शनिवार, 7 जून 2025

तेरी स्मृति में तड़पता हूँ

रातें सूनी, नींद न आए,  
तेरी स्मृति में मन भटकाए।  
आँसू बहते, थमते ना,  
तेरे बिना जीवन सूना।  
तेरी स्मृति में तड़पता हूँ।  

पवन ठंडी, पर मन जलता,  
तेरे विरह में सब कुछ सूना।  
चाँदनी रात, पर अंधेरा,  
तेरे बिना सब व्यर्थ लगे।  
तेरी स्मृति में तड़पता हूँ।  

कब मिलोगे, प्रियतम मेरे,  
इस हृदय की पुकार सुनो।  
दूर रह कर, क्या तुम भी,  
मेरी तरह व्यथित हो।  
तेरी स्मृति में तड़पता हूँ।  

तेरी स्मृति में ही जी लूँगा,  
चाहे कितनी पीड़ा सहूँ।  
प्रेम तेरा है शक्ति मेरी,  
इसी से मैं जीवित रहूँ।  
तेरी स्मृति में तड़पता हूँ।  

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (३४३०४१)


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

शोध-प्रबन्ध : कामसूत्र के पृष्ठों में अंकित यौवन-सृजन -पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

(एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से) मैं नहीं, कोई वात्स्यायन बैठा है इस लेखनी के पार, शास्त्र के श्लोकों में टटोल रहा, रति-रहस्य का सार। यह यौवन न...