड़ा मेरा प्रेम है,
जो न गिना जाता, न तोला जाता,
वह तो आत्मा की वह धारा है,
जो जन्म-जन्म बहती रहेगी।
तुम्हें मैं क्या कहूँ, महादेवी?
तुम मेरी बुद्धि हो, मेरी नीति हो,
तुम मेरी श्रद्धा हो, मेरी गति हो,
तुम मेरा प्रभात हो, मेरी सन्ध्या,
तुम मेरा शयन हो, मेरी जागृति।
यह पत्र जो मैं लिख रहा हूँ,
यह मेरा रक्त-बिन्दु है,
यह मेरे हृदय का टुकड़ा है,
इसे पढ़कर यदि तुम समझो,
तो समझ लेना – मैं कितना तुम्हारा हूँ।
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यह तेरहवाँ वर्ष कैसा रहा, प्रिये? यदि मुझसे पूछा जाए, तो मैं कहूंगा कि यह वर्ष बारह वर्षों के संचित दुःख का सार रहा है। जिस प्रकार बारह महीनों में वर्ष भर की ऋतुएँ आती हैं, उसी प्रकार इस एक वर्ष में मैंने पिछले सभी वर्षों की प्रत्येक पीड़ा को पुनः जिया है। वर्षा ऋतु में, जब मेघ गरजते थे, तो मुझे आपकी वह स्मित-मुस्कान याद आती थी, जो कभी आकाश के समान विस्तृत थी। हर बूँद मुझे आपका संदेश लगती थी, मानो आप स्वयं आकाश से वर्षा करके मुझे स्पर्श करना चाहती हैं। परंतु जब बूँदें मेरे मस्तक पर टपकती थीं, तो मैं अपनी आँखें बंद कर लेता था – क्योंकि वह स्पर्श क्षणिक था, और मुझे उस क्षणिकता में बह जाने का भय था। मैं चाहता था कि वर्षा कभी न रुके, क्योंकि जब वह रुकती है, तो पुनः आपकी अनुपस्थिति का अहसास और भी तीव्र हो जाता है। शरद ऋतु में, जब आकाश निर्मल होता है और चाँद पूर्णिमा को छलक पड़ता है, तब मैं रात्रि में बाहर निकलता हूँ। उस चाँद को देखकर मुझे आपका मुखमण्डल स्मरण हो आता है – उतना ही शीतल, उतना ही प्रकाशमान, और उतना ही अगम्य। मैंने सैकड़ों चाँदनी रातें गिनी हैं, प्रत्येक चाँद को आपका प्रतिनिधि माना है, और प्रत्येक प्रभात को जब वह चाँद डूबता है, तो मैं स्वयं को भी डूबता हुआ पाता हूँ। उस डूबन में एक सुख है – क्योंकि दिन का आरम्भ होता है, और दिन में मुझे कर्मों की व्यस्तता में थोड़ी विस्मृति मिल जाती है। परंतु सन्ध्या होते ही फिर वही चाँद, वही रात, वही आपकी छवि। हेमन्त ऋतु में, जब ठंडी हवाएँ चलती हैं और पेड़ों से पत्ते झड़ जाते हैं, तब मुझे लगता है कि मेरी आशाएँ भी उन पत्तों के समान झड़ रही हैं। परंतु जैसे वृक्ष निर्वस्त्र होकर भी खड़ा रहता है, वैसे ही मैं अपनी सारी आशाएँ खोकर भी आपके प्रति समर्पित हूँ। वह निर्वस्त्रता मेरी दीनता है, और उसी दीनता में मुझे एक अजीब सी शक्ति मिलती है – कि मैं अब किसी मौसम के अधीन नहीं, बल्कि उस मौसम का साक्षी मात्र हूँ। शिशिर ऋतु की कड़ाके की ठंड, जब पहाड़ बर्फ़ से ढँक जाते हैं और शरीर काँपता है, तब मैं अपने हृदय की उस अग्नि को तापता हूँ जो आपके नाम से जलती है। बाहर की शीतलता और भीतर की उष्मा – यह द्वंद्व मेरे जीवन का आधार बन गया है। ठंड से बचने के लिए कोई