शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

मौन के उस पार स्मृतियों का दूसरा किनारा

कुछ मौन ऐसे होते हैं जिनका जन्म किसी मनुष्य के भीतर नहीं, बल्कि समय की उन अदृश्य दरारों में हुआ होता है जहाँ स्मृतियाँ अपना पहला घर बनाती हैं। हम जीवन भर उन्हें अपनी चुप्पी समझते रहते हैं, जबकि वे हमारे जन्म से बहुत पहले पृथ्वी पर उतर चुके होते हैं। कोई उन्हें संध्या का दूसरा नाम कहता है, कोई प्रतीक्षा की अंतिम सीढ़ी और कोई नियति का सबसे शांत रूप; पर जिसने जीवन को केवल घटित होते हुए नहीं, भीतर उतरते हुए देखा हो, वह जानता है कि हर मौन के भीतर किसी अनकहे संवाद की अंतिम साँस अब भी जीवित रहती है। शब्दों का अंत जहाँ होता है, वहाँ से मौन का प्रदेश आरम्भ होता है, और उसी प्रदेश में मनुष्य पहली बार स्वयं से मिलता है।
मुझे हमेशा लगता रहा है कि मनुष्य का सबसे सच्चा परिचय उसका नाम नहीं, उसकी चुप्पी होती है। नाम तो संसार देता है, कुल-गोत्र देता है, परिवार देता है, पर चुप्पी जीवन देता है। नाम बदल जाने से बहुत कुछ नहीं बदलता, लेकिन जिस दिन किसी मनुष्य की चुप्पी बदल जाती है, उसी दिन उसके भीतर का पूरा आकाश दूसरी दिशा में घूमना आरम्भ कर देता है। उस परिवर्तन की कोई ध्वनि नहीं होती, कोई घोषणा नहीं होती, कोई साक्षी भी नहीं होता; केवल समय अपनी डायरी में एक अदृश्य पंक्ति और जोड़ देता है।
मैंने बहुत लोगों को बोलते हुए देखा है। अपने दुखों को शब्दों में ढालते हुए, अपनी पीड़ाओं को तर्कों में बदलते हुए और अपने आँसुओं को मुस्कानों के पीछे छिपाते हुए भी देखा है; किन्तु जो लोग सचमुच टूटे होते हैं, वे प्रायः बोलते नहीं। वे अपने दुःख को वैसे ही सँभालते हैं जैसे कोई माँ अपने बीमार बच्चे को पूरी रात गोद में लिए बैठी रहती है—बिना किसी शिकायत, बिना किसी शोर के। उन्हें पता होता है कि आवाज़ें केवल जागृत करती हैं, उपचार नहीं करतीं। दुःख को सबसे पहले मौन समझता है, शब्द तो उसके बहुत बाद में पहुँचते हैं।
एक दिन तुमने मुझसे पूछा था, "मनुष्य सबसे अधिक अकेला कब होता है?"
