सोमवार, 2 जून 2025

विरहावली

घन घिर आयो मेघा, पिय बिन मोहि काहे रुलायो रे।  
नयन झरैं बरखा सी, तन-मन विरहिनी जलायो रे...

यमुना तट कदम्ब छाया, तुम्ह आशा लगाय बैठियो।  
घड़ी-घड़ी डोलत नैना, सखि! संगति साजन कह गयियो। 
चातक सी तरसत बैठी, बूँद-बूँद प्यास न बुझियो।  
नीर भरैं मेघ मधुरा, पर दुःख हिय हुलस न जायो रे...

बिजुरी कौं चमकत देखी, मन हूँ चमक उठ्यो अकासा।  
सोच्यो पिय आवैंगे अब, भयो भ्रम सकल उदासा।  
झूठन लाग्यो साँचो प्रीतम, बरसि गयो सब हँसि-हँसा।  
तूट गयो मन के तारा, बिन गावत बाँसुरी बाजो रे...
 
कमल खिले सर सरोवर में, पर नयन कमल मुरझायो।  
सुनत कोकिल की कूक सुनि, हिय कोक नाद सतायो।  
चन्दा चमक्यो घट घोर में, पर अँधियार मन छायो।  
जिन घड़ी बिछुरे वो साँझा, क्यों निसदिन सोच सतायो रे...

विरह विष बिन पिय पियाए, तन-मन व्याकुल होइहैं।  
राति अरु दिन एक समान है, नींद सुधि सब लोइहैं।  
पंथ निहारत बैठी द्वार पर, पाँव पथ में धुल रोइहैं।  
जीवन डोर टूटत जानत, पर धीरज धरम न खोइहै रे...

हे प्रभु! श्याम सँवरिया तू, इत कैसे अटकायो रे।  
ब्रज की गोपिका रोवत है, तू मथुरा मगन सुहायो रे।  
वंशी की तान सुनावत हो, पर विरहिनी के हिय दायो रे।  
जब लग नयन में नीर भरैं, तब लग तूझे पुकारो रे...

- पं. भारमल गर्ग "विलक्षण"
- सांचौर राजस्थान (343041)

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