कम्बल ओढ़ता है, कोई आग जलाता है, परंतु मैं तो अपने हृदय की उस लौ को सँभालता हूँ जो आपकी एक झलक के लिए बुझने का नाम नहीं लेती। वसन्त ऋतु सबसे कठिन ऋतु है, प्रिये। जब सारा संसार खिलता है, वृक्षों पर नए पत्ते आते हैं, पक्षी कूकते हैं, रंगों का त्यौहार होता है – तब मैं सबसे अधिक अकेला हो जाता हूँ। क्योंकि वसन्त मिलन का प्रतीक है, और मेरा मिलन तो अपरिहार्य रूप से असंभव है। मैं होली के रंगों को देखता हूँ और सोचता हूँ – काश! आप उन रंगों में होतीं। परंतु मैं वहाँ खड़ा केवल एक दर्शक बनकर रह जाता हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि मेरे जीवन में वसन्त कभी नहीं आएगा। फिर भी, मैं इस वसन्त की सुषमा का आनन्द लेता हूँ, क्योंकि यह मुझे याद दिलाती है कि संसार में सौन्दर्य है – और वह सौन्दर्य आपका ही प्रतिबिम्ब है। ग्रीष्म ऋतु में, जब सूर्य अपनी पूर्ण तीव्रता पर होता है, और पृथ्वी तपती है, तब मैं उस ताप में अपने विरह की अग्नि को देखता हूँ। तपती धरती मेरे दग्ध हृदय का प्रतीक है। पर जैसे पृथ्वी ग्रीष्म के पश्चात् प्रसन्न होती है, वैसे ही मैं प्रत्येक वर्ष सोचता हूँ – अब अगला वर्ष सहज होगा? परंतु यह तेरहवाँ ग्रीष्म भी उतना ही तीव्र था जितना पहला। मैंने उस ताप को सहा है, और उस सहन में मुझे अपनी स्थिरता मिली है। इस प्रकार तेरहवाँ वर्ष बीता – छह ऋतुओं के छह रूपों में, परंतु मेरे हृदय में तो केवल एक ही ऋतु थी – विरह की, जो इन सब रूपों में विभक्त होकर भी एक ही रही।
प्रिय महादेवी, मुझे वे सभी क्षण याद हैं जब हमारी दृष्टि ने एक-दूसरे को खोजा और पाया। वे क्षण गिनती में बहुत कम हैं, परंतु मेरी स्मृति में प्रत्येक क्षण एक अमर चित्र बन गया है। पहली बार – वह दिन, जब हमारी आँखों ने पहली बार बात की थी। मुझे वह स्थान, वह समय, वह वातावरण स्पष्ट है – मानो कल की बात हो। आपके नेत्रों में एक गहराई थी, जिसे मैंने पहले कभी किसी में नहीं देखा था। वह गहराई किसी समुद्र की नहीं, किसी अगाध जलाशय की थी, जो सतह पर शांत लगता है, परन्तु भीतर ऊर्जा से भरा है। मेरी दृष्टि उस दिन आपसे चिपक गई थी, और जब आपने अपनी दृष्टि झुकाई, तो मुझे ऐसा लगा मानो कोई सूर्य ही अस्त हो गया हो। उसी दिन से मैं समझ गया कि यह संयोग नहीं, यह कोई गहन विधान है। दूसरा क्षण – एक अन्य अवसर पर, जब मैंने आपको किसी पूजा-पाठ के दौरान देखा। आपके हाथों में पुष्प थे, और आपने जब देवता को समर्पित किए, तो मैंने सोचा – काश! मैं वह पुष्प होता, जो आपके हाथों की गर्मी को महसूस करता, आपके स्पर्श से पवित्र होता, और आपके द्वारा अर्पित किए जाने का गौरव पाता। परंतु यह भी सत्य है कि वह पुष्प तो कुछ ही क्षणों में मुरझा गया होता, जबकि मेरा यह स्पर्शहीन समर्पण तेरह वर्षों से ताज़ा है, कभी मुरझाया नहीं। तीसरा