मैंने बहुत देर तक तुम्हारी आँखों में देखा था और उत्तर नहीं दिया। इसलिए नहीं कि मेरे पास उत्तर नहीं था, बल्कि इसलिए कि कुछ उत्तर वाक्यों में नहीं समाते। उन्हें जीना पड़ता है, सहना पड़ता है, वर्षों तक अपने भीतर ढोना पड़ता है। बाद में धीरे से मैंने कहा था—मनुष्य तब अकेला नहीं होता जब उसके पास कोई नहीं होता; वह तब अकेला होता है जब उसके भीतर जो घट रहा होता है, उसका साक्षी बनने वाला एक भी हृदय शेष नहीं बचता। उस दिन संसार भरा हुआ होने पर भी भीतर का आकाश उजाड़ हो जाता है।
तुम मुस्कुराई थीं, पर उस मुस्कान में उल्लास नहीं था। वह किसी लंबे संघर्ष के बाद बची हुई अंतिम रोशनी जैसी थी। मैंने उसी क्षण समझ लिया था कि कुछ लोग मुस्कुराते इसलिए नहीं कि वे प्रसन्न हैं, बल्कि इसलिए कि उनकी आँखें रोते-रोते थक चुकी होती हैं। संसार मुस्कानों की गिनती करता है, पर कोई यह नहीं पूछता कि उन्हें बचाए रखने की कीमत कितनी थी।
समय के विषय में लोगों की सबसे बड़ी भूल यह है कि वे उसे चोर समझते हैं। समय कुछ चुराता नहीं; वह केवल वही वापस लेता है जिसे हमने अपना समझ लेने की भूल की थी। हम घरों को अपना कहते हैं जबकि वे मिट्टी के हैं। हम शरीर को अपना कहते हैं जबकि वह ऋतुओं का है। हम संबंधों को अपना कहते हैं जबकि वे परिस्थितियों की धूप और छाँह से बने होते हैं। यहाँ तक कि स्मृतियाँ भी हमारी नहीं होतीं; वे समय की उधार दी हुई रोशनियाँ हैं, जिन्हें एक दिन लौट जाना होता है। मनुष्य का सबसे बड़ा दुःख खो देना नहीं है, बल्कि स्थायित्व का भ्रम पाल लेना है।
तुमने फिर पूछा था, "क्या सचमुच कुछ भी नहीं बचता?"
मैंने कहा था, "सब कुछ बचता है, केवल उसका रूप बदल जाता है।" प्रेम स्मृति बन जाता है, स्मृति प्रतीक्षा में बदल जाती है, प्रतीक्षा प्रार्थना बन जाती है और प्रार्थना अंततः उस मौन में विलीन हो जाती है जहाँ शब्द जाने से डरते हैं। जो लोग केवल परिणाम देखते हैं, उन्हें यह परिवर्तन दिखाई नहीं देता; जो लोग अनुभूति देखते हैं, वे जानते हैं कि जीवन में कुछ भी नष्ट नहीं होता, केवल अपनी आकृति बदलता रहता है।
प्रेम कभी प्राप्त नहीं किया जाता, प्रेम केवल घटित होता है। वह किसी निर्णय का परिणाम नहीं होता, न किसी योजना का। वह ठीक उसी प्रकार उतरता है जैसे वसंत बिना अनुमति वृक्षों पर हरियाली रख देता है, जैसे नदी अपने स्रोत से निकलते समय समुद्र का पता नहीं पूछती, जैसे पहली वर्षा सूखी धरती को यह बताए बिना भिगो देती है कि अगली ऋतु कब आएगी। प्रेम को दिशा से अधिक प्रवाह की चिंता होती है। जो लोग प्रेम का हिसाब रखते हैं, वे उसके अनुभव से वंचित रह जाते हैं।
संसार हमेशा पूछता है—मिला क्या? बचा क्या? अंत में तुम्हारे हाथ क्या आया? पर जीवन के सबसे बड़े उत्तर इन प्रश्नों में नहीं छिपे होते। असली प्रश्न यह है कि इस यात्रा ने तुम्हें कितना बदल दिया। क्या तुम्हारा हृदय पहले से अधिक विशाल हुआ? क्या तुमने किसी ऐसे व्यक्ति को क्षमा किया जिसने क्षमा माँगी भी नहीं? क्या तुमने अपने टूटने के बाद भी किसी और की आशा बचाए रखी? क्या तुमने किसी की विदाई के बाद भी प्रेम से घृणा करना नहीं सीखा? यदि इन प्रश्नों का उत्तर 'हाँ' है, तो समझ लेना कि तुम्हारी यात्रा व्यर्थ नहीं गई।
