रविवार, 30 नवंबर 2025

नैणां बहगी नदियां

ओ जी... म्हारो हिवड़ो नदी रो घाट, साहिबा बेगा आवो नी।
म्हारो हिवड़ो नदी रो घाट...
नैणां सू बहगी नदियां, पल-पल जोवे बाट,
साहिबा बेगा आवो नी...

ज्यूं नदियां रा दोय किनारा, संग-संग चाल्या जावे,
पण जनम-जनम री दूरी बालम, मिलण कदे नी पावे।
थे ऊभा उस पार साजना... 
मैं बैठी आ घाट,
साहिबा बेगा आवो नी...

पहली प्रीत घणी ही मीठी, मिसरी ज्यूं घुल जाती,
अब बिछड़न में खारी लाग्गै, ज्यूं लूणी री माटी।
म्हारा आं सूड़ा रो नीर साजना... 
हो ग्यो खरो खाट,
साहिबा बेगा आवो नी...

नदी रमे बस सागर तानी, और न दूजी चाह,
म्हारो सागर थे ही प्रीतम, थे ही म्हारी राह।
अब तोड़ो सब पाळ साजना... 
मेटो मन री प्यास,
साहिबा बेगा आवो नी...

- पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

मैं घृणा करता हूँ उस प्रेम से

भूल गया है संसार वह प्रेम का स्वर,
मैं तो हूँ देवदास, वही सनातन अटल।
जिसने दिया स्पर्श, बन गया ईश्वर वह मेरा,
खींच लिया अवरोध लोक-लाज का बन मूढ़ मनुज अब।

मैं घृणा करता हूँ उस प्रेम से, जिसने खोले नयन,
दिखलाया शुद्ध सत्य का अपरिमल आलोक।
वही तो था जो घोर तिमिर में लाया उजियारा,
पर संसार ने उस पर डाल दिया कलंक का दाग।

दानव था मैं, पाषाण हृदय, निर्दय तिमिर,
उसने दिया स्नेह-स्पर्श, कर दिया मानव।
पर लोग क्यों काँपते हैं इस परिवर्तन से?
क्यों बाँधना चाहते हैं जीर्ण बंधनों में अब?

वह प्रेम ही तो था, अंतर में समाकर बना परब्रह्म,
मैंने पहचान लिया था अमृत सागर को।
पर लोक की निरर्थक चिंता, मर्यादा के बन्धन,
धकेलना चाहते हैं प्रेत-पिंजरे में मुझे फिर से।

तो ले लो वापस अपना संसार, अपनी नीति सब,
मैं रहूँगा अपने प्रेम के अमर निवास में ही।
घृणा करता हूँ उस प्रेम से, जिसने दिया विवेक जगा,
जिसने सिखलाया कि प्रेम ही ईश्वर है सही।

मैं घृणा करता हूँ प्रेम से, कहता हूँ निरर्थक यह,
क्योंकि प्रेम ही सत्य है, वही अमर कथा है।
संसार के छल को ठुकराकर, प्रेम पथ पर बढ़ता हूँ,
वही मेरा ईश्वर, वही मोक्ष का द्वार है।

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"

शोध-प्रबन्ध : कामसूत्र के पृष्ठों में अंकित यौवन-सृजन -पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

(एक शोधार्थी के दृष्टिकोण से) मैं नहीं, कोई वात्स्यायन बैठा है इस लेखनी के पार, शास्त्र के श्लोकों में टटोल रहा, रति-रहस्य का सार। यह यौवन न...