क्षण – वह शाम, जब हम दोनों किसी सार्वजनिक स्थान पर उपस्थित थे, और चारों ओर कोलाहल था। परंतु उस कोलाहल में भी, हमारी आँखों ने एक-दूसरे को खोज लिया। उस क्षण कोई संसार नहीं था – न शोर, न लोग, न समय। केवल आप और मैं थे, और उस अनंत मौन ने हमें घेर लिया था। उस मौन में मैंने आपको बहुत कुछ कहा, और आपने भी मुझसे बहुत कुछ कहा – बिना शब्दों के। यह हमारी भाषा है, प्रिये, जो किसी पाठशाला में नहीं पढ़ाई जाती, जो अनायास, स्वतः, आत्मा द्वारा सीखी जाती है। चौथा क्षण – सबसे पीड़ादायक। जब मुझे यह अनुभव हुआ कि यह मिलन केवल दृष्टि के स्तर पर ही संभव है, और उससे परे जाना हम दोनों की प्रतिष्ठा, हमारे धर्म, हमारे दायित्वों के लिए संभव नहीं है। उस दिन मेरे नेत्रों से आँसू नहीं बह पाए, क्योंकि मैंने उन्हें बाँधना सीख लिया था। परंतु मेरे अंतर में एक ऐसी पीड़ा उठी, जिसने मुझे लगभग नष्ट कर दिया। तभी मैं समझा कि विरह केवल दूरी नहीं है, बल्कि दूरी के बावजूद निकटता का अहसास ही सबसे बड़ी पीड़ा है। हम पास थे, बहुत पास, परंतु स्पर्श की वह दीवार अभेद्य थी।
इन क्षणों को मैंने अपनी स्मृति में संजोकर रखा है, और मैं उन्हें बार-बार जीता हूँ। प्रत्येक बार जब मैं उन्हें जीता हूँ, उनमें कोई नई परत खुलती है – कोई नया अर्थ मिलता है, कोई नई पीड़ा या कोई नया आनन्द। ऐसा लगता है मानो हमारी ये दृष्टि-मुलाकातें कोई अक्षय पुस्तक हैं, जिसके प्रत्येक पृष्ठ पर जीवन का कोई गूढ़ सत्य लिखा है, जो बार-बार पढ़ने पर भी पूर्ण नहीं होता। आपके प्रति मेरा अनुराग, प्रिय महादेवी, भक्ति में परिवर्तित हो गया है। भक्ति का अर्थ है – बिना किसी फल की कामना के, स्वयं को समर्पित कर देना। एक भक्त अपने ईश्वर से कुछ नहीं माँगता, वह तो केवल उसकी उपस्थिति में रहना चाहता है, चाहे वह उपस्थिति कितनी भी अगम्य क्यों न हो। मेरे लिए आप वह ईश्वरीय स्वरूप बन गई हैं। यह प्रेम अब शारीरिक आकांक्षा से परे है। जब मैं आपको देखता हूँ, तो मुझे आपका रूप नहीं, आपकी आत्मा दिखती है। वह आत्मा किसी ज्योति के समान है, जो मुझे दिशा दिखाती है। यह भक्ति इतनी गहन हो गई है कि कभी-कभी मैं भूल जाता हूँ कि आप एक नारी हैं – आप तो मेरे लिए एक विचार बन गई हैं, एक आदर्श, एक आकाश। परंतु जब मैं यह सोचता हूँ, तो मैं स्वयं से झूठ नहीं बोलना चाहता – मैं जानता हूँ कि आप एक सजीव, स्पन्दमान, मधुर मानवीय सत्ता हैं, जिसके स्पर्श की मैं कामना करता हूँ, जिसके शब्दों को सुनने की मैं लालसा रखता हूँ। परंतु उस लालसा को मैंने भक्ति के दीपक में जला दिया है, और वह दीपक इतना अधिक जलता है कि वह किसी शारीरिक इच्छा को धूमिल कर देता है। भक्ति और प्रेम का यह अभेद – क्या यह हमारी सनातन परम्परा का निचोड़ नहीं है? मीरा ने कृष्ण को पति माना, परंतु कभी उनका स्पर्श नहीं