प्रकृति मनुष्य से अधिक ईमानदार है। किसी पुराने वृक्ष को ध्यान से देखना; उसकी सबसे गहरी दरारें वहीं मिलेंगी जहाँ कभी सबसे अधिक रस बहता था। पहाड़ अपनी टूटन नहीं छिपाते, नदियाँ अपनी थकान नहीं छिपातीं, आकाश अपने बादलों को नहीं छिपाता; केवल मनुष्य ही अपने घावों पर मुस्कानों का वस्त्र ओढ़ लेता है। धीरे-धीरे वह अभिनय इतना लंबा हो जाता है कि उसे स्वयं अपना वास्तविक चेहरा याद नहीं रहता। यही अभिनय उसकी सबसे बड़ी थकान बन जाता है।
मैंने ऐसे लोगों को देखा है जो वर्षों तक सबको हँसाते रहे, पर जब एक दिन उन्हें स्वयं हँसने की आवश्यकता पड़ी, तब उनके चेहरे को हँसना याद नहीं रहा। मैंने ऐसे लोगों को भी देखा है जो सबकी पीड़ा सुनते रहे, पर अपनी पीड़ा कहने का साहस कभी नहीं जुटा पाए। शायद मनुष्य का सबसे कठिन कार्य रोना नहीं, बल्कि किसी के सामने निस्संकोच रो सकना है। आँसू कमजोरी नहीं होते; वे उस विश्वास का प्रमाण होते हैं जिसके सामने आत्मा अपने सारे कवच उतार देती है।
उस दिन संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। आकाश में उड़ते पक्षियों का एक छोटा-सा झुंड अचानक दो दिशाओं में बँट गया। तुमने सहज ही कहा, "शायद उनका रास्ता अलग होगा।" मैंने उन उड़ते हुए पक्षियों को देर तक देखा और उत्तर दिया, "रास्ते कभी अलग नहीं होते, केवल यात्राएँ अलग हो जाती हैं। कुछ पंख दूर तक साथ उड़ते हैं, फिर हवा का एक अदृश्य निर्णय उन्हें अलग दिशाओं में ले जाता है। जो पीछे रह जाता है, वह आकाश को नहीं देखता; वह उस खाली जगह को देखता रहता है जहाँ कुछ क्षण पहले तक दूसरा पंख साथ था।"
तुमने मेरी ओर देखा, जैसे तुम्हें लगा हो कि मैं पक्षियों की नहीं, मनुष्यों की बात कर रहा हूँ। मैंने मुस्कुराकर कुछ नहीं कहा। जीवन की सबसे सच्ची बातें वही होती हैं जिन्हें समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
मनुष्य ईंटों और पत्थरों के घरों में कम रहता है, विश्वास के घरों में अधिक रहता है। जिस दिन किसी का विश्वास टूटता है, उसी दिन उसके भीतर का सबसे सुंदर घर ढह जाता है। उस ढहे हुए घर का मलबा बाहर दिखाई नहीं देता, पर वही मलबा वर्षों तक उसकी आवाज़, उसकी दृष्टि, उसके निर्णय और उसके प्रेम के बीच पड़ा रहता है। लोग कहते हैं—समय सब ठीक कर देता है। मुझे लगता है, समय कुछ भी ठीक नहीं करता; वह केवल हमें अपने टूटे हुए हिस्सों के साथ जीना सिखा देता है। कुछ दरारें भरती नहीं, वे प्रकाश के आने का मार्ग बन जाती हैं।
