वे अंगन की सायंकाल, दुग्ध-जल की सुगंधित घूँट,
नीम छाया में विराजमान, करों में सूतकाटिनी।
शिशु को सुलाती लोरियों में, कथाओं का जादू समाया,
प्रत्येक शिकन में छिपा था, पुरातन इतिहास सजाया।
हथेली फैलाती थी जब, मधुरान्नों के आह्वान हेतु,
नयनों में चमक विद्यमान, तारकों की प्रभा समान।
चुंचु पानक की सुवास, ताप्त रोटिका का स्पर्श,
उनका स्नेह सुगंधित है, अब भी श्वासों में विद्यमान।
उपनेत्र के पार दृष्टि, सरस भाव से परिपूर्ण,
श्वेत उत्तरीय में लिपटी, देव प्रतिमा सी पवित्रा।
प्रत्येक उत्सव पर पूजा, प्रत्येक विपदा में सहारा,
उनकी मुसकान औषधि, प्रत्येक व्रण भर देती थी।
कैसे गूँथती थी स्वप्न, अपनी जादुई तंतु से,
कैसे सिखाती थी जीवन, सरल शब्दों के ग्रंथ से।
वह आसन अब रिक्त है, किंतु उपस्थिति गंभीर,
प्रत्येक पुरातन चित्र में, वे स्नेह की स्मृति हैं।
हे मातामही! तू नदी, जिसमें बहा मेरा बाल्यकाल,
तू वह वृद्ध वृक्ष, जिसकी जड़ों में मेरा वंश।
तू व्याप्त है मेरे रक्त में, प्रत्येक श्वास, प्रत्येक क्षण में,
तू अमर है मेरे अंतर में, मेरे प्राणों के प्रत्येक कण में।
- कवि भारमल गर्ग "विलक्षण"
नीमच्छायासमीपे सा, सायंकाले अङ्गणे शुभा ।
सुगन्धितं दुग्धजलं, करैः सूतकाटिनीम धृत्वा ॥
शिशुशयनाय लालन्याः, कथाजालं मनोहरम् ।
वलित्वचि प्रतिश्लोके, पुराणं इतिहासं स्मरामि ॥
प्रसारिता करतलं, मधुरान्नाय स्नेहभरा ।
तारकाभं नयनयोः, दीप्तं हासं च विभ्रती ॥
चुच्चुपानकसौरभ्यं, उष्णरोटिकस्पर्शनम् ।
तव प्रेमसुवासोऽद्य, मम श्वासेषु संस्थितम् ॥
उपनेत्रान्तरालस्था, दृष्टिः स्निग्धा करुणामयी ।
श्वेतोत्तरीयसंवीता, देवप्रतिमा पावनी ॥
उत्सवेषु पूजनीया, विपत्सु च शरणं मम ।
स्मितमेव महौषधं, येन व्रणाः प्रपूरिताः ॥
कथं स्वप्नान् अगूथ्नन्, मायातन्तुभिरादरात् ।
जीवनोपदेशं दद्यात्, सरलैः शब्दसूत्रकैः ॥
शून्यं तदासनमिदं, परं सान्निध्यमगाधकम् ।
पुरातनचित्रपटे, स्नेहस्मृतिर्लसति सा ॥
मातामहि! त्वमेव सिन्धुः, यस्मिन् बाल्यं प्रवाहितम् ।
वृद्धद्रुमोऽसि यस्यास्ते, मूलेषु मम वंशकम् ॥
रक्ते मम प्रवहसि, प्राणेषु कणेषु चासि ।
त्वममरा हृदये मे, नित्यं तिष्ठसि मातृवत् ॥

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