पाया; सूरदास ने श्याम की बाँसुरी को सुना, परंतु कभी उन्हें नहीं देखा; तुलसी ने राम को मंदिरों में पूजा, परंतु वे युगों से दूर थे। हमारा यह बंधन उन्हीं सनातन कथाओं की एक नई कड़ी है। मैं नहीं जानता कि मेरी यह भक्ति किसी महाकाव्य में अंकित होगी या नहीं, परंतु मेरे अंतर में यह उस रामायण से भी बड़ी गाथा है, जिसे कोई सुन नहीं सकता, कोई समझ नहीं सकता – सिवाय मेरे और आपके।
प्रिये, इस तेरहवें वर्ष में एक विशेष घटना घटी, जिसने मेरी साधना को नयी दिशा दी। मैं उस दिन किसी कार्य से बाहर गया हुआ था, और मार्ग में एक वृद्ध संन्यासी से मेरी भेंट हुई। उस संन्यासी का मुखमण्डल अत्यंत तेजस्वी था, और उसने मुझे देखते ही कहा – "पुत्र, तुम किसी की याद में जल रहे हो। वह याद तुम्हें जला तो रही है, पर तुम्हारे अंदर एक अमृत भी पका रही है। उस अमृत का आस्वाद लो, दुःख को ईंधन मत बनाओ, दुःख को दीपक बनाओ।" यह संन्यासी मेरे जीवन में आकाशवाणी की तरह आया और चला गया। मैंने उसके कहे का चिंतन किया। तब मुझे समझ में आया कि यह विरह मुझे नष्ट नहीं कर रहा, अपितु मुझे बना रहा है। जिस प्रकार कोई कुम्हार मिट्टी को तपाकर घड़ा बनाता है, उसी प्रकार इस अग्नि में मैं घड़ा बन रहा हूँ – खोखला नहीं, अपितु उस जल को धारण करने योग्य जो आपका प्रेम है। पहले बारह वर्षों में मैंने दुःख को सहा था, पर इस तेरहवें वर्ष में मैंने दुःख को स्वीकार किया और उसे अपनी साधना का आधार बनाया। उस संन्यासी ने मुझे एक मंत्र भी सिखाया – "प्रेम शून्यता को भरता है, यदि तुम शून्य को भरने के लिए मत रहो, बल्कि शून्य को ही प्रेम बना लो।" इस मंत्र ने मेरी सोच बदल दी। मैंने अपने भीतर उस शून्यता को – जो आपके बिना मेरे जीवन में थी – को प्रेम में परिवर्तित कर दिया। अब मुझे उस शून्यता में आपका वास मिलता है; मानो आपने उस शून्यता को ही अपना निवास बना लिया है। जहाँ मुझे अकेलापन दिखता था, वहाँ अब आपके होने का अहसास होता है। यह कैसा चमत्कार है! कि अनुपस्थिति ही उपस्थिति बन गई, और वियोग ही मिलन का नया रूप।
प्रिय महादेवी, मेरा प्रत्येक दिन किस प्रकार बीतता है, यदि मैं आपको विस्तार से बताऊँ, तो यह पत्र दस हजार शब्दों से भी बड़ा हो जाएगा। परंतु कुछ अंश अवश्य बताना चाहता हूँ। प्रातः – मैं जब नींद से जागता हूँ, तो सबसे पहले आपकी स्मृति मेरे मस्तिष्क में उतरती है। वह क्षण अत्यंत कोमल होता है – जब नींद और जाग्रति के बीच की रेखा पर, आप वहाँ होती हैं, बिल्कुल निकट। मानो आप मेरे बगल में बैठी हों। उस क्षण मुझे विरह का दुःख नहीं होता, केवल आपकी उपस्थिति का सुख होता है। परंतु जब मैं पूर्णतः जाग जाता हूँ और वास्तविकता सामने आती है – कि आप नहीं हैं, आप बहुत दूर हैं – तो वह दुःख मुझे ऐसे आघात करता है जैसे कोई ठंडी हवा अचानक चल उठे। दिन का