रात का सबसे गहरा अँधेरा वह नहीं होता जो आँखों के सामने उतरता है; वह होता है जो धीरे-धीरे मनुष्य की स्मृतियों में घुलने लगता है। बाहर का अँधेरा तो पहली किरण के साथ लौट जाता है, पर भीतर का अँधेरा कई बार वर्षों तक अपने जाने का रास्ता नहीं खोज पाता। वह किसी दुःख की तरह नहीं रहता, क्योंकि दुःख का अपना आकार होता है; वह किसी रिक्तता की तरह भी नहीं रहता, क्योंकि रिक्तता का भी एक किनारा होता है। वह धीरे-धीरे मनुष्य के स्वभाव में उतर जाता है और फिर उसके बोलने, मुस्कुराने, प्रतीक्षा करने, यहाँ तक कि प्रेम करने के ढंग तक को बदल देता है। संसार इसे परिपक्वता कहता है, जबकि कई बार यह केवल उन घावों का दूसरा नाम होता है जिन्हें समय ने भरने के बजाय मनुष्य की प्रकृति में मिला दिया।
मैंने बहुत देर से यह समझा कि स्मृतियाँ कभी पीछे नहीं रहतीं। वे हमारे साथ चलती हैं, बस इतना करती हैं कि अपना हाथ दिखाई नहीं देतीं। किसी पुराने गीत की एक धुन, किसी अपरिचित नगर की गली, किसी अनजान चेहरे की आँखें, किसी बरसाती दोपहर की मिट्टी की गंध—इतना भर पर्याप्त होता है और वे बिना दस्तक दिए हमारे सामने बैठ जाती हैं। तब समझ में आता है कि भूल जाना मनुष्य का गुण नहीं, केवल उसकी आवश्यकता है। जो सचमुच हमारे भीतर उतर चुका होता है, वह कभी जाता नहीं; वह केवल प्रतीक्षा करता है कि जीवन फिर किसी मोड़ पर उसी रंग की धूप बिछा दे।
एक वृद्ध से मेरी भेंट वर्षों पहले हुई थी। उसके हाथ कांपते थे, पर उसकी दृष्टि बिल्कुल स्थिर थी। उसने मुझसे कहा था, "बेटा, उम्र शरीर पर नहीं चढ़ती, वह सबसे पहले प्रतीक्षाओं पर चढ़ती है। एक समय आता है जब मनुष्य किसी के आने का इंतज़ार करना छोड़ देता है। उसी दिन वह बूढ़ा हो जाता है।" उस समय मैं उसकी बात पूरी तरह नहीं समझ पाया था। आज समझता हूँ कि सफ़ेद बाल वृद्धावस्था का प्रमाण नहीं होते; प्रतीक्षा का समाप्त हो जाना ही वास्तविक बुढ़ापा है।
तुमने एक दिन पूछा था, "क्या हर प्रतीक्षा का कोई अंत होता है?"
मैंने मुस्कुराकर कहा था, "नहीं, कुछ प्रतीक्षाएँ समाप्त नहीं होतीं; वे केवल अपना नाम बदल लेती हैं। जब मिलने की आशा चली जाती है, तब वही प्रतीक्षा स्मरण बन जाती है। जब स्मरण भी थक जाता है, तब वह प्रार्थना हो जाता है। और जब प्रार्थना भी शब्द खो देती है, तब वह मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा बन जाती है।"
तुम बहुत देर तक शांत रहीं। तुम्हारे चेहरे पर एक ऐसी स्वीकृति उतर आई थी जो हार की नहीं थी। वह उस व्यक्ति की स्वीकृति थी जिसने समझ लिया हो कि जीवन का प्रत्येक प्रश्न उत्तर पाने के लिए नहीं होता; कुछ प्रश्न केवल हमें भीतर तक बदल देने के लिए आते हैं।
मैंने अनेक बार देखा है कि लोग प्रेम के चले जाने का शोक मनाते हैं, पर बहुत कम लोग यह शोक मनाते हैं कि उनके भीतर विश्वास का एक प्रदेश सूख गया। प्रेम का न मिलना उतना बड़ा दुःख नहीं जितना यह जान लेना कि अब किसी पर पहले जैसी निस्संकोच आस्था नहीं रखी जा सकती। मनुष्य का हृदय टूटता नहीं, वह सावधान हो जाता है; और कई बार यही सावधानी उसके सबसे बड़े अकेलेपन का कारण बन जाती है।