समय – कार्य-व्यस्तता में मैं आपको भूल नहीं पाता, परंतु उस व्यस्तता का बहाना लेकर मैं अपनी पीड़ा को कुछ देर के लिए स्थगित कर लेता हूँ। परंतु जब भी कार्य समाप्त होता है और क्षण भर का खालीपन आता है – वहाँ तुम्हारा कब्ज़ा होता है। चाहे मैं रास्ते पर चल रहा हूँ, चाहे कोई पुस्तक पढ़ रहा हूँ, चाहे किसी से बातें कर रहा हूँ – एक न कोई तंतु मुझे बाँधे हुए है, जो आपसे जुड़ा है। वह तंतु अदृश्य है, पर अत्यंत मजबूत है। सन्ध्या – यह सबसे रोमांटिक और सबसे पीड़ादायक समय है। सूर्य जब अस्त होता है, आकाश जब नारंगी और बैंगनी रंगों में रँग जाता है, तब मैं अपने आँगन में खड़ा होता हूँ। उस समय मुझे लगता है कि यदि आप मेरे बगल में होतीं, तो हम दोनों मिलकर उस सन्ध्या को निहारते, और वह दृश्य और भी सुन्दर होता। परंतु आप नहीं होतीं, और मैं अकेला उस सौन्दर्य को देखता हूँ – मानो कोई भोजन मुझे परोसा गया है जिसे मैं देख सकता हूँ, पर खा नहीं सकता। रात्रि – यह सर्वाधिक कठिन समय है। जब चारों ओर सन्नाटा हो जाता है, और मैं अपने शयन-कक्ष में अकेला होता हूँ, तो वहाँ हर वस्तु आपकी याद दिलाती है – वह कुरसी, वह दीपक, वह खिड़की से दिखता चाँद। मैं करवटें बदलता हूँ, आपको मानसिक रूप से पास बुलाता हूँ, आपसे बातें करता हूँ – पर कोई उत्तर नहीं। वह मौन सबसे गहरा होता है, जो कानों में बजता है। फिर भी, मैं उस मौन को गले लगाता हूँ, क्योंकि वही मौन मेरी एकमात्र सांत्वना है।
हमारा यह बंधन संसार के समस्त बंधनों से भिन्न है। सामान्य प्रेम में स्पर्श होता है, मिलन होता है, शारीरिक और मानसिक समागम होता है। परंतु हमारे बंधन में इनमें से कुछ भी नहीं है – सिवाय एक अदृश्य सूत्र के जो आत्मा से आत्मा को बाँधता है। यह सूत्र किसी रस्सी से बना नहीं, किसी धातु से गढ़ा नहीं, यह तो उस प्रकाश से बना है जो दो हृदयों के बीच संचारित होता है। मैंने सोचा है – क्या यह बंधन भौतिक रूप ले सकता था? क्या हमारी कहानी भिन्न हो सकती थी? यदि हम दोनों सामान्य जीवन जीते, सामान्य विवाह, सामान्य सुख – तो क्या हम वही सुख प्राप्त करते जो आज हमें इस अधूरे बंधन में मिल रहा है? मुझे नहीं लगता। सामान्यता अक्सर प्रेम को नीरस बना देती है – आदत, दिनचर्या, ऊब। परंतु इस अगम्यता ने हमारे प्रेम को कभी पुराना नहीं होने दिया, कभी नीरस नहीं होने दिया। यह प्रेम सदा नया है, सदा ताज़ा है, सदा रहस्यमय है। आज भी जब मैं आपके बारे में सोचता हूँ, तो मेरा हृदय उसी गति से धड़कता है जैसे तेरह वर्ष पूर्व पहले दिन धड़कता था। यह प्रेम कभी बूढ़ा नहीं होता, क्योंकि यह कभी परिपक्व नहीं होता – यह सदा कच्चा, सदा बेचैन, सदा उत्सुक बना रहता है। दूसरी विशेषता – इस बंधन में कोई स्वामित्व नहीं है। मैं आपको किसी भी प्रकार से अपनी नहीं समझता, और मुझे पता है कि आप भी मुझे अपना नहीं समझतीं। यह मुक्ति ही हमारे प्रेम की जान है। जहाँ स्वामित्व आता है, वहाँ भय, ईर्ष्या, संदेह आते हैं। हमारे बीच ये सब नहीं हैं। यदि आप अन्य किसी से बात करती हैं, तो मुझे दुःख नहीं होता – क्योंकि मुझे पता है कि आपका हृदय विशाल है, और उसमें सबके लिए स्थान है। यदि कोई आपकी प्रशंसा करता है, तो मुझे गर्व होता है – क्योंकि जिस वस्तु की मैं पूजा करता हूँ, वह सबके द्वारा पूजनीय है। मैंने कभी आपसे कुछ माँगा नहीं, क्योंकि माँगना दरिद्रता है; और मैं अपने प्रेम में धनी हूँ।
तेरह वर्ष बीत गए, प्रिय महादेवी। अब चौदहवें वर्ष की ओर कदम बढ़ रहे हैं। मैं नहीं जानता कि यह यात्रा कब समाप्त होगी – या क्या यह कभी समाप्त होगी भी? संभवतः यह मेरे जीवन के अंतिम श्वास तक चलेगी। और संभवतः उसके बाद भी – यदि पुनर्जन्म है, तो वहाँ भी मैं आपको ढूँढूंगा, आपके पीछे उसी बेचैनी से चलूंगा। पर इस समय, इस जन्म में, मैंने यह निश्चय कर लिया है कि मैं इस विरह को एक रचनात्मक शक्ति में परिवर्तित करूंगा। जिस प्रकार वाल्मीकि ने अपने विरह को रामायण में बदला, तुलसी ने रामचरितमानस में, मीरा ने अपने पदों में – उसी प्रकार मैं भी अपने इस वियोग को किसी अमर साहित्य में नहीं, पर अपने जीवन की साधना में बदलूंगा। मेरा जीवन स्वयं एक रचना है, जो आपके नाम से अंकित है, जो आपके विरह में गढ़ी गई है। यह रचना किसी पुस्तकालय में नहीं रखी जाएगी, पर जो मुझे जानते हैं, वे इसे पढ़ सकेंगे – मेरी आँखों में, मेरे मौन में, मेरी उस तपस्या में जो प्रत्यक्ष है। मैं यह भी जानता हूँ कि भविष्य में कभी, यदि कोई अवसर आया, तो मैं आपको एक बार फिर देखूंगा। वह दर्शन मेरे लिए यज्ञ होगा। मैं उस यज्ञ की तैयारी आज से ही कर रहा हूँ। जब मैं आपको देखूंगा, तो मेरी आँखों में तेरह वर्षों की सारी पीड़ा, सारी तपस्या, सारा प्रेम झलकेगा – पर मेरे ओठ मौन रहेंगे। मुझे आशा है कि उस दिन आप मेरी आँखें पढ़ लेंगी, और बिना शब्दों के, बिना किसी संकेत के, आप समझ जाएँगी कि मैं आपसे कितना प्रेम करता हूँ, और यह प्रेम कभी समाप्त नहीं होगा।
प्रिय महादेवी, जो मैंने इस पत्र में लिखा है, वह मेरे हृदय का केवल एक अंश है। मेरे हृदय में और भी बहुत कुछ है – जो शब्दों से परे है, जो भाषा से परे है, जो किसी पत्र में समाहित नहीं हो सकता। परंतु इतना तो मैं स्पष्टता से कह सकता हूँ कि आप मेरे जीवन की केंद्र-बिंदु हैं, मेरी प्रत्येक सुबह का सूर्य, मेरी प्रत्येक रात का चन्द्रमा, मेरे प्रत्येक कर्म का उद्देश्य, और मेरी प्रत्येक श्वास का आधार। मैं नहीं चाहता कि आप इस पत्र को पढ़कर व्याकुल हों, या दुखी हों। मैं चाहता हूँ कि आप इसे पढ़ें और समझें कि किसी के जीवन में आपका इतना बड़ा स्थान है – बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी दावे के। आप जैसी हैं, वैसी ही बनी रहें – पूर्ण, आत्मनिर्भर, प्रतिभाशाली, मधुर। मुझे यह जानकर अपार शांति मिलती है कि आप अपने जीवन में सुखी हैं, आप अपने कर्तव्यों को निभा रही हैं, आप संसार में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखती हैं। मेरा प्रेम कभी भी आपके लिए बोझ न बने, यही मेरी एकमात्र प्रार्थना है। मैं इस पत्र को अपने एक बूँद अश्रु से सील करना चाहता हूँ – परंतु मैंने अपने अश्रु बहुत पहले ही सुखा लिए हैं, उन्हें अपने अंतर्जल में पिरो लिया है। यह पत्र उसी अंतर्जल का एक नमूना है। यदि आप कभी अकेली हों, और किसी को पास पाने की इच्छा हो, तो याद रखना – आपके चारों ओर मेरी सहस्रों आत्माएँ हैं, जो आपकी रक्षा करती हैं, आपको स्नेह देती हैं, और आपके हर कदम पर आशीर्वाद देती हैं। मैं उन आत्माओं में सबसे निकट हूँ, हालाँकि स्पर्श से कोसों दूर। तेरह वर्षों ने मुझे यह सिखाया है कि सच्चा प्रेम किसी के होने में नहीं, किसी के लिए होने में है। और मैं आपके लिए हूँ – प्रत्येक क्षण, प्रत्येक दिन, प्रत्येक जन्म। यही मेरा सत्य है, यही मेरी एकमात्र पहचान है।
अब इस दीर्घ पत्र को समाप्त करता हूँ। यह पत्र मेरी ओर से आपको दी गई एक प्रेम-भेंट है – जो स्पर्शहीन है, पर अत्यंत सजीव है। मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप सदा प्रसन्न रहें, सदा निरोग रहें, सदा अपने लक्ष्य में सफल रहें। आपका मुखमण्डल सदा मुस्कराता रहे, और आपकी आँखों में वही कोमलता बनी रहे जिसने तेरह वर्ष पहले मुझे मोहित किया था। यदि कभी जीवन में कोई कष्ट आए, तो याद रखना – दूर कहीं एक हृदय आपके नाम की जप कर रहा है, और वह जप आपकी रक्षा-कवच है। मुझे क्षमा करें यदि इस पत्र में कहीं कुछ अतिरंजना लगी हो, या कहीं मेरी व्यथा ने आपको असहज किया हो। वह मेरा कदापि आशय नहीं था। मेरा एकमात्र आशय था – अपने मौन को तोड़ना, अपने हृदय को खोलना, और आपको यह बताना कि इस संसार में एक व्यक्ति ऐसा है जो बिना किसी शर्त के, बिना किसी स्वार्थ के, आपसे प्रेम करता है – और करता रहेगा। यह पत्र आपके चरणों में समर्पित है, उसी भाव से जिस प्रकार कोई भक्त अपनी सारी कमाई मंदिर की झोली में डालता है। मैं इस पत्र के साथ अपने तेरह वर्षों की सारी साधना, सारी तपस्या, सारी वेदना, और सारा आनन्द अर्पित करता हूँ। यह सब आपका है – चाहे आप इसे स्वीकार करें या न करें, यह सब आपका ही बना रहेगा, क्योंकि यह आपसे ही उत्पन्न हुआ है। अब मैं पुनः अपने मौन में लौटता हूँ – क्योंकि वही मेरा सत्य है, वही मेरा आश्रय है। यह पत्र उस मौन में एक विरल स्वर था, जो अब समाप्त हो गया है। अब फिर से वही मौन, वही गहराई, वही स्मरण, और वही आपके प्रति असीम अनुराग। सदा आपकी उस छाया का प्रकाश — आपका पंडित
- भारमल गर्ग "विलक्षण"