नदियों को देखो। वे अपने रास्ते में आने वाले प्रत्येक पत्थर से टकराती हैं, फिर भी समुद्र से मिलने की अपनी इच्छा नहीं छोड़तीं। यदि मनुष्य भी अपनी पहली ठोकर के बाद बहना छोड़ देता, तो पृथ्वी पर कोई नदी समुद्र तक नहीं पहुँचती। शायद इसी कारण प्रकृति हमें बार-बार सिखाती है कि बाधाएँ दिशा बदल सकती हैं, प्रवाह नहीं।
उस दिन हवा बिल्कुल शांत थी। पेड़ों की पत्तियाँ स्थिर थीं, जैसे वे भी किसी अनसुनी बात को सुन रही हों। दूर एक सूखा हुआ पत्ता शाख से अलग हुआ और बिना किसी आवाज़ के धरती पर आकर ठहर गया। तुमने उसे देखा और कहा, "देखो, उसका अंत हो गया।"
मैंने उस पत्ते को उठाकर हथेली पर रखा और धीरे से कहा, "यह अंत नहीं है। अभी यह मिट्टी बनेगा, फिर किसी बीज का अंश होगा, फिर किसी नई शाख पर हरियाली बनकर लौटेगा। प्रकृति मृत्यु को भी विराम नहीं बनने देती; केवल मनुष्य ही हर विदाई को अंतिम समझ बैठता है।"
तुम्हारी आँखों में उस क्षण एक विचित्र चमक थी। जैसे किसी ने भीतर वर्षों से बंद एक खिड़की धीरे-से खोल दी हो। कभी-कभी एक साधारण-सा दृश्य मनुष्य को वह समझा देता है जिसे बड़े-बड़े ग्रंथ भी नहीं समझा पाते।
मैंने तब जाना कि संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु ज्ञान नहीं, दृष्टि है। ज्ञान बताता है कि वृक्ष कितना ऊँचा है; दृष्टि यह बताती है कि उसने इतनी ऊँचाई तक पहुँचने के लिए कितनी बार आँधियाँ सही होंगी। ज्ञान कहता है कि नदी कितनी लंबी है; दृष्टि पूछती है कि उसने कितने पत्थरों को चूमकर अपना मार्ग बनाया होगा। ज्ञान तथ्य देता है, दृष्टि करुणा देती है। और करुणा के बिना कोई भी बुद्धिमत्ता अधूरी है।
शायद इसी कारण मुझे उन लोगों से भय नहीं लगता जो बहुत कम जानते हैं; मुझे उन लोगों से भय लगता है जो बहुत कुछ जानते हैं, पर किसी के दुःख को देखकर उनके भीतर कुछ भी नहीं काँपता। ज्ञान मनुष्य को बड़ा बना सकता है, पर केवल संवेदना ही उसे मनुष्य बनाए रखती है।
तुमने अचानक कहा, "क्या हर व्यक्ति अपने हिस्से का दुःख लेकर ही जन्म लेता है?"
मैंने उत्तर देने से पहले आकाश की ओर देखा। बादल धीरे-धीरे एक-दूसरे में घुल रहे थे। कोई भी बादल अपने आकार को बचाने की कोशिश नहीं कर रहा था। मैंने कहा, "शायद हम दुःख लेकर नहीं जन्मते। हम केवल प्रेम करने की क्षमता लेकर जन्मते हैं। दुःख तो उसी क्षमता की परछाई है। जितना गहरा प्रेम होगा, उसकी अनुपस्थिति उतनी ही गहरी लगेगी। इसलिए दुःख प्रेम का विरोधी नहीं, उसका मौन प्रमाण है।"
तुमने कुछ नहीं कहा। पर उस दिन पहली बार मुझे लगा कि हमारे बीच शब्दों से अधिक मौन बोल रहा है। और जब मौन बोलने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि दो मनुष्यों के बीच विश्वास ने अपनी पहली जड़ जमा ली है।
दूर क्षितिज पर सांझ उतर रही थी। प्रकाश और अँधेरे के बीच खिंची वह महीन रेखा मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही है। शायद इसलिए कि जीवन भी इन्हीं दो सीमाओं के बीच अपना अर्थ खोजता है। हम पूर्ण उजाले में स्वयं को नहीं पहचानते और पूर्ण अँधेरे में कुछ देख नहीं पाते। पहचान हमेशा उस क्षण जन्म लेती है जब दोनों एक-दूसरे को स्पर्श कर रहे होते हैं।
मैंने उस दिन तुमसे कहा था, "यदि कभी जीवन तुम्हें बिल्कुल अकेला छोड़ दे, तो किसी नदी के किनारे बैठ जाना। वह तुम्हें कोई उपदेश नहीं देगी, कोई समाधान भी नहीं बताएगी। वह केवल बहती रहेगी। और धीरे-धीरे तुम्हें समझ में आने लगेगा कि जीवन का सबसे बड़ा उत्तर आगे बढ़ते रहना नहीं, बल्कि भीतर से बहते रहना है। क्योंकि जो भीतर से बहना बंद कर देता है, वह बाहर चाहे जितना चलता रहे, एक दिन पत्थर हो जाता है।"
तुमने अपनी हथेली में मिट्टी रख दी थी। बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर अत्यंत धीमे स्वर में कहा, "शायद इसी कारण कुछ लोग जीवन भर चलते रहते हैं, फिर भी कहीं पहुँच नहीं पाते।"
मैंने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "हाँ... क्योंकि यात्रा पैरों से नहीं, हृदय से पूरी होती है। और जिनका हृदय रास्ते में कहीं ठहर जाता है, उनकी मंज़िलें भी अक्सर वहीं ठहर जाती हैं।"
मनुष्य जब बहुत दूर तक चल लेता है, तब उसे यह ज्ञात होने लगता है कि रास्ते कभी उसे कहीं ले नहीं गए; वे केवल उसे उससे मिलाने का माध्यम बने, जिससे वह वर्षों तक बचता रहा। हम अक्सर संसार की ओर चलते हैं और अंततः अपने ही भीतर पहुँच जाते हैं। यह यात्रा जितनी बाहर दिखाई देती है, उससे कहीं अधिक भीतर घटित होती है।
एक दिन मुझे लगा कि स्मृतियों से लड़ना वैसा ही है जैसे कोई नदी अपने ही स्रोत को भूल जाना चाहे। स्रोत को नकार देने से जल का अस्तित्व समाप्त नहीं होता। वह केवल बेचैन हो जाता है। उसी प्रकार जिन अनुभूतियों को हम भुलाने का प्रयास करते हैं, वे विस्मृत नहीं होतीं; वे हमारे स्वभाव का रूप धारण कर लेती हैं। फिर हम बिना कारण उदास हो जाते हैं, बिना कारण किसी अजनबी पर विश्वास कर बैठते हैं, बिना कारण किसी पुराने वृक्ष के नीचे खड़े होकर देर तक आकाश देखते रहते हैं। कारण दिखाई नहीं देता, क्योंकि वह घटना नहीं, अनुभव बन चुका होता है।
धीरे-धीरे मुझे यह भी समझ में आया कि जीवन का उद्देश्य अपने भीतर से पीड़ा को निकाल देना नहीं है। यदि ऐसा होता, तो प्रकृति काँटों को जन्म ही क्यों देती? उसने तो फूलों के साथ काँटे भी बनाए, वर्षा के साथ बिजली भी बनाई, समुद्र के साथ तूफ़ान भी बनाए। शायद इसलिए कि संतुलन केवल सुख से नहीं बनता; संतुलन स्वीकार से बनता है। जो अपने जीवन के अँधेरे को स्वीकार कर लेता है, वही प्रकाश का वास्तविक अर्थ समझ पाता है।
उस दिन हम बहुत देर तक बिना कुछ कहे बैठे रहे। हवा में हल्की ठंडक थी। दूर क्षितिज पर डूबता हुआ सूर्य अपनी अंतिम आभा छोड़ रहा था। पक्षियों का झुंड लौट रहे था। मैंने उन्हें देखा और पहली बार लगा कि लौटना हमेशा किसी स्थान पर नहीं होता। कुछ लौटने अपने भीतर होते हैं। वर्षों तक भटकने के बाद मनुष्य एक दिन अपने ही हृदय में लौट आता है और वहीं उसे वह शांति मिलती है जिसे वह संसार के प्रत्येक नगर, प्रत्येक चेहरे और प्रत्येक उपलब्धि में खोजता रहा था।
तुमने धीमे स्वर में पूछा, "क्या हर कहानी का अंत होता है?"
मैंने मुस्कुराकर कहा, "कहानियों का होता है, अनुभूतियों का नहीं।"
"फिर अधूरा क्या रहता है?"
"केवल वह जिसे हम समाप्त करना चाहते हैं। जो स्वीकार कर लिया जाता है, वह अधूरा नहीं रहता; वह जीवन का हिस्सा बन जाता है।"
तुमने अपनी दृष्टि झुका ली। मिट्टी पर पड़ी एक सूखी पत्ती को उँगलियों से उलट-पलट कर देखने लगीं। कुछ क्षण बाद तुमने उसे हवा में छोड़ दिया। वह थोड़ी दूर जाकर धरती पर टिक गई। मैंने कहा, "देखो, उसने गिरना स्वीकार किया, इसलिए हवा उससे लड़ नहीं रही।"
शायद मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष परिस्थितियों से नहीं, उनके प्रति अपने प्रतिरोध से होता है। हम जितना जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार बाँधना चाहते हैं, उतना ही वह हमारी पकड़ से फिसलता जाता है। और जिस दिन हम उसे उसके स्वभाव सहित स्वीकार कर लेते हैं, उसी दिन वह हमारे भीतर शांति का एक छोटा-सा दीप जला देता है।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि जिन्होंने मुझे छोड़ा, वे भी मेरे शिक्षक थे; जिन्होंने मुझे अपनाया, वे भी। जिन्होंने मुझे समझा, उनका ऋणी हूँ; जिन्होंने नहीं समझा, उनका भी। क्योंकि उन्होंने मुझे अपने भीतर उतरना सिखाया। यदि सब कुछ मेरी इच्छा के अनुसार घटित होता, तो शायद मैं कभी अपने भीतर उस मौन तक नहीं पहुँच पाता जहाँ प्रश्न धीरे-धीरे प्रार्थना बन जाते हैं।
जीवन ने अंत में मुझे कोई बड़ा रहस्य नहीं दिया। उसने केवल एक सरल-सी बात सिखाई—मनुष्य को अपने भीतर इतना प्रकाश बचाए रखना चाहिए कि कोई थका हुआ यात्री उसके पास कुछ देर बैठ सके। यदि हमारे होने से किसी एक हृदय का भार थोड़ा हल्का हो जाए, तो हमारी यात्रा व्यर्थ नहीं रही।
अब मुझे मंज़िलों से अधिक उन कदमों पर विश्वास है जिन्होंने बिना शोर किए रास्ते तय किए। उपलब्धियों से अधिक उन संबंधों पर, जिनमें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ी। शब्दों से अधिक उन मौनों पर, जहाँ दो आत्माएँ बिना बोले एक-दूसरे को सुन सकीं।
और यदि कभी आने वाले वर्षों में कोई मुझसे पूछे कि जीवन ने तुम्हें सबसे मूल्यवान क्या दिया, तो मैं किसी व्यक्ति, किसी सफलता या किसी स्मृति का नाम नहीं लूँगा। मैं केवल इतना कहूँगा—
जीवन ने मुझे यह साहस दिया कि मैं टूटकर भी कठोर न बनूँ, बिछड़कर भी प्रेम से विमुख न होऊँ, और खोकर भी अपने भीतर बची हुई रोशनी पर विश्वास बनाए रखूँ।
शायद मनुष्य की सबसे बड़ी विजय किसी और पर नहीं होती।
वह उस दिन होती है, जब वह अपने भीतर जन्मे अँधेरे से हाथ मिलाकर भी प्रकाश की ओर चलना नहीं छोड़ता। वहीं से यात्रा समाप्त नहीं होती—वहीं से मनुष्य सचमुच जीना प्रारम्भ करता है।

- पंडित भारमल गर्ग "विलक्षण"

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मौन के उस पार स्मृतियों का दूसरा